125वाँ शक्ति चेतना जनजागरण महाशक्ति शंखनाद शिविर, सिद्धाश्रम, 3,4,5 अक्टूबर 2022

पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम में 3, 4, 5 अक्टूबर को सम्पन्न त्रिदिवसीय शक्ति चेतना जनजागरण शिविर ‘महाशक्ति शंखनाद’ में धर्मसम्राट् युग चेतना पुरुष सद्गुरुदेव परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज के सान्निध्य में एक लाख से अधिक धर्मयोद्धाओं के द्वारा किए गए शंखनाद की ध्वनि ने सम्पूर्ण जड़-चेतन जगत् में युग परिवर्तनकारी क्रान्ति की लहर फूंक दी है। इस कार्यक्रम में लाखों की संख्या में सत्यधर्म के अनुयायियों, धर्मयोद्धाओं ने शामिल होकर गुरुवरश्री के साथ सामूहिक रूप से शंखनाद करके अनीति-अन्याय-अधर्म के विरुद्ध उठ खड़े होने का ऐलान कर दिया है और इससे भ्रमजाल फैलाए कथित धर्माचार्यों, भ्रष्ट राजनेताओं, शराब माफियाओं व अन्यायी-अधर्मियों की जड़ें हिल उठी हैं।

सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज एक चिन्तनशील ऋषि हैं। वे गम्भीर एवं शान्त अवश्य हैं, लेकिन उनकी गम्भीरता में आनन्द, प्रेरणा, प्रसन्नता व शौर्य-पराक्रम प्रदान करने वाली अमृतकणिकाएं एकत्रित होकर वाणी के माध्यम से मानवसमाज को जीवंत बनाती रहती हैं। ऋषिवर के स्वच्छ व निर्मल मानसपटल पर अपने शिष्यों और मानवता के कल्याण के प्रति चिन्तन की रेखाएं स्पष्ट दृष्टिगोचर होती हैं।

  सद्गुरुदेव जी महाराज का चिन्तन है कि श्श्मानव रूप में जन्म लेने का लाभ इतना ही है कि चाहे जैसे भी होय अपने कर्म से, अपनी भक्ति से, अपने ज्ञान से, अपने जीवन को ऐसा बना लिया जाए कि आपके मनमस्तिष्क में हर क्षण, हर पल परमसत्ता की, अपने इष्ट की, स्मृति बनी रहे।

ऋषिवर की वाणी से प्रवाहित भक्ति, ज्ञान और कर्मरूपी ज्ञानामृत का पान करके, जिसने अपने जीवन को परिवर्तित कर लिया, उसका यह जीवन ही नहीं, बल्कि आगे आने वाले कई जन्म श्रेयस्कर सिद्ध होंगे।

शारदीय नवरात्र पर्व में आयोजित शक्ति चेतना जनजागरण शिविर ‘महाशक्ति शंखनाद’ में लाखों की संख्या में पहुंचे धर्मयोद्धाओं, ऋषिवर सद्गुरुदेव परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज के शिष्यों ने जहाँ अध्यात्मिक ज्ञानामृत का पान किया, वहीं पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम धाम के कण-कण में व्याप्त आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा की भक्ति से प्रवाहित विशेष चेतनातरंगों से अविभूत हुये। दिनांक 3, 4, 5 अक्टूबर 2022 (अष्टमी, नवमी, विजयादशमी तिथि) को पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम में पूर्णरूपेण नशामुक्त व मांसाहारमुक्त लाखों भक्तों का समूह उमड़ पड़ा था। चाहे युवा हों या बुजुर्ग, यहाँ तक कि छोटे-छोटे बच्चों के हाथ में शक्तिदण्डध्वज और शंख ऐसे सुशोभित थे, जैसे कि सिद्धाश्रम की धरती पर प्रकृति ने एक अलग ही आभा बिखेर दी हो।

शिविर के तीनों दिवसों में सर्वप्रथम ब्रह्ममुहूर्त पर भक्तजन मूलध्वज साधना मंदिर में आरतीक्रम पूर्ण करने के पश्चात् श्री दुर्गाचालीसा अखण्ड पाठ मंदिर पहुंचकर गत 25 वर्ष से अनन्तकाल के लिए चल रहे श्री दुर्गाचालीसा पाठ में सम्मिलित हुये, जहाँ परम पूज्य सदगुरुदेव जी महाराज के द्वारा प्रात: 06 बजे स्वयं उपस्थित होकर नित्यप्रति की तरह माता भगवती आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा व सहायक शक्तियों की पूजा-अर्चना करने के पश्चात् मूलध्वज साधना मन्दिर पहुंचे और मानवता के कल्याण की कामना माता जगदम्बे से की। उक्त साधनात्मक क्रमों के बाद प्रात: 07:30 बजे सभी भक्तों ने प्रवचन पण्डाल के नीचे बैठकर सम्पूर्ण मनोयोग से अतिमहत्त्वपूर्ण बीज मंत्र ‘माँ-ॐ’ एवं गुरुमन्त्र ‘ॐ शक्तिपुत्राय गुरुभ्यो नम: व चेतनामन्त्र ॐ जगदम्बिके दुर्गायै नम: का सस्वर जाप किया। तत्पश्चात् शिविर पंडाल में उपस्थित भक्तों को शक्तिस्वरूपा बहन संध्या शुक्ला जी ने जहाँ साधनाक्रम की जानकारी दी, वहीं स्वस्थ जीवन के लिए योगाभ्यास कराया।

विदित हो कि भगवती मानव कल्याण संगठन व पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम ट्रस्ट के सदस्यों-कार्यकर्ताओं के द्वारा संयुक्त रूप से सिद्धाश्रम धाम के विशाल परिसर में दक्षिण दिशा की ओर दिन-रात अथक परिश्रम करके अत्यन्त ही आकर्षक व भव्य मंच का निर्माण किया गया था, जहाँ तीन दिवस तक प्रतिदिन द्वितीय सत्र में ऋषिवर के चिन्तनामृत की वर्षा होती रही, वहीं भक्तों ने चिन्तन के बाद, दिव्य आरती से उत्सर्जित अलौकिक ऊर्जा का भी लाभ प्राप्त किया।

शक्ति चेतना जनजागरण शिविर का प्रथम दिवस, प्रवचनस्थल अपार जनसमुदाय से खचाखच भरा हुआ था तथा सभी अनुशासित रूप से पंक्तिबद्ध बैठे हए थे। सभी की आँखें ऋषिवर के आगमन की प्रतीक्षा में बिछी हुई थीं, तभी निर्धारित समय में अपराह्न 02:30 बजे, गुरुदेव जी के पदार्पण के साथ ही सम्पूर्ण वातावरण जयकारे, शंखध्वनि व तालियों की गड़गड़ाहट से गुंजायमान हो उठा। उनके मंचासीन होते ही सर्वप्रथम शक्तिस्वरूपा बहन पूजा, संध्या व ज्योति शुक्ला जी के द्वारा समस्त भक्तों की ओर से गुरुवरश्री का पदप्रक्षालन करके पुष्प समर्पित किए गए। तत्पश्चात् परम पूज्य गुरुवरश्री के कुछ शिष्यों ने भक्तिरस से परिपूर्ण भावगीत प्रस्तुत किये, जिसके अंश प्रस्तुत हैं :-

कोई व्यथा जब सताने लगे, तुम सिद्धाश्रम चले आना। मन में निराशा जो छाने लगे, तुम सिद्धाश्रम चले आना।। दु:ख में, कष्ट में, विपदाओं में जब भी मन घबराने लगे, तुम सिद्धाश्रम चले आना।। यह प्रेरणास्पद भावगीत प्रस्तुत कर शक्तिस्वरूपा बहन संध्या शुक्ला जी ने सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। इससे पहले प्रतीक मिश्रा जी, सिद्धाश्रम ने अपने भावसुमन में कहा-मुझे माँ से मिला दो हे गुरुवर, उद्धार हमारा होजाए।

कार्यक्रम का संचालन करते हुए वीरेन्द्र दीक्षित जी, दतिया के द्वारा प्रस्तुत भावगीत-दुनिया में चलिए संभल-संभल। तेरा बस आज है, तेरा नहीं कल। अंत में बाबूलाल विश्वकर्मा जी, दमोह के द्वारा गुरुचरणों में समर्पित मनभावन छन्द-आकर शरण में पार हो जाते हैं, पापी सब अधम। कोटि नमन ऋषिराज सच्चिदानंद दुर्गानन्दन। भावगीतों की शृंखला समाप्त होते ही प्रवचनस्थल पर उपस्थिल जनसमुदाय ने पाँच-पाँच बार बीजमंत्र ‘माँ-ॐ’ का उच्चारण किया।

मंचासीन ऋषिवर सद्गुरुदेव परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज की मोहक गम्भीरता सभी की अन्तर्भावना में व्याप्त हो रही थी और आपश्री ने ध्यानावस्थित होकर माता जगदम्बे की स्तुति की तथा सभी शिष्यों, चेतनाअंशों तथा प्रवचनस्थल पर उपस्थित विशाल जनसमुदाय सहित व्यवस्था में लगे सभी कार्यकर्ताओं व सत्यधर्म के मार्ग पर चलने वाले विश्वजनमानस को अपना पूर्ण आशीर्वाद  प्रदान करते हुये सुपरिचित मन्द मृदुल मुस्कान के साथ धीर-गम्भीर वाणी में कहते हैं-

महाशाक्ति शंखनाद शिविर में चिंतन प्रदान करते हुए, सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज
श्री शक्तिपुत्र जी महाराज

“माता भगवती आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा हमारी आत्मा की जननी हैं, हम सभी की माँ हैं, हमारी इष्ट हैं और यदि उनसे कुछ पाना चाहते हो, तो इस धरातल पर बैठकर उनसे रिश्ता जोड़ सकते हो। ‘माँ’ की साधना-आराधना अत्यन्त सरल है, जिसे हर कोई कर सकता है। नवरात्र पर्व पर साधक व्रत-उपवास रहते हैं, मंदिरों में जाते हैं, अच्छी बात है, लेकिन केवल व्रत-उपवास करने व मंदिरों में जाने भर से समाज का कल्याण नहीं होगा, बल्कि ‘माँ’ की साधना-आराधना के लिए एक तड़प होनी चाहिए। उपवास का अर्थ है- ‘माँ’ के नजदीक वास करना। लेकिन, होता यह है कि लोग नौ दिनों का व्रत तो धारण कर लेते हैं, लेकिन उनका एक-एक दिन गिनते हुए व्यतीत होता है कि अभी दो ही दिन हुए, तीन दिन हुए और इतने दिन बाकी हैं। ये कैसी श्रद्धा है? यह दिशाधारा पूरी तरह शून्यता की दिशाधारा है और यदि पूर्णता की दिशाधारा प्राप्त करनी है, तो नवरात्र आने के पहले से ही आपका मन ‘माँ’ की भक्ति में रम जाना चाहिए। यदि नवरात्र के इन पावन क्षणों को सार्थक बनाना चाहते हैं, तो यह सोच होनी चाहिए कि कब नवरात्र पर्व का आगमन हो? जिससे व्रत-उपवास, साधना-आराधना के माध्यम से हम ‘माँ’ के नजदीक वास कर सकें! सोच यह होनी चाहिए कि दो दिन निकल गए और अब सात दिन ही बचे हैं। यह भाव होना चाहिए कि ‘माँ’ ही मेरी सर्वस्व हैं और अगर इस भावभूमि में खड़े होगे, तो नौ दिनों में ही आपका जीवन बदलता चला जायेगा।

यह मानवजीवन दुर्लभ है, जिसे पाने के लिए देवता भी तरसते हैंय वे देवता, जिनकी आप पूजा करते हैं। आख़िरकार क्यों? इसलिए कि मानवजीवन ही ऐसा जीवन है, जिसके माध्यम से हम मानवता के पथ पर कदम बढ़ा सकते हैं और ध्यान-साधना की उच्च पराकाष्ठा को प्राप्त करके ऋषित्व को प्राप्त किया जा सकता है।

समाज के बीच आज अनेक धर्मगुरु हैं, फिर भी समाज भटका हुआ है, क्योंकि उन्होंने समाज को सही दिशा दी ही नहीं। वे स्वयं खोखले हैं और यदि मानवता को सही दिशा देनी है, तो साधना-तपस्या करनी ही होगी। साधना-तपस्या का तात्पर्य आलस्य, अकर्मण्यता नहीं है, बल्कि पूर्णता की ओर बढ़ना है। इससे कार्यक्षमता बढ़ती चली जाती है। सामान्य व्यक्ति थोड़े परिश्रम से ही थक जाता है, जबकि एक योगी, एक साधक बिना रुके, बिना विश्राम किए आठ-आठ घण्टे, दस-दस घण्टे परिश्रम कर सकता है और वह थकेगा नहीं! यदि तुम मानवता से प्रेम करते हो, तो तुम्हें अपने कर्त्तव्य का पालन करना ही होगा। इस हेतु पहले स्वयं को जानना होगा, कि ‘मैं कौन हूँ और मेरे कर्त्तव्य क्या हैं’ ? यदि तुम्हें  यह मानवजीवन मिला है, तो मानवता के पथ पर चलना तुम्हारा कर्त्तव्य है। तुम्हारे पास दो ही रास्ते हैं, या तो मानवता के पथ पर चल पड़ो, या फिर दानवता के पथ पर। अब तुम्हें विचार करना है कि मानवता के पथ पर चलना है या दानवता के पथ पर चलना है।

मानवता के पथ पर चलने के लिए तीन बातों पर विशेष ध्यान देना होगा- शरीर की पवित्रता, आहार और विचार।

 पवित्रता:  शरीर की पवित्रता से तात्पर्य केवल बाह्य शुद्धता नहीं है, बल्कि अन्तरूकरण भी पवित्र होना चाहिए। आपने तो अपनी सभी नाड़ियों को, सभी इन्द्रियों को अपवित्र कर रखा है। अब भी समय है, सात्विक आचरण से हरपल अपने आपको, अपने जीवन को पवित्र बनाते रहो। तन भी पवित्र हो, मन भी पवित्र हो, विचार पवित्र हों, कर्म पवित्र हों। तभी, आप मानवता के पथ पर बढ़ सकते हैं, ‘माँ’ की भक्ति  कर सकते हैं।

आहार: शरीर की पवित्रता का आपके आहार से भी गहरा सम्बंध है। अत: आहार पर भी विशेष ध्यान रखने की आवश्यकता है। हर पल सतर्क रहें कि कैसा आहार लें, जिससे शरीर पवित्र रहे? हमेशा सात्विक आहार लें और हम जितना अपने अन्त:करण को पवित्र बनाते चले जायेंगे, उतनी ही हमारी कार्यक्षमता बढ़ती चली जायेगी। नवरात्र पर्व का तात्पर्य है कि हम कम से कम शुद्ध, सात्विक आहार लें, इससे शरीर में शुद्धता बनी रहती है।

विचार: आहार के साथ अपने विचारों पर भी ध्यान रखें कि मन में किस तरह के विचार चल रहे हैं? सात्विकता, शुद्धता के विचार ही आपको अध्यात्मिक उन्नति के पथ पर ले जायेंगे। जैसे कि लोभ की भावना जब तक नहीं जगेगी, तब तक चाहे करोड़ों की सम्पत्ति सामने पड़ी हो, उसे आप छुयेंगे तक नहीं। क्रोध की भावना जब तक नहीं जगेगी, तब तक आप किसी को एक तमाचा भी नहीं मार सकते। इसी तरह काम की भावना जब तक नहीं जगेगी, आपके कदम विकारों की ओर नहीं बढ़ेंगे। आज समाज के पतन का कारण यही है, विचारों का भटक जाना।

कलिकाल का वातावरण है और मैं यह नहीं कहता कि इस भूतल पर कोई साधक नहीं है, लेकिन हजारों में एक मिलेगा। विवेकवान बनो, यदि नहीं बनोगे, तो तुम्हारे बच्चे दर-दर की ठोकरें खायेंगे। ऋषियों-मुनियों की इस धरती पर, जहाँ राम, कृष्ण ने जन्म लिया, उस धरती पर रहने वाले लोग आज इतने बेबस क्यों है? एक शंकराचार्य ने समाजकल्याण के लिए 32 वर्ष की उम्र में चार मठों की स्थापना कर दी और आज 65-65 शंकराचार्य हैं, फिर भी समाज पतन की ओर जा रहा है। दूसरों को ज्ञान देंगे कि ‘माया महाठगिनि में जानी’ और स्वयं उसी माया में लिप्त हैं।

आज के साधु-संत-संन्यासियों को राजनेताओं, उद्योगपतियों का साथ अच्छा लगता है, ध्यान-साधना कोई करना ही नहीं चाहता। ‘माँ’ से रिश्ता जोड़ना है, तो शरीर, आहार व विचारों की पवित्रता के साथ ही यम-नियमों का पालन करना होगा, ध्यान-साधना की उच्चता को प्राप्त करना होगा। यदि धन और धर्म को चुनने का अवसर आए, तो धर्म को चुनना चाहिए, अन्यथा एक दिन मरकर चले जाओगे और धन यहीं का यहीं धरा रह जायेगा। मरते तो सभी हैं, योगी-तपस्वी भी मरते हैं, मगर मरने-मरने में अन्तर होता है। इस समाज में तीन प्रकार के लोग रहते हैं- पहले प्रकार के लोग प्रताड़ित करते हैं, दूसरे प्रकार के प्रभावित करते हैं और तीसरे प्रकार के प्रकाशित करने वाले  हैं। लेकिन, मैं आप लोगों को प्रकाशित करने आया हूँ। मैंने विश्वअध्यात्मजगत् को अपने साधनात्मक तपबल की चुनौती दी है, किसी गर्व, घमण्ड से नहीं, बल्कि समाज को जाग्रत् करने के लिए दी है। अभी आप लोग बागेश्वर धाम के महाराज की चर्चाएं सुन रहे होंगे कि समाज को किस तरह दिशाभ्रमित किया जा रहा है? तो मैं बागेश्वर धाम महाराज से कहना चाहूँगा, पण्डोखर महाराज से भी कहना चाहूंगा कि तुम त्रिकालज्ञ नहीं हो। प्रेमा साईं महाराज को तो जेल में डाल देना चाहिए, जो अघोरपंथ के नाम पर भूत-प्रेत की बाधा दूर करने, बड़ी-बड़ी बीमारियों को दूर करने का भ्रमजाल फैलाए हुए हैं। भोली-भाली जनता को लूटा जा रहा है। सरकारों को ध्यान देना चाहिए कि कोई कैंसर, तो कोई किसी अन्य बीमारी को ठीक करने के नाम पर लूट रहा है, तो कोई भूत-प्रेत-पिशाच की बाधा बताकर लूट रहा है। यदि बीमारियों से ग्रसित व्यक्ति इलाज कराते, तो ठीक भी हो सकते थे।

सतर्क हो जाओ, यह ‘माँ’ का युग है, शक्ति का युग है और साधक तैयार हो रहे हैं, जिन्हें प्रभावित करके मूर्ख नहीं बनाया जा सकता। चाहे बागेश्वर धाम के महाराज हों, अघोरपंथी प्रेमासाईं हों या पण्डोखर महाराज हों, मैं सभी को ससम्मान आमंत्रित करता हूँ कि एक आयोजन के लिए सामने आओ। एक बार कहीं पर भी आयोजन होगा, तो मैं तुम्हारी तुच्छ साधनाओं को क्षीण कर दूँगा। चाहे जितने लोगों को इकट्ठा कर लेना और सब मिलकर प्रयोग करना। यदि मेरा एक रोयाँ भी टेढ़ा कर दोगे, तो सिर काटकर चढ़ा दूँगा। मैं अपनी ही बात नहीं कर रहा हूँ, मेरा एक भी शिष्य, जो नशे-मांसाहार से मुक्त चरित्रवान् जीवन जीता है, उसका भी एक रोयाँ टेढ़ा कर दोगे, तो अपनी साधनात्मक यात्रा छोड़ दूँगा। मैं सभी शंकराचार्यों से कहना चाहूँगा कि हिन्दूधर्म की रक्षार्थ, साधनात्मक शक्तिपरीक्षण के लिए एक आयोजन हो, जिसमें विश्व हिन्दू परिषद के लोग हों, कथित सभी सिद्धसाधक, धर्माधिकारी, धर्माचार्य उपस्थित हों।

धर्मरक्षा, राष्ट्ररक्षा एवं मानवता की सेवार्थ विगत 25 वर्षों से यह यात्रा सच्चाई, ईमानदारी व निष्ठा के बल पर चल रही है। तीन धाराओं की स्थापना जिस लक्ष्य को लेकर की गई है, उस लक्ष्य की ओर सतत आगे बढ़ा जा रहा है। अपने समय के एक-एक पल का उपयोग करें, अपने आपको विवेकवान, पुरुषार्थी और परोपकारी बनाएं। आत्मसत्ता, गुरुसत्ता और परमसत्ता को एकरूपता से ले करके चलें, जीवन संवरता चला जायेगा। मैं साधक और साधिकाएं तैयार करना चाहता हूँ और यह यात्रा राजनेताओं या उद्योगपतियों के सहयोग से नहीं चल रही है, बल्कि मेरे शिष्यों के सहयोग से, उनके पुरुषार्थ से चल रही है। आपका गुरु आपको समझदार और विवेकवान बना रहा है। हर पल सजग रहें, क्योंकि हम अनीति-अन्याय-अधर्म के विरुद्ध धर्मयुद्ध लड़ रहे हैं। एक ऐसा धर्मयुद्ध, जिसमें हमारे अस्त्र-शस्त्र हैं-साधनात्मक परिवेशय शक्तिदण्डध्वज, रक्षाकवच, कुंकुम का तिलक और शंख। हमें अन्यायी-अधर्मियों को सुधारना है, दण्ड नहीं देना है और जो नहीं सुधरेंगे, तो संगठन में बहुत बड़ी ताकत होती है। कानून के दायरे में रहकर कार्य करते हुए अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहें।

इसी दिव्यस्थल से मेरे शिष्यों ने नशामुक्ति का शंखनाद किया है, यहीं से युग परिवर्तन का महाशंखनाद किया गया है और अब महाशक्ति शंखनाद किया जा रहा है। यह सामान्य शंखनाद नहीं है, इसमें हर अनीति-अन्याय-अधर्म को समाप्त करने की शक्ति समाहित है, इसमें मेरे नशे-मांसाहार से मुक्त चरित्रवान् शिष्यों की शक्ति समाहित है।“

अमृतमयी चिन्तन के उपरान्त, प्रवचनस्थल पर उपस्थित एक लाख से अधिक शिष्यों-भक्तों ने सद्गुरुदेव जी महाराज के सान्निध्य में अनवरत पाँच मिनट तक महाशक्ति शंखनाद किया, जिसकी गूँज से सम्पूर्ण चराचर जगत् गुंजायमान हो उठा। शंखनाद के बाद सभी ने नित्य साधनाक्रम पूर्ण करते हुए शक्तिस्वरूपा बहन पूजा जी, संध्या जी, ज्योति जी और सिद्धाश्रम चेतना आरुणी जी, अद्वैत जी एवं आत्रेय जी के द्वारा सम्पन्न की जा रही ‘माँ’-गुरुवर की दिव्यआरती का लाभ एकाग्रभाव से प्राप्त किया। तत्पश्चात् सभी ने क्रमबद्धरूप से गुरुचरणपादुकाओं का स्पर्श करते हुए अतिआनन्दित मन से चिरौंजी दाना और नारियल प्रसाद प्राप्त किया।

शिविर के द्वितीय दिवस का द्वितीय सत्र

शंखनाद क्रम

“मानुष्य अपने विचार परिवर्तन के द्वारा चिन्ता, भय तथा रोगों का निवारण करके अपने जीवन को सुखी एवं शान्तिमय बना सकता है। यदि आप अपनी विचारधारा को अध्यात्म की ओर नहीं मोड़ेंगे, तो कभी भी शान्ति नहीं मिलेगी। उन विचारों का सर्वथा त्याग कर दें, जो क्लेश के कारण हैं और जब आप अपनी विचारधारा को अध्यात्मिक व रचनात्मक दिशा में मोड़ देंगे, तो स्वमेव आपका जीवन सरस होता चला जायेगा।“

पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम धाम की अलौकिक छटा से अविभूत होकर धर्मप्रेमी आगन्तुकजन मोहित हो उठे थे तथा रह-रहकर यहाँ प्रवाहित चेतनातरंगों से लोगों का पूरा शरीर रोमांचित हो उठता था। आयोजन स्थल की अद्भुत छटा देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो माता भगवती आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बे ने सिद्धाश्रम धाम में अपनी समस्त ममता उड़ेल दी हो। 

जयकारों व शंखध्वनि की गूंज के बीच, अपराह्न 02:30 बजे, सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज के आगमन के साथ ही सम्पूर्ण वातावरण तालियों की गड़गड़ाहट से गुंजायमान हो उठा। उनके मंचासीन होते ही शिविर के प्रथम दिवस की तरह ही बहन पूजा, संध्या व ज्योति शुक्ला जी के द्वारा समस्त भक्तों की ओर से गुरुवरश्री का पदप्रक्षालन करके पुष्प समर्पित किए गए। तत्पश्चात् कुछ शिष्यों-भक्तों ने गीत व कविता के माध्यम से अपने भाव प्रकट किए, जिनके कुछ अंश इस प्रकार हैं:-

मन की पीड़ा के तारों की झंकार के लिए, जयकारे लगा लो युगचेतन करतार के लिए-विकास जी, प्रयागराज। आपसे गुरुदेव हमने धर्म का पथ पाया है, हममें परिवर्तन आया है, आपसे गुरुदेव-सिद्धाश्रमरत्न सौरभ द्विवेदी जी, सिद्धाश्रम। गुरुवर के दर हम आए हैं महाशक्ति शंखनाद में, गुरुवर के दर्शन पाए हैं महाशक्ति शंखनाद में-बाबूलाल विश्वकर्मा जी, दमोह। अहो सौभाग्य ममता सिंधु के हम मीन होजाएं, हमेशा के लिए माँचरणों के आधीन होजाएं-बहन मुक्ता जी, कौशाम्बी।

भावगीतों के क्रम के बाद प्रवचनस्थल पर उपस्थित सभी भक्तों ने पाँच-पाँच बार बीजमंत्र ‘माँ-ॐ’ का उच्चारण किया और इसके साथ ही ऋषिवर श्री शक्तिपुत्र जी महाराज के श्रीमुख से आशीर्वादरूपी अमृतकणिकाएं बिखरने लगीं-

 “माता आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा की कृपा तथा तप, त्याग, पुरुषार्थ व परोपकार से आलोकित इस तीर्थस्थल पर महाशक्ति शंखनाद का अवसर होय तब यहाँ बैठने का सौभाग्य उन्हीं को मिलता है, जब संस्कारों के फलस्वरूप उनके पुण्य का उदय होता है।

सभी तीर्थों का प्रभाव होता है, लेकिन यह वह तीर्थ है, जिसमें सभी तीर्थ समाहित हैं, जहाँ ‘माँ’ की चेतनातरंगें प्रवाहित हैं, जो आपके अन्त:करण को चेतना प्रदान कर रही हैं। यहाँ बैठने मात्र से रजोगुणी, तमोगुणी प्रवृत्तियाँ संकुचित होने लगती हैं और सतोगुण प्रवृत्ति का उदय होता है। भविष्य में यह प्रमुख तीर्थस्थल होगा और यहाँ दुनिया सिर झुकायेगी। इससे उत्तम स्थान, पूरी दुनिया में और कहीं नहीं मिलेगा।

यह ‘माँ’ का युग है, शक्ति का युग है। आपके चारों तरफ चाहे कितनी ही विषमताएं फैली हों, अगर आपको  ‘माँ’ पर विश्वास है, तो पहाड़ जैसी समस्याएं धूल के कणों में परिवर्तित हो जायेंगी। हम सभी कुण्डलिनीचेतना का जीवन जीते हैं और उसका लाभ आप हर क्षण प्राप्त कर रहे हैं। कुण्डलिनीचेतना के फलस्वरूप ही आपका यह जीवन संचालित है। आप चाहते हैं कि एक ही दिन में कुण्डलिनी के सभी चक्र जाग्रत् होजाएं, बिना यम-नियम का पालन किए ही आप अलौकिक शक्तियों के मालिक बन जाएं, तो यह सम्भव नहीं है, इसके लिए पूरा जीवन खपाना पड़ता है। यदि आप अपने जीवन में परिवर्तन डालना चाहते हैं, तो स्वभाव से कोमल और कर्म से कठोर बनें। सत्यधर्म की रक्षा करने का प्रण ले लें और इस प्रण को जीवन के अन्तिम क्षणों तक निभायें। अर्जुन का जीवन कैसा था? वे स्वभाव से अत्यन्त कोमल थे, लेकिन कर्म के प्रति अतिकठोर। सभी पाण्डवों में यही गुण थे, उन्होंने अपने कर्मबल से खण्डप्रस्थ को इन्द्रप्रस्थ बना दिया था, कौरवों व विशाल नारायणी सेना को धूल चटा दी थी। अर्जुन को तो श्रीकृष्ण का सान्निध्य प्राप्त था, जबकि आप लोगों को ‘माँ’ का सान्निध्य मिला है। उस ‘माँ’ का, जो कृष्ण जैसे अनेक युगपुरुषों को जन्म देती हैं। आप लोगों को अनीति-अन्याय-अधर्म को समाप्त करने व सत्यधर्म की पुनर्स्थापना के लिए ‘माँ’ का कार्य करने का अवसर मिला है, इस परम पुनीत अवसर को मत गवाएं।

अपने अन्दर के विकारों को हरपल तलाशो और उन्हें दूर करने का हरसम्भव प्रयास करो। तुम मनुष्य हो, उस जगत् जननी जगदम्बा की सर्वोत्कृष्ट कृति हो, फिर भी दीन-हीनों का जीवन जीते हो। अरे, चेतनावान् बनो, पुरुषार्थी बनो। ‘माँ’ तुम्हें सर्वस्व प्रदान कर सकती हैं, केवल एक जीवन तो समस्त बुराइयों को छोड़कर ईमानदारी, निष्ठा के पथ पर चलो और इस ‘महाशक्ति शंखनाद’ से अच्छा अवसर कहाँ मिलेगा? संकल्प ले लो कि ‘,मैं समस्त विकारों का त्याग कर दूँगा।‘ यदि अन्तरात्मा की आवाज पर चलोगे, तो तुम्हारा जीवन बदलता चला जायेगा। ठंडे तवे पर पानी की बूंद डालोगे, तो वह वैसी ही रखी रहेगी और जैसे ही आग जलाओगे, वह एक पल में सूख जायेगा। मैं चाहता हूँ कि मेरे शिष्य अपने अन्दर एक ज्वालामुखी पैदा करें, जिसकी आग को सैकड़ों पम्पों का पानी भी न बुझा सके। ऐसे प्रचण्ड ज्वालामुखी बनो। इस अँधियारी क्षेत्र को प्रकाशित किया गया है, तो उसमें अखण्ड तप, पुरुषार्थ लगा है। अपनी इच्छाशक्ति को, अपनी अन्तर्चेतना को प्रचण्ड बनाओ।

हम जिसे छठी इन्द्री कहते हैं, उससे ही पंचतत्त्वों का अहसास होता है, तो क्या आत्मा भी इन्द्री है? आत्मा से ही सभी इंद्रियाँ संचालित हैं, मगर उसका कोई केन्द्रबिंदु अवश्य होगा। उस आत्मतत्त्व को, जिसे चेतना कहते हैं, उसे केवल आनन्द से नहीं समझा जा सकता, क्योंकि वह इन्द्री नहीं है। वह आत्मचेतना हमें हर पल सचेत करती है कि हमें क्या करना है और क्या नहीं करना है? जिन्होंने अपने कर्मों से, जो कर्माशय का निर्माण किया है, इसी के अनुसार इन्द्रियाँ संचालित होती हैं। वह आत्मचेतना जो इन्द्रियों को संचालित करती है, वह आनन्द ही नहीं देती, बल्कि इससे शांति, करुणा, पराक्रम, साहस, पुरुषार्थ या दुनिया में जितने भी अच्छे गुण हैं, उनका प्रादुर्भाव करती है। वह हमारी भटक रही इन्द्रियों को संतुलन की ओर मोड़ती है और हमारी आँख, हमारे कान, सभी इन्द्रियाँ दिव्य बन जाती हैं तथा जब इन्द्रियाँ दिव्य बन जाती हैं, तो भौतिक जगत् के सुख ठोकर मारने के तुल्य हो जाते हैं। यदि अपनी आत्मचेतना को प्रभावक बनाना चाहते हैं, तो सातों चक्रों में एक आज्ञाचक्र है, जो कि आत्मचेतना की तृप्ति की, एक अलौकिक शक्ति की जान है। अपने आज्ञाचक्र पर ध्यान केन्द्रित करना सीखें, एक तृप्ति का अहसास होगा।

वह आत्मा जो कर्ता होते हुए भी अकर्ता है, जो सबकुछ करते हुए भी कुछ नहीं करती और जिसने भी आत्मचेतना को प्राप्त कर लिया है, वह सृष्टि का अंश हो जाता है। जैसे कि श्रीकृष्ण ने कहा था कि तुममें मैं हूँ, तुम मुझमें हो, पाप भी मैं हूँ, पुण्य भी मैं हूँ, पेड़-पौधे, नदी, नाले, पहाड़, यहाँ तक कि समूचा निखिल ब्रह्मांड मुझमें समाहित है। अत: आत्मा को गहराई से समझो, जिसकी विराटता की कोई सीमा नहीं है और वही चेतना तुम्हारे अन्दर है। तथापि, आज्ञाचक्र का उपयोग करो, यह चक्र ही हमें हरपल सचेत करता है और इसे ही छठी इन्द्री कहा जाता है। चक्रों में जितना अन्दर प्रवेश करते जाओगे, उतनी ही तृप्ति मिलती चली जायेगी। आत्मसत्ता, गुरुसत्ता और परमसत्ता, इन तीनों को एकसाथ जोड़कर चलने वाला ही पूर्णता को प्राप्त कर सकता है और इनमें से एक को भी हटाकर चलने वाला पूर्ण नहीं हो सकता।

आज समाज में आसुरीशक्तियाँ बढ़ती जा रही हैं। क्या किसी राजनेता ने, किसी राजसत्ता ने आज तक नशामुक्त समाज की स्थापना का प्रयास किया? कुछ स्थानों पर प्रयास तो हुआ, लेकिन सीमित दायरे में। राजसत्ताएं एक ओर शराब बिकवाती हैं और दूसरी ओर नशामुक्ति का अभियान चलाती हैं और कहते हैं कि हमने इतने करोड़ का ड्रग्स पकड़ लिया। मैं उन अन्यायी-अधर्मियों से कहना चाहता हूँ कि नशीले पदार्थों को यदि कोई दूसरा बेचता है, तो उसे पकड़कर जेल में डाल देते हो, तो तुम भी तो वही कार्य कर रहे हो, फिर तुम्हें क्या सजा मिलनी चाहिए? शराब पीकर लोग अपने घर जाकर अपनी पत्नियों को, घर की महिलाओं को जानवरों की तरह प्रताड़ित करते हैं और उनके बच्चे भूखे रहकर रोते-तड़पते रहते हैं। क्या कभी इस पर विचार किया गया? तो क्या नशे का धंधा करवाने वाले लोगों को ही बार-बार वोट देकर अपना प्रतिनिधित्व सौंपते रहोगे?

अन्यायी-अधर्मी राजनेताओं की स्वार्थपूर्ण गतिविधियों के चलते, पीएफआई जैसे संगठन फलते-फूलते रहेंगे। अपने अन्दर प्रचण्ड ज्वालामुखी पैदा करो, अपनी आत्मशक्ति को प्रबल बनाओ और इन अन्यायी-अधर्मियों के विरुद्ध मुखर होकर आवाज उठाओ। सिर, तन से जुदा करने की बात करते हैं, तो क्या हिन्दुत्व इतना कमजोर हो गया है? हिन्दूधर्म ही एक ऐसा धर्म है, जो मानवता की रक्षा कर सकता है और हिन्दूधर्म है, तभी सभी धर्म सुरक्षित रह सकते हैं। इस्लामिक आतंकवाद के विरुद्ध, वास्तव में इस्लामधर्म को मानने वाले मुल्ला-मौलवियों को आवाज उठानी चाहिए। अरे, तुम भी हिन्दू हो, तुम्हारे पूर्वज हिन्दू थे, जिन्हें कट्टरपंथियों ने जबरन प्रताड़ित करके इस्लामधर्म कबूल करवाया। इस्लामधर्म को तो स्वीकार कर लिया, लेकिन हिन्दुत्व को मत भूलो। कोई भी धर्म हिंसा नहीं सिखाता और जो यह कहते हैं कि तुम हत्या करोगे, तो तुम्हें जन्नत में हूरें मिलेंगी, तो उन मुल्ला-मौलवियों से कहो कि यह जन्नत तुम ही प्राप्त करलो, तुम्हीं उन हूरों को प्राप्त कर लो। अरे, वहाँ कोई हूरें नहीं हैं और जहाँ हूरें हैं, उन्हें बुरका में बन्द रखते हो!

भारत को कोई भी इस्लामिक राष्ट्र नहीं बना सकता। हिन्दुत्व अभी इतना कमजोर नहीं है कि कोई भारत को इस्लामिक राष्ट्र बना सके। पीएफआई जैसे संगठन पनपते रहे और वर्षों बाद जब चुनाव सिर पर आया, तब प्रतिबंध लगाया गया। प्रतिबन्ध लगाया गया, यह अच्छी बात है, लेकिन यही कार्य बहुत पहले कर लेना चाहिए था। हम इस्लाम के विरोधी नहीं हैं, बल्कि हम हर धर्म का सम्मान करते हैं, लेकिन इस्लामिक कट्टरवाद के घोर विरोधी हैं। समस्त हिन्दुओं का आवाहन है कि अपने अन्दर दृढ़ इच्छाशक्ति पैदा करो कि हम अपने उन पावन-पवित्र धार्मिक स्थानों को मुक्त कराके रहेंगे, जिन्हें इस्लामिक कट्टरवादियों ने ढहाकर मस्जि़द बना दिया। लेकिन, कानून के दायरे में रहकर अपनी आवाज उठाएं, अदालतों के माध्यम से अपने धार्मिक स्थानों को हासिल करें। अपने अन्दर ऐसी विचारशक्ति पैदा करो कि पीएफआई जैसे संगठन हावी न होने पाएं। जिस तरह हिन्दुत्व को इस्लामिक आतंकवाद से खतरा है, उसी तरह ईसाईधर्म के कट्रपंथियों से भी खतरा है, जो धीरे-धीरे प्रलोभनों के माध्यम से धर्मपरिवर्तन के कार्य में लगे हुए हैं।

हिन्दूधर्म ही मानवता की रक्षा कर सकता है, समाज को सही दिशा दे सकता है। हम न गलते करते हैं, न गलत सहते हैं और न गलत करने देंगे। इसीलिए भारतीय शक्ति चेतना पार्टी का गठन किया गया है, जिसके माध्यम से भय-भूख-भ्रष्टाचार और आतंकवाद से मुक्त भारत का निर्माण किया जा सके। हम धीरे-धीरे कदम बढ़ा रहे हैं और हमें खजूर के पेड़ की भांति नहीं बढ़ना है, जिससे कोई छांव न पा सके। हमारा लक्ष्य मानवता की सेवा, धर्मरक्षा और राष्ट्र की रक्षा करना है।“

 प्रेरणाप्रद चिन्तन के उपरान्त, प्रवचनस्थल पर उपस्थित धर्मयोद्धाओं ने प्रथम दिवस की तरह ही सद्गुरुदेव जी महाराज के सान्निध्य में पाँच मिनट तक महाशक्ति शंखनाद किया। शंखनाद के बाद सभी ने नित्य साधनाक्रम पूर्ण करते हुए शक्तिस्वरूपा बहनों के द्वारा सम्पन्न की जा रही ‘माँ’-गुरुवर की दिव्यआरती का लाभ एकाग्रभाव से प्राप्त किया।  तत्पश्चात् सभी ने पंक्तिबद्ध होकर एक-एक करके गुरुचरणपादुकाओं का स्पर्श करते हुए प्रसाद ग्रहण किया।

शक्तिस्वरूपा बहनों के द्वारा योग एवं ध्यान साधना का क्रम

तृतीय व अन्तिम दिवस का द्वितीय सत्र

एकाग्रता से ही आत्मशक्ति प्रबल होती है। अपने मन को किसी विषय पर केन्द्रित कर लेना ही एकाग्रता है। एकाग्रता के बिना कोई भी कार्य ठीक ढंग से सिद्ध नहीं होता। ऋषिवर श्री शक्तिपुत्र जी महाराज के चिन्तनों का प्रभावपूर्ण लाभ वही उठा पाते हैं, जिनका मनमस्तिष्क एकाग्र होता है और एकाग्रता ध्यान के द्वारा आती है।

जयकारों व शंखध्वनि के मध्य, प्रवचनस्थल पर ऋषिवर सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज के पधारते ही वातावरण अत्यन्त मनोरम हो उठा। शक्तिस्वरूपा बहनों के द्वारा पदप्रक्षालन का क्रम पूर्ण होने के तुरन्त बाद ही कुछ शिष्यों-भक्तों ने अपने भावसुमन प्रस्तुत किए, जो अंशरूप में प्रस्तुत हैं–

   सद्गुरुदेव, बेसहारों के सहारे आप हो…:-बाबूलाल विश्वकर्मा जी, दमोह। संकल्प हमारा जीवन है, संकल्प ही है आधार। संकल्प हमारी शक्ति है, संकल्प में है सब सार।।…….संकल्प राष्ट्र की रक्षा का, संकल्प धर्म की रक्षा का। आओ मिलकर संकल्प करें हम मानवता की सेवा का।। संकल्प नहीं तो मानव का यह जीवन है बेकार…:-शक्तिस्वरूपा बहन संध्या शुक्ला जी। मुझ पर मेरे सद्गुरुवर का प्यार बनाए रखना माँ…:-वीरेन्द्र दीक्षित जी, दतिया।

 दिव्य आलोक से आलोकित मंच पर विराजमान सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज ने सर्वप्रथम माता जगदम्बे की स्तुति करके प्रवचनस्थल पर उपस्थित अपार जनसमुदाय, शिविर व्यवस्था में लगे हुए शिष्यों-कार्यकर्ताओं और सत्यपथ पर चलने वाले विश्वजनमानस को अपना आशीर्वाद प्रदान किया। इसके पश्चात् आपश्री के मुख से अमृतकणिकाएं बिखरने लगीं–

 “परिवर्तन का चक्र चल चुका है, तीन धाराओं के माध्यम से सत्यधर्म की राह प्रशस्त की जा रही है। आज विजयादशमी का पर्व है और समाज में जगह-जगह वही परम्परागत मंचन किया जा रहा है कि राम ने रावण का वध किया। हर वर्ष यही होता है, लेकिन कोई भी अपने अन्दर व्याप्त असुरत्व को मार नहीं रहा है। इसीलिए मैं कहता हूँ कि रामायण पढ़ने भर से कुछ नहीं मिलने वाला, बल्कि रामायण में जो उद्धृत है कि श्रीराम का जीवनचरित क्या था, कैसा था, उन्होंने सत्यधर्म की स्थापना के लिए कितना संघर्ष किया? उसका अनुकरण करने से जीवन को सही दिशा मिलेगी। श्रीकृष्ण के नाम पर रासलीलाओं का ही मंचन करते रहोगे या उनके कर्ममय जीवन से कुछ सीख लोगे? श्रीकृष्ण के कर्ममय जीवन को देख ही नहीं पा रहे हो कि किस तरह उन्होंने दुष्टों का सर्वनाश किया? और जब उनके परिजन भी अधर्म के रास्ते पर चल पड़े थे, तो उन्हें भी नष्ट करने में देर नहीं की।

मानव में असीमित क्षमताएं हैं, केवल अपनी अध्यात्मिक शक्ति को जानने की आवश्यकता है। आप मानवता का कल्याण करें, स्वकल्याण करें। मेरे शिष्य अध्यामिक यात्रा तय करते हुए हजारों-हजार लोगों के जीवन को बदल रहे हैं, उन्हें सत्यधर्म की राह दिखा रहे हैं। इस पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम पर, जो ‘माँ’ का अखण्ड गुणगान चल रहा है, उसी का परिणाम है कि लाखों-लाख लोगों के जीवन में परिवर्तन आ रहा है। आपके गुरु ने अपने एक-एक पल की साधना को समाजकल्याण के लिए समर्पित किया है। परमसत्ता हर पल हम पर अपनी कृपा बरसाती हैं, उसी प्रकार हमारा कर्त्तव्य है कि अपने जीवन के हरपल का सदुपयोग करें। जो बीत गया, वह निकल गया, जबकि वर्तमान हमारे हाथ में है। अत: वर्तमान को संवारें, भविष्य स्वमेव संवर जायेगा। सत्यपथ पर स्वयं बढ़ें और दूसरों को बढ़ाएं, स्वयं को बदलें और अपने बच्चों को संस्कारवान बनाएं। धर्म, धैर्य, पुरुषार्थ का त्याग किसी भी परिस्थिति में न करें और जो इनका त्याग नहीं करता, वह बड़ी से बड़ी समस्याओं से पार निकल जाता है। समस्याओं का समाधान ‘माँ’ की भक्ति से ही होगा और ‘माँ’ की भक्ति के लिए सबसे पहले आपको नशे-मांसाहार से मुक्त चरित्रवान् जीवन अंगीकार करना होगा। आज विजयदशमी का पर्व है और आज मेरे हृदय को कुछ शान्ति मिली है कि मेरा ‘महाशक्ति शंखनाद’ शिविर अपना प्रभाव दिखाने लगा है। 25 वर्षों की साधनात्मक यात्रा के बाद, मेरा संकल्प था कि जब महाशक्तियज्ञस्थल की नीव पड़ेगी, तब महाशक्ति शंखनाद करूँगा।“

धर्म की आड़ में भ्रमजाल फैलाए हुए पण्डोखर महाराज जैसे तथाकथित धर्माचार्यों पर कुठाराघात करते हुए ऋषिवर ने कहा-

“पण्डोखर महाराज, मैंने इस शिविर के प्रथम दिवस, जो साधनात्मक चुनौती रखी थी, उसका असर होने लगा है। शायद आपने मुझे पहचाना नहीं है, मैं न जाने कब से चुनौती देता आ रहा हूँ? मैं आया ही हूँ सत्यधर्म की रक्षा के लिए और मैंने साधनात्मक तपबल की चुनौती दी है। मैंने तो इसके लिए सभी का ससम्मान आवाहन किया है और जो सत्यधर्म के अनुयायी हैं, वे मेरी बात अवश्य मानेंगे।

इस धरती पर एक ऐसा आयोजन होना चाहिए, जिसमें सभी शंकराचार्य, कथित सिद्धसाधक, धर्माचार्य, मीडिया, वैज्ञानिक और देश के बुद्धिजीवी उपस्थित हों। आज अनेक लोग अपने आपको सिद्धसाधक कहते हैं, जो साधना से शून्य हैं और उनमें राक्षसी प्रवृत्ति भरी हुई है। हाँ, ऐसे लोगों के विरुद्ध मैंने आवाज उठाई है, देश के कोने-कोने में, अपने अनेक शिविरों के माध्यम से आवाज उठाई है और धर्मरक्षा के लिए साधनात्मक शक्तिपरीक्षण की चुनौती दी है। मैंने ऐसे कथावाचकों के विरुद्ध आवाज उठाई है, जो अपने प्रवचनस्थलों पर नाच-रासरंग की पहले से व्यवस्था करके रखते हैं और रत्नों की अंगूठियाँ धारण किए रहते हैं और कहते हैं कि कथा सुनलो, भागवत सुन लो, कल्याण हो जायेगा। अरे, कितनी बार कथा कर चुके हो, भागवत सुना चुके हो, तो तुम्हारा कल्याण नहीं हुआ और ग्रहशान्ति के लिए रत्नों की अंगूठियाँ पहने हुए हो। मैंने गद्दी के लिए लड़ रहे, गरीबों और मातृशक्तियों को अपमानित करने वाले शंकराचार्यों के विरुद्ध आवाज उठाई है, आशाराम, रामपाल जैसे लोगों के विरुद्ध आवाज उठाई है, रामदेव के विरुद्ध आवाज उठाई है, जिन्होंने योग को पेशा बना लिया था। तो, क्या पण्डोखर महाराज, तुम इनके समर्थक हो? यदि आपके पास सहनशीलता होती, तो मेरी बात का समर्थन करते कि हाँ आयोजन होना चाहिए।

चुनौती मैंने दी है और उस आयोजन में यदि कोई अपनी साधनात्मकशक्ति का अहसास करा देगा, तो मैं उससे दस गुना अधिक करके दिखा दूँगा। आपने कहा है कि मैं चुनौती स्वीकार करता हूँ, अच्छी बात है। मैं यही तो चाहता था कि कोई तो सामने आए, किसी को तो चीटा काटे। लेकिन, मैंने पहलवानी लड़ने की नहीं, बल्कि शक्तिपरीक्षण की चुनौती दी है। मैं समाज की आँखें खोलना चाहता हूँ, समाज को सम्मोहित नहीं करता। बादल कितने भी छा जाएं, लेकिन जब सूर्य निकलता है, तो उसके प्रकाश से वे लुप्त हो जाते हैं।

समाज को दिशा देना मेरा कर्त्तव्य है और यही कर्त्तव्य सभी धर्माधिकारियों का है, लेकिन वे अपना कर्त्तव्य पूरा नहीं कर रहे हैं। मेरा जीवन परोपकार के लिए समर्पित है और ढोंगी-पाखंडियों के विरुद्ध मैं अपनी आवाज उठाता रहूँगा। हिन्दूधर्म में भी कई धर्मगुरु, इस 21वीं सदी में भी जादू-टोना और भूत-प्रेत के नाम पर समाज को मूर्ख बना रहे हैं! मेरी यह यात्रा जनकल्याण, परोपकार से जुड़ी हुई है, मैं ‘माँ’ शब्द के बल पर काम करता हूँ, मेरे यहाँ तन्त्र-मन्त्र का कोई काम नहीं होता।“

चिन्तन के उपरान्त, शिविर में उपस्थित अपार जनसमुदाय ने प्रथम दो दिवस की तरह ही पाँच मिनट तक सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज के सान्निध्य में महाशक्ति शंखनाद किया, जिसका सम्पूर्ण चराचर जगत् साक्षी बना। पश्चात् सभी ने दिव्यआरती का लाभ प्राप्त किया और पंक्तिबद्ध होकर एक-एक करके आपश्री की चरणपादुकाओं को स्पर्श करते हुए प्रसाद लेकर गौरवान्वित हुए।

लाखों लोगों ने योग-ध्यान-साधना के क्रमों को सीखा

‘महाशक्ति शंखनाद’ शिविर के प्रथम दिवस के प्रथम सत्र में योग-ध्यान-साधना सीखने की ललक लिए प्रवचन स्थल पर उपस्थित भक्तों, गुरुभाईयों-बहनों को सम्बोधित करते हुए शक्तिस्वरूपा बहन संध्या शुक्ला जी ने योग के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि योगविधा अपनाने से शरीर व मनमस्तिष्क स्वस्थ रहता है और स्वस्थ मनुष्य ही अपने कर्त्तव्यों का निर्वहन अच्छी तरह कर सकता है। 

शक्तिस्वरूपा बहन ने योग के विभिन्न आसनों व ध्यान-साधना के बारे में बतलाया, जिसे सुनकर व प्रशिक्षित शिष्यों की क्रियाओं को देखकर लाखों लोगों ने योग-ध्यान-साधना के क्रमों को सीखा।

इस प्रकार त्रिदिवसीय शिविर के प्रथम दो दिवस, प्रथम सत्र की प्रात:कालीन बेला में 07:30 बजे से 09:00 बजे तक योग-ध्यान-साधना के क्रमों को सम्पन्न किया गया। इस अवसर पर शक्तिस्वरूपा बहन पूजा दीदी जी और ज्योति दीदी जी भी उपस्थित रहीं।

शिविर का तृतीय दिवस, प्रथम बेला

गुरुदीक्षा क्रम “महाशक्ति शंखनाद”

15 हजार से अधिक नए भक्तों ने ली गुरुदीक्षा

शक्ति चेतना जनजागरण शिविर के तृतीय दिवस, मंच स्थल पर प्रात: 07:00 बजे से गुरुदीक्षा कार्यक्रम प्रारम्भ हुआ। इस अवसर पर लगभग 15 हजार नये भक्तों ने गुरुदीक्षा प्राप्त करके चेतनापूर्ण नवजीवन का संकल्प लिया। दीक्षा प्रदान करने से पूर्व गुरुवरश्री ने कहा कि “भौतिक जगत् में अनेक रिश्ते-नाते होते हैं, मगर मनुष्य के जीवन का सबसे अधिक पावन व पवित्र रिश्ता गुरु और शिष्य का होता है। इस रिश्ते से जुड़ने के साथ ही सत्यपथ पर चलने की प्रेरणा, उसे सहजभाव से प्राप्त होने लगती है। मेरे द्वारा अपने शिष्यों को अपनी चेतनाशक्ति से अपने हृदय में धारण किया जाता है। शिष्य मेरे जीवन के अंश हैं और मेरी लक्ष्य की पूर्ति के लिए माता भगवती आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा की चेतना, माँ की दिव्यज्योति, जन-जन तक पहुँचाने में अहम भूमिका का निर्वहन करते हैं।

दीक्षा प्राप्त करके कर्म करना पड़ेगा, मेरे नियमों-निर्देशों का अक्षरश: पालन करना पड़ेगा। स्वकल्याण के लिए स्वप्रयत्न करना पड़ेगा। मेरा संकल्प है कि अच्छाइयों की ओर, सत्य के पथ पर, तुम एक कदम आगे बढ़ोगे, तो मैं तुम्हें दस कदम आगे बढ़ा दूँगा। दीक्षा लेने के साथ ही आप सभी नशे-मांसाहार से मुक्त  चरित्रवान्, चेतनावान्, पुरुषार्थी और परोपकारमय जीवन जिओगे। फिर पाओगे कि तुम्हारा जीवन निरन्तर उन्नति के पथ पर बढ़ता जा रहा है। इस बात का ध्यान रखें कि अज्ञानता में की गई गलती क्षम्य होती है, लेकिन जानबूझकर की गई गलतियाँ क्षम्य नहीं है, उसके लिए दण्ड के भागी अवश्य बनोगे।“

परम पूज्य गुरुवरश्री ने कहा कि मैं शक्तिपात के माध्यम से सभी को अपनी चेतना से आबद्ध कर रहा हूँ। पश्चात् उन्होंने सहायक शक्तियों गणेश जी, भैरव जी एवं हनुमान जी के मंत्र के साथ चेतनामंत्र ॐ जगदम्बिके दुर्गायै नम: एवं गुरुमन्त्र  ॐ शक्तिपुत्राय गुरुभ्यो नम: प्रदान किया। अंत में सभी नये दीक्षाप्राप्त शिष्यों ने सद्गुरुदेव जी महाराज को नमन करते हुये, उनकी चरणपादुकाओं को स्पर्श करके निरूशुल्क शक्तिजल एवं सिद्धाश्रम पत्रिका तथा प्रसाद प्राप्त किया।

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