130वाँ शक्ति चेतना जनजागरण शिविर, डिंडौरी 8-9 फ़रवरी 2025

हमारे देश में चहुंओर कुकुरमुत्ते की तरह फैले तथाकथित ढोंगी-पाखंडी कथावाचकों, धर्माचार्यों के द्वारा धर्म के नाम पर नाच-रास-रंग के आयोजन से युवावर्ग में नास्तिकता का बीजारोपण हो रहा है और दिनोंदिन परमसत्ता की भक्ति के प्रति अनास्था बढ़ती जा रही है। इसी अनास्था का परिणाम है कि जहाँ देखो, वहाँ अशांति का वातावरण है। आपसी भाईचारे की भावना समाप्त हो चुकी है और विलासिता व स्वार्थ के वशीभूत लोग एक-दूसरे को क्षति पहुंचाने में लगे हुये हैं। मनुष्यों को इस विनाशकारी स्थिति से बचाने और समाज को मानवीय कर्त्तव्य का बोध कराने के लिए ऋषिवर सद्गुरुदेव परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज ने अपने शक्ति चेतना जनजागरण शिविरों में अमोघ चिन्तन प्रदान किए हैं और एक बार पुन: समाज का चेतनात्मक विकास हो, इस हेतु दिनांक 8-9 फ़रवरी 2025 को मध्यप्रदेश के जि़ला डिण्डौरी में 130वाँ शिविर आयोजित किया गया, जिसमें लगभग पाँच हजार नए भक्तों ने आपश्री से दीक्षा प्राप्त करके नशे-मांसाहार से मुक्त चरित्रवान्, चेतनावान्, पुरुषार्थी और परोपकारमय जीवन अंगीकार करने सहित ग्यारह संकल्प लिए।

आयोजित शिविर में ऋषिवर सद्गुरुदेव परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज के शिष्यों व माता जगदम्बे के भक्तों का प्रवाह उमड़ पड़ा था। सभी ने जहाँ चिन्तनरूपी ज्ञानामृत का पान किया, वहीं प्रवाहित विशेष चेतनातरंगों से अविभूत रहे।

शिविर के प्रथम दिवस प्रथम सत्र में प्रात: 08:00 बजे ‘माँ’ के भक्तों ने प्रवचन स्थल पर बैठकर पूरे मनोयोग से अतिमहत्त्वपूर्ण बीज मंत्र ‘माँ-ॐ’ का सस्वर जाप किया व शक्तिस्वरूपा बहनों के सान्निध्य में योगविधा को सीखा और दोनों दिवस द्वितीय सत्र में शक्तिस्वरूपा बहनों के द्वारा की गई ‘माँ’-गुरुवर की दिव्यआरती का लाभ प्राप्त किया।

 शिविर पण्डाल में प्रथम दो दिवसों में प्रात:कालीन क्रम के बाद अपराह्न एक बजे से भावगीतों का क्रम रहता था। तदुपरान्त, प्रवचनस्थल पर उपस्थित जनसमुदाय के द्वारा ‘माँ’-गुरुवर के जयकारे लगाए जाते और वातावरण में तरंगित शंखध्वनि के मध्य ऋषिवर सद्गुरुदेव जी महाराज का शुभागमन होता था।

प्रथम दिवस का द्वितीय सत्र

 माता आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा के भक्तों और ऋषिवर सद्गुरुदेव परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज के शिष्यों-भक्तों व क्षेत्रीयजनों का प्रवाह, डिण्डौरी जि़ला मुख्यालय में जबलपुर बायपास रोड, अम्बे राइस मिल के पास स्थित विशाल मैदान में उमड़ा पड़ा था। सभी ने क्रमवार स्थान ग्रहण किया। दिनांक 08 फ़रवरी को अपराह्न 01:45 बजे शिविर स्थल पर उपस्थित अपार जनसमुदाय के द्वारा लगाए जा रहे जयकारों व शंखध्वनि के मध्य ऋषिवर सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज का आगमन हुआ। शक्तिस्वरूपा बहनों ने उपस्थित भक्तों की ओर से सुसज्जित व भव्यमंच पर आसीन परम पूज्य गुरुवरश्री के श्रीचरणों को जल से पखारकर पुष्प समर्पित किए।

तत्पश्चात् भगवती मानव कल्याण संगठन के कुछ कलाकार सदस्यों के द्वारा ‘माँ’-गुरुवर के श्रीचरणों में भावगीत प्रस्तुत किए गए। प्रथम दिवस प्रस्तुत भावगीतों केप्रारंभिक अंश इस प्रकार हैं-

 कार्यक्रम का संचालन करते हुए वीरेन्द्र दीक्षित जी, दतिया के द्वारा प्रस्तुत भावगीत- गुरुवरश्री के चरणों में हमारे रम गए नैना। सिद्धाश्रमरत्न अनूप जी- पाकर शरण तुम्हारी दुनिया में छा रहे हैं, तूफानों के आगे भी दिए जगमगा रहे हैं। बाबूलाल विश्वकर्मा जी, दमोह- जो हैं शक्ति के सिंधु और कृपा के निधान,…।

ऋषिवर के दिव्य चिन्तन

उपस्थित शिष्यों-भक्तों, चेतनाअंशों, शिविर व्यवस्था में लगे हुए कार्यकर्ताओं और नर्मदा तट पर बसे हुए डिण्डौरी जि़ले के वासियों को अपना पूर्ण आशीर्वाद प्रदान करते हुए ज्ञानगुणनिधान सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज कहते हैं कि

शहर क्षेत्र का अपना एक अलग महत्त्व होता है और उस क्षेत्र के रहने वाले भी अपने क्षेत्र में फैली ऊर्जाशक्ति के बारे में नहीं जान पाते, उसे एक साधक ही जान सकता है, पहचान सकता है। लगभग 10 वर्ष पूर्व एक यात्रा में मैं यहाँ से गुजरा था और एक रात्रि विश्राम भी किया था, तभी मैंने यह निर्णय ले लिया था कि डिण्डौरी में अपना एक शिविर अवश्य सम्पन्न करूंगा और वह क्षण आज उपस्थित है।

शक्तिसाधकों का, ‘माँ’ के भक्तों का, नशे-मांसाहार से मुक्त चरित्रवान्, चेतनावान् जीवन जीने वालों का अद्भुत समागम होता है, जहाँ पवित्र मन-वचन-कर्म से लोग उपस्थित होते हैं और वहाँ सहजभाव से पवित्रता का, सात्विकता का वातावरण निर्मित होजाता है। एक प्रचण्ड ऊर्जा वहाँ के वातावरण में व्याप्त होने लगती है और उसका लाभ वर्तमान में भी क्षेत्रीय जनमानस उठाता है तथा आनें वाले समय में भी सत्य की ऊर्जातरंगों का लाभ समाज को प्राप्त होता रहता है।

डिण्डौरी जि़ले की यह भूमि भी अत्यन्त सौभाग्यशाली है, जहाँ पर माता भगवती आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा की दो अतिमहत्त्वपूर्ण आरतियाँ सम्पन्न होनी हैं। जगत् जननी की यह पावन-पवित्र यात्रा उनके ही निर्देश व मार्गदर्शन पर चल रही है और एक महत्त्वपूर्ण लक्ष्य को लेकर इस सत्य की ऊर्जा का प्रवाह पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम से प्रवाहित हो रहा है। 

वर्तमान समय में समाज अपनी मूल विचारधारा से दूर-दूर तक भटक चुका है, वह इतनी दूर भटक चुका है कि उसे अपने मूल का ज्ञान ही नहीं रहा। उसे यह भी नहीं मालूम कि उसका मूल है क्या? जब समाज अपनी मूल विचारधारा से भटक जाता है, तो मूल को जानने के लिए कभी दो कदमइधर, तो कभी दो कदम उधर चलता है और उसे सही आश्रय नहीं मिल पाता। क्षणिक संतोष, क्षणिक तृप्ति उसके जीवन में आती रहती है, मगर जब वह मूल से भटक जाता है, तो न उसके जीवन में स्थायित्व आ पाता है, न ठहराव आ पाता है और पूरा जीवन झंझावातों से ग्रसित होकर रह जाता है।

मूल तृप्ति, जो हमारे जीवन की मूल धरोहर है, उस ओर मैं आपको इंगित कराने आया हूँ। वर्तमान में दृश्यजगत् और अदृश्यजगत् दोनों दृष्टि से समाज भटका हुआ है और जब हम इन दोनों से भटक जाते हैं, तो अपने सूक्ष्म को जान ही नहीं सकते। आज भौतिक जगत् में जो ज्ञान समाज को दिया जा रहा है, उससे आपको मूल लक्ष्य की प्राप्ति कभी नहीं हो सकती, क्योंकि ज्ञान देने वाले स्वयं मूल से दूर हटते जा रहे हैं। मूल की ओर आपको वही ले जा सकता है, जिसने स्वयं मूल को प्राप्त किया हो, जिसने मूल को जाना हो, जिसने मूल को समझा हो, जिसकी कुण्डलिनीशक्ति जाग्रत् हो और जो दृश्य व अदृश्य जगत् को समझता हो।

दुर्भाग्य से हमारे सनातन का एक लम्बा अन्तराल गुलामी के कालखण्ड में गुजर गया और हम भूल गए उन ऋषियों-मुनियों को, हम भूल गए उन तपस्वियों को, उन साधकों को, जो सात्विकता की पराकाष्ठा का जीवन जीते थे। इतना विराट, इतना विशाल उनका हृदय था कि वे अपना सर्वस्व समाजकल्याण के लिए न्यौछावर कर देते थे। लेकिन, आज हमारा सनातन कथावाचकों के शिकंजे में कसता जा रहा है। मुझे यह कह देने में कोई आपत्ति नहीं है कि कथावाचकों को तपस्वी होना चाहिए, त्यागी होना चाहिए, लेकिन नहीं। अधिकांश कथावाचक धर्म को केवल आय का जरिया मान बैठे हैं।

हमारे जो पूर्व के कथावाचक होते थे, वे त्रिकालज्ञ होते थे, उनमें वाक्शक्ति होती थी, वे तपस्यात्मक जीवन जीते थे और जब वे भगवान् का गुणगान करते थे, तो लोगों का आत्मकल्याण होता था। यदि मैं कहूँ कि 90 प्रतिशत कथावाचक सनातन को अपनी चंगुल में जकड़कर बैठे हैं, तो अतिशयोक्ति न होगी। समाज के लोग इनकी काल्पनिक कथाओं में उलझे रहते हैं। यदि यही हाल रहा तो साधक, तपस्वी कभी पैदा ही नहीं होंगे, राष्ट्रभक्त पैदा ही नहीं होंगे, क्योंकि ये कथावाचक लोभी, लम्पट व लालची हैं और काल्पनिक कहानियाँ सुना-सुनाकर, नाच-रास-रंग रचाकर समाज को केवल ठगने का कार्य कर रहे हैं।

  वास्तविक ज्ञान न मिल पाने के कारण ही आज हमारा युवावर्ग भटकता जा रहा है, अपनी शक्ति-सामर्थ्य खोता जा रहा है, नशे से ग्रसित होता जा रहा है और उन पर नास्तिकता हावी है। नाचने-गाने से शक्ति-सामर्थ्य प्राप्त नहीं होगी, अपितु सामर्थ्य प्राप्त होती है तप के पथ पर चलने से, संस्कारवान बनने से, सत्य के पथ पर चल करके, निष्ठा-ईमानदारी के पथ पर चल करके। तथाकथित ढोंगी-पाखंडी कथावाचक चमत्कार दिखाने की बात करते हैं। अरे, इससे समाज का कल्याण नहीं होने वाला। मैं कभी चमत्कार नहीं करता, मेरी यात्रा ही चमत्कार है।

अगर वास्तव में अपने मूल को पकड़ना है, तो हमें साधक बनना पड़ेगा, तपस्वी बनना पड़ेगा। हमें उन विचारधाराओं को धारण करना पड़ेगा कि हमारे पूर्वज, हमारे माता-पिता, हमारे ऋषि-मुनि कैसा जीवन जीते थे? क्या वे सुबह आठ-नौ बजे तक पड़कर सोते थे? आज अधिकांश कथावाचकों की स्थिति ऐसी है कि आठ-आठ, नौ-नौ बजे तक सोते रहते हैं और जब उठते हैं, तो यह विचार करते हैं कि समाज को कैसे मूर्ख बनाएं, जिससे करोड़पति बन सकें! उनके पास कोई साधना नहीं, कोई तपस्या नहीं, कुछ ग्रन्थों को रट लिया बस! यदि स्वयं का कल्याण चाहते हो, तो तपस्या के पथ पर चलना पड़ेगा। काल्पनिक कथाएं सुन लेने से कल्याण नहीं होने वाला। हमें अपने आहार, विचार, व्यवहार पर ध्यान देना होगा।

सनातन की रक्षा के नाम पर बड़ी-बड़ी भविष्यवाणियाँ करने वाले, बड़े-बड़े नारे लगाने वाले ही सनातन को गर्त में ले जा रहे हैं। हमारा जीवन कैसा होना चाहिए, सनातनियों का जीवन किस तरह का होना चाहिए? इस दिशा में धूर्त कथावाचकों के द्वारा समाज को नहीं बताया जाता कि सात्विकता का, पवित्रता का जीवन जियो और ऐसा जीवन ही सर्वोच्च जीवन है।

 मैं समाज के सभी वर्गों से कहता हूँ , उन सभी पिछड़े, गरीब, दलित वर्ग से कहता हूँ कि आओय ये सनातन तुम्हारा है, हिन्दूधर्म तुम्हारा है। आओ, सनातन के प्रखर पहरेदार बनो। सनातन पर पहले तुम्हारा अधिकार था, है और रहेगा। किसी के बहकावे में मत आओ, आगे बढ़ो, सनातन से दूर मत जाओ, क्योंकि सनातन से दूर जाने का मतलब होगा, पतन की ओर जाना। पुरुषार्थी बनो, परोपकारी बनो। कोई कार्य छोटा-बड़ा नहीं है। मजदूरी हो, कृषि कार्य हो, अन्य कार्यों से ये श्रेष्ठ कार्य हैं। अपनी भूमि से प्रेम करना सीखो, अपनी भूमि को बेचो मत। 

हाल ही की घटना को देख लो कि अरविन्द केजरीवाल इतनी बड़ी, इतनी विराट विचारधारा को लेकर उपस्थित हुए थे। क्या लोगों ने साथ नहीं दिया? भरपूर साथ दिया। पिछड़े, वंचित, शोषित, जितने भी थे, सभी उनके साथ लग गए और चुनाव में बहुमत से जिताया भी। लेकिन जब कथनी और करनी में बहुत बड़ा अन्तर होता है, तो उसका परिणाम भोगना ही पड़ता है। उन्होंने सत्ता प्राप्त होने के बाद सच्चाई, ईमानदारी का रास्ता तय नहीं किया। आतंकियों से, खालिस्तानियों से साठगांठ, नक्सली मानसिकता के लोगों से साठगांठ कि किसी तरह हम दिल्ली के साथ ही पूरे देश में राज कर लें! जब राजभोग की इच्छा किसी के अन्दर पैदा होजाती है, तो वह राजनेता नहीं, अपितु देश का सबसे बड़ा लुटेरा है।

राजसत्ताओं में बैठने का मौका बड़े सौभाग्य से मिलता है, पूर्व के जो संस्कार होते हैं, उन संस्कारों के फलस्वरूप मिलता है, तो हमें पूरा जीवन देशसेवा में, समाजसेवा में लगा देना चाहिए, देश को नशामुक्त, भ्रष्टाचारमुक्त करने में लगा देना चाहिए। जो सरकारें नशे का व्यवसाय चलाती हैं, वे कभी राष्ट्रभक्त हो ही नहीं सकती। मैंने भारतीय शक्ति चेतना पार्टी का गठन किया है, मगर सत्तासुख भोगने के लिए नहीं। देश को नशामुक्त बनाने, भ्रष्टाचारमुक्त बनाने के लिए पार्टी धीरे-धीरे अपना धरातल मजबूत कर रही है। जो पार्टी अच्छा कार्य करती है, हम उसका सहयोग भी करते हैं। हर अच्छे कार्य के लिए तथा जो धर्म, राष्ट्र और मानवता की सेवा करना चाहते हैं, उन्हें भारतीय शक्ति चेतना पार्टी और भगवती मानव कल्याण संगठन मदद करने के लिए हर समय तैयार हैं।

यहाँ पर इस शिविर में उपस्थित मध्यप्रदेश के पशुपालन और डेयरी विकासमंत्री लखन पटेल से भी चाहूंगा कि वे प्रदेश को नशामुक्त करने की मेरी विचारधारा को मुख्यमंत्री तक अवश्य पहुंचाएं, क्योंकि जब तक हमारा देश, हमारा प्रदेश नशामुक्त नहीं होगा, तब तक देश व प्रदेश का चहुंमुखी विकास सम्भव नहीं है।|

मंत्री महोदय का उद्बोधन

मध्यप्रदेश शासन के पशुपालन एवं डेयरी विकासमंत्री लखन पटेल जी ने ‘माँ’-गुरुवर के चरणों में प्रणाम करते हुए कहा कि सम्पूर्ण भारत में गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज आपका एक ऐसा संगठन है, जो लोगों का जीवन बदलने का कार्य कर रहा है और लोगों का जीवन ही नहीं बदल रहा, बल्कि उनके पूरे परिवार को आगे लाने का कार्य कर रहा है।

गुरुदेव जी, आप जो सनातन को आगे बढ़ाने का कार्य कर रहे हैं, वह स्वागत योग्य है। मैं दमोह जि़ले का हूँ, उस जि़ले के जो लोग आपके सान्निध्य में आए, वे सभी नशे से दूर हुए। आपने ऐसे हजारों परिवारों का जीवन बचाने का कार्य किया है।

गुरुदेव जी आपने जो कहा है, निश्चित रूप से उस बात को प्रदेश के मुख्यमंत्री तक पहुंचाऊंगा और मुझे पूर्ण विश्वास है कि उस पर सारगर्भित निर्णय लिया जायेगा। अभी हमारी सरकार ने 17 जगहों पर शराबबन्दी की शुरुआत की है। आपके आशीर्वाद से मुझे जो विभाग मिला है, वह गऊ सेवा का विभाग है, उसमें मुझे कार्य करने का सुअवसर मिला हुआ है। निराश्रित गऊ माताएं सड़कों पर न दिखें और उन्हें कष्ट न हो, इसके लिए हमारी सरकार बड़ी योजना बना करके बड़े-बड़े गौ-अभ्यारण्य, बड़ी-बड़ी गौ-शालाएं बनवाने जा रही है, जहाँ 15-15, 20-20 हजार गायों को रखने का प्रावधान किया जा रहा है और यह कार्य जल्द ही शुरू हो जायेगा। मैं पुन: कहना चाहता हूँ कि प्रदेश के माननीय मुख्यमंत्री तक आपका संदेश पहुँचाऊंगा और उस पर कार्य होगा, ऐसा मुझे पूर्ण विश्वास है।|  

लखन पटेल जी के उद्बोधन के बाद सद्गुरुदेव जी महाराज ने अपना चिन्तन पुन: प्रारम्भ करते हुए कहा कि “मंत्री महोदय जिस विभाग के मंत्री हैं, यदि उस विभाग का नाम गऊ सेवा विभाग रख दिया जाए, तो और अच्छा होगा। हमारे संगठन ने मांग की थी कि बड़े-बड़े गौ-अभ्यारण्य बनाए जाएं, जिससे गायों का संरक्षण किया जा सके और हमारी मध्यप्रदेश सरकार ने, मंत्री जी ने उस दिशा में पहल की है, इसके लिए मैं उन्हें आशीर्वाद प्रदान करता हूँ और यह मेरी भविष्यवाणी है कि अगर प्रदेश में पूर्ण नशाबन्दी कर दी जाए, तो अगली बार पुन: बीजेपी की सरकार का प्रदेश में आना सुनिश्चित होगा। एक ऋषि की वाक्शक्ति क्या होती है, यह समाज देख सकता है। मैं एक बार पुन: सभी को अपना आशीर्वाद प्रदान करता हूँ। बोलो जगदम्बे मात की जय।“

ऋषिवर के प्रथम दिवस के चिन्तन उपरान्त, शिविर में लाखों की संख्या में उपस्थित साधकों, भक्तों, श्रद्धालुओं ने क्रमबद्ध रूप से गुरुचरणपादुकाओं को स्पर्श करके प्रसाद प्राप्त किया।

लगभग पाँच हजार नए भक्तों ने ली गुरुदीक्षा 

शिविर के द्वितीय दिवस के प्रथम सत्र में 08:00 बजे से गुरुदीक्षा का क्रम प्रारम्भ हुआ। सद्गुरुदेव परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज ने नए भक्तों को दीक्षा प्रदान करने से पूर्व आशीर्वाद प्रदान करते हुए चिन्तन दिया कि “मानवजीवन का एक जन्म माता-पिता के संयोग से होता है, जबकि दूसरा जन्म हमारा उन क्षणों पर होता है, जब हम एक चेतनावान् गुरु से दीक्षा प्राप्त करते हैं। गुरु और शिष्य का रिश्ता इस भूतल पर सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण होता है। यह आत्मीयता का रिश्ता होता है। हर पल गुरु अपने शिष्य का कल्याण चाहता है। दुनिया के सभी रिश्ते आदान-प्रदान के होते हैं, लेकिन एक चेतनावान् गुरु अपने शिष्य से कुछ नहीं चाहता है, केवल अपने शिष्यों का उत्थान चाहता है।

 गुरु और शिष्य का रिश्ता पावन, पवित्र और अटूट होता है, चूँकि यह आत्मा का आत्मा से मिलन का रिश्ता होता है। जिस मनुष्य ने इस रिश्ते को महत्त्व दे दिया और इस रिश्ते से जुड़ करके गुरु के मार्गदर्शन में जीवन जीना प्रारम्भ कर देता है, ऐसे मनुष्य का पतन कभी नहीं होता।“ चिन्तन के पश्चात् सद्गुरुदेव जी ने सहायक शक्तियों हनुमान जी का मंत्र- ॐ हं हनुमतये नम:, भैरव जी का मंत्र- ॐ भ्रं भैरवाय नम: एवं गणेश जी का मन्त्र- ॐ गं गणपतये नम: के साथ चेतना मन्त्र- ॐ जगदम्बिके दुर्गायै नम: और गुरुमन्त्र- ॐ शक्तिपुत्राय गुरुभ्यो नम: प्रदान करते हुये कहा कि मैं सभी को मन, वचन, कर्म से शिष्य रूप में स्वीकार करता हूँ। 

 दीक्षा ग्रहण करने के पूर्व शिष्यों ने संकल्प लिया कि “मैं…आज इस साधनात्मक शक्ति चेतना जनजागरण शिविर में मन-वचन-कर्म से दृश्य एवं अदृश्य जगत् की समस्त शक्तियों, दसों दिशाओं, पंचतत्त्वों तथा उपस्थित जनसमुदाय को साक्षी मानते हुए संकल्प करता/करती हूँ कि मैं बह्मर्षि धर्मसम्राट् युग चेतना पुरुष सद्गुरुदेव परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज को अपना धर्मगुरु स्वीकार करता/करती हूँ। परम पूज्य सद्गुरुदेव जी को साक्षी मानकर संकल्प करता/करती हूँ कि मैं जीवनपर्यन्त नशा-मांसाहारमुक्त व चरित्रवान् जीवन जीने के साथ ही परम पूज्य सद्गुरुदेव जी के हर आदेश का पूर्णतया पालन करूंगा/करूंगी तथा गुरुदेव जी के द्वारा मानवता की सेवा, धर्मरक्षा एवं राष्ट्ररक्षा के लिए प्रदत्त तीनों धाराओं के प्रति पूर्णरूपेण समर्पित रहते हुए तीनों धाराओं से मिलने वाले हर आदेश का पालन करूंगा/करूंगी। मैं भगवती मानव कल्याण संगठन के नियमों-निर्देशों का पालन करने के साथ ही भगवती मानव कल्याण संगठन एवं पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम के प्रति तन-मन-धन से पूर्णतया समर्पित रहूँगा/र हूँगी एवं संगठन के जनकल्याणकारी कार्यों में अपनी पूर्ण क्षमता के साथ सहभागी बनूँगा/बनूँगी।“

अन्त में सभी नये शिष्यों ने सद्गुरुदेव जी महाराज को श्रद्धाभाव से नमन करते हुय शक्तिजल प्राप्त किया। 

 द्वितीय दिवस का द्वितीय सत्र

शक्ति चेतना जनजागरण शिविर के द्वितीय दिवस दिनांक 09 फ़रवरी को भी प्रथम दिवस की तरह सद्गुरुदेव जी महाराज के आगमन और उनके मंचासीन होने के पश्चात् शक्तिस्वरूपा बहनों ने पदप्रक्षालन का क्रम पूर्ण किया गया। इसके बाद कुछ शिष्यों ने भावगीत प्रस्तुत किए, जिसके प्रारम्भिक अंश इस प्रकार हैं–

सिद्धाश्रम चेतना अद्वैत जी- करो साधना निशदिन घर में,…। प्रतीक मिश्रा जी, सिद्धाश्रम- गुरुवर जी हैं वरदानी,…। बाबूलाल विश्वकर्मा जी- इ जनम निभाई जैसो, वैसो हर जनम निभइयो।

ऋषिवर के दिव्य चिन्तन

“शिविरस्थल पर उपस्थित शिष्यों-भक्तों, चेतनाअंशों, नर्मदा तट पर बसे डिण्डौरी जि़ले के लोगों और विश्व के धर्मप्रेमी जनमानस को आशीर्वाद प्रदान करते हुए कर्म, भक्ति और ज्ञानप्रदाता ऋषिवर सद्गरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज कहते हैं कि

“ममतामयी माँ का जब हम स्मरण करते हैं, तो सहजभाव से हमारे हृदय में ममता, दया, करुणा, प्रेम, वात्सल्य हिलोरे लेने लगता है। माता भगवती आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा हमारी मूल इष्ट हैं और उनकी आराधना से बढ़ करके कोई दूसरी आराधना पूर्ण नहीं है। आज हजारों लोगों ने दीक्षा प्राप्त की। समाज में जो परिवर्तन देखने को मिल रहा है, वह भगवती मानव कल्याण संगठन के प्रयासों के फलस्वरूप है। संगठन के कार्यकर्ता पहले अपने जीवन में परिवर्तन डालते हैं, उसके बाद समाज में परिवर्तन डालने का कार्य करते हैं। चूँकि हम सभी उसी मूल लक्ष्य को लेकर चल रहे हैं कि हम बदलेंगे, तो जग अवश्य बदलेगा। अगर हम अपने अन्दर के पुष्प को खिलाने में सफल होगए, तो उसके बगल से निकलने वाला, उसका अनादर करने वाला भी उसकी सुगन्ध से बच नहीं सकता। अत: अपने आत्मारूपी पुष्प को खिलने दो, उसकी सुगन्ध को फैलने दो।

एक ऐसे आत्मतत्त्व को लेकर हम और आप जी रहे हैं, जिसमें निखिल ब्रह्मांड समाहित है, वेदों, पुराणों, उपनिषदों का ज्ञान समाहित है, अनन्त लोकों का ज्ञान समाहित है और उससे परे कुछ भी नहीं है। फिर भी मानव दीन-हीन, असमर्थता का जीवन जीता है, सतत पतन के मार्ग पर जा रहा है! क्यों? इसलिए कि उसने सर्वसमर्थ तीनों सत्ताओं को विस्मृत कर दिया है। परमसत्ता आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा को, गुरुसत्ता को और आत्मसत्ता को भुला दिया है। ये तीन ऐसी सत्ताएं हैं जिन पर आस्था, विश्वास से दृढ़प्रतिज्ञ होकरके जीवन जीने वाला कभी भी असमर्थ नहीं हो सकता। परमसत्ता पर, गुरुसत्ता पर और अपनी आत्मा पर विश्वास करो, इनसे बढ़कर सगा तुम्हारा कोई नहीं। इन सत्ताओं को एकाकार कर देना ही पूर्णमुक्ति है।

परमसत्ता ने तुम्हें क्या-कुछ नहीं दे रखा है, तुम्हारे अन्दर अपार शक्ति समाहित कर रखी है, फिर भी तुम देवी-देवताओं को दोष देते रहते हो। अरे, अपने अन्दर झांककर तो देखो, परमसत्ता ने वे सभी चक्र आपके शरीर में स्थापित कर रखे हैं, उनको जगाकर तो देखो। उनकी ऊर्जा को प्राप्त करके तुम मानव से महामानव बन सकते हो। मानवजीवन पाने लिए देवता भी तरसते हैं और तुम मानवजीवन पाकर भी अपने आपको पहचानना नहीं चाहते! जिस दिन अपने आपको पहचान जाओगे, तुम्हारा जीवन बदलना प्रारम्भ हो जायेगा।

हमारे सनातनधर्म में ऋषियों-मुनियों की शृंखला है, हम उनके संवाहक हैं, उनकी संतानें हैं और हमारे ऋषियों-मुनियों के पास अलौकिक शक्ति-सामर्थ्य थी, जिनके सामने देवता भी नतमस्तक होते थे। आज वही मानवजीवन पाकर तुम भटक रहे हो। जब हमारे मार्गदर्शक स्वयं तपस्वियों का जीवन नहीं जियेंगे, स्वयं पुरुषार्थियों का जीवन नहीं जियेंगे, परोपकारमय जीवन नहीं जियेंगे, तो समाज को कभी ज्ञान नहीं दे सकते और अगर देंगे भी, तो समाज को मूल की ओर, सत्य की ओर नहीं बढ़ा सकते।

जीवन जियो, तो मृत्यु का भय त्याग करके जीवन जियो! जीवन का असली आनन्द वही उठा सकता है, जो मृत्यु के भय को त्याग दे। जीवन हो, तो सत्य का जीवन हो। आज से और अभी से संकल्प ले लो कि जो समय बीत गया, बीत गया और अब मैं नशे-मांसाहार से मुक्त, चरित्रवान्, चेतनावान्, पुरुषार्थी और परोपकारमय जीवन जिऊंगा। यदि इस संकल्प पर दृढ़ रहे, तो तुम्हारा गुरु तुम्हें विश्वास दिलाता है कि आज तक तुमने जो अपराध किया है, उससे मिलने वाले दण्ड से मैं तुम्हें मुक्त कर दूँगा। जीवन ऐसा जियो, जो दूसरों के लिए उदाहरण बने, दूसरों को प्रेरणा प्रदान करने वाला हो। सत्य का जीवन धारण करो, क्योंकि सत्य से बढ़कर और कोई ताकत नहीं होती। सत्य के पलड़े पर आ करके खड़े तो हो, तभी तुम निर्भीकता का जीवन जी सकोगे। आओ, अब मेरे द्वारा कराए जा रहे 11 संकल्पों को धारण करो–

‘ मैं नशे-मांसाहार से मुक्त चरित्रवान्, चेतनावान्, पुरुषार्थी एवं परोपकारी जीवन जियूंगा।‘

‘मैं मानवता की सेवा, धर्मरक्षा एवं राष्ट्ररक्षा के लिए अपना जीवन समर्पित करूंगा।‘

‘ मैं गौ-सेवा, गौ-संरक्षण के लिए अपना जीवन समर्पित करूंगा।‘

‘ मैं पर्यावरण की रक्षा के लिए वृक्षारोपण को बढ़ावा देते हुए स्वयं वृक्षारोपण करूंगा और उनका संरक्षण करूंगा।‘

‘ मैं जातिभेद, छूआछूत को समाज से दूर करके समाज में सद्भावनापूर्ण वातावरण बनाऊंगा।‘

‘ मैं धर्मद्रोहियों, राष्ट्रद्रोहियों और राष्ट्र की सम्पत्ति को किसी भी प्रकार से क्षति पहुंचाने वालों का कभी सम्मान नहीं करूंगा और उनके विरुद्ध खुलकर आवाज उठाऊंगा।‘

‘ मैं भगवती मानव कल्याण संगठन के सभी जनजागरण कार्यक्रमों में अनुशासन व मर्यादाओं का पूर्णतया पालन करूंगा।‘

‘ मैं किसी भी खाद्य पदार्थ में कभी मिलावट नहीं करूंगा और मिलावट करने वाले लोगों को कानून के दायरे में लाकर सजा दिलाने का कार्य करूंगा।‘

‘ मैं नारी की रक्षा के लिए, नारी के सम्मान के लिए जीवन को समर्पित करूंगा।‘

‘ मैं माता-पिता एवं वृद्धजनों का सदा सम्मान करूंगा और अपने माता-पिता को कभी भी अनाथालय में नहीं भेजूंगा।‘

‘ मैं कभी भी किसी भी परिस्थिति में आत्महत्या नहीं करूंगा और न ही किसी की हत्या करूंगा।

 हत्या करने की छूट केवल देश के सैनिकों को है, आक्रमणकारियों को मारने की उन्हें छूट है। इन संकल्पों का दृढ़ता से पालने करो और यही संकल्प आप सभी को अध्यात्म व भौतिक सामर्थ्य की ऊँचाइयों पर ले जायेंगे।

‘माँ’ के हृदय में आपका गुरु वास करता है और मेरे हृदय में ‘माँ’ वास करती हैं। अपने इष्ट के सम्मान के लिए मैं कठोर था, कठोर हूँ और कठोर रहूँगा । मैं अपने इष्ट की सत्यता को कठोरता के साथ व्यक्त करता हूँ। इष्ट की ताकत क्या होती है? यदि इसे यह ऋषि नहीं व्यक्त कर पायेगा, तो कोई व्यक्त नहीं कर सकता। मैंने अपने जीवन को स्वयं प्रमाण के रूप में रखा है। किसी गर्व या घमण्ड से मैंने विश्वअध्यात्मजगत् को चुनौती नहीं दी है।

प्रयागराज में महाकुंभ हो रहा है और मैं वहाँ तक इस मंच से अपनी आवाज पहुंचाना चाहता हूँ कि यदि कोई भी तपस्वी, कोई भी साधक, मठाधीश अथवा शंकराचार्य ने ध्यान की पराकाष्ठा को पार किया हो, किसी का सूक्ष्मशरीर जाग्रत् हो, तो मेरी साधनाओं का सामना करे। अगर वह मुझे झुका देगा, तो अपना सिर काटकर उसके चरणों पर चढ़ा दूंगा और यदि वह कहेगा, तो आजीवन उसका सेवक बनकर रहूँगा। साधना के क्षेत्र में वह जितनी दूर खड़ा होगा, मैं उससे दस कदमआगे खड़ा नजर आऊंगा। चाहे वाक्शक्ति की बात हो, चाहे एक स्थान से दूसरे स्थान की जानकारी देने की बात हो या असाध्य से असाध्य रोगों से बीमार व्यक्ति को ठीक करने की बात हो या जिस तरह के परीक्षण की बात विज्ञान समझे, प्रमाण के लिए आपका गुरु स्वयं तैयार है।

जिस दिन तपस्वी बन जाओगे, तुम्हें वेदों को रटने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी और वेद तुम्हारे मुख पर वास करेंगे, तभी समाज में परिवर्तन आयेगा और तभी हो सकेगी सनातन की रक्षा। मैं सभी का आवाहन करता हूँ कि आओ मिल करके सनातन की रक्षा करें, हिन्दूधर्म की रक्षा करें, हिन्दूधर्म को गौरवान्वित करें और यदि कोई आगे नहीं आता, तो भगवती मानव कल्याण संगठन इस दिशा में आगे बढ़ रहा है तथा लक्ष्य को प्राप्त करके रहेगा। मैं इन क्षणों पर पुन: आप लोगों को अपना आशीर्वाद प्रदान करता हूँ।“

चिन्तन के उपरान्त तथा आरतीक्रम के पश्चात् शिविरस्थल पर उपस्थित अपार जनसमुदाय ने क्रमबद्ध रूप से गुरुचरणकमलों को स्पर्श करके प्रसाद प्राप्त किया।

10 फ़रवरी को मुलाकात का क्रम

द्विदिवसीय शक्ति चेतना जनजागरण शिविर के समापन उपरान्त, सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज ने दिनांक 10 फ़रवरी को प्रात: 10 बजे से डिण्डौरी जि़ले के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों, सिविल जज व स्वयंसेवी संगठनों के सदस्यों, प्रबुद्धवर्ग के लोगों और पत्रकारों से मुलाकात की।

मिलने वालों के क्रम में प्रमुख रूप से पुलिस अधीक्षक वाहिनी सिंह जी, अपर कलेक्टर अनिल कुमार राठौर जी, डिण्डौरी नगरपरिषद के सीएमओ अमित तिवारी जी, क्षेत्रीय विधायक ओमकार मरकाम जी, नगर परिषद अध्यक्ष सुनीता सारस जी, डीएसपी मेहंती मरावी जी, टीआई केवल सिंह जी, बीजेपी के मीडिया प्रभारी सुधीर तिवारी जी, सिविल जज (सीनियर डिवीजन) सचिन रघुवंशी जी और नर्मदा सेवा समिति के सदस्यगण आदि शामिल रहे।

पत्रकारों की जिज्ञासाओं का समाधान

उक्त गणमान्यजनों से मुलाकात के पश्चात् परम पूज्य गुरुवरश्री ने पत्रकारों के द्वारा विभिन्न विषयों पर पूछे गए प्रश्नों व उनकी जिज्ञासाओं का संतुष्टिपूर्ण समाधान किया।

शक्तिस्वरूपा बहनों ने सम्पन्न की दिव्यआरती

शिविर के दोनों दिवसों में सद्गुरुदेव जी महाराज के चिन्तन के पश्चात् सायंकालीन बेला में शक्तिस्वरूपा बहन पूजा जी, संध्या जी, ज्योति जी एवं सिद्धाश्रम चेतनाओं ने समस्त भक्तों की ओर से ‘माँ’-गुरुवर की दिव्यआरती सम्पन्न की। 

माँ नर्मदा के पावन जल में स्नान

दिनांक 10 फ़रवरी को सद्गुरुदेव जी महाराज अपने परिजनों व कुछ शिष्यों के साथ माँ नर्मदा नदी के तट पर पहुँचे और रामघाट पर पवित्र स्नान के साथ ही गुरुवरश्री ने माँ नर्मदा की आरती की। उस समय का वातावरण अत्यन्त ही भक्तिमय हो उठा था।

शिविर की व्यवस्था में भगवती मानव कल्याण संगठन के पाँच हजार से अधिक कार्यकर्ताओं ने अथक परिश्रम किया। शिविर में एक लाख से अधिक संख्या में पहुंचे शिष्यों-भक्तों व आमजनसमुदाय की सुविधा के लिए जनसम्पर्क कार्यालय, खोया-पाया विभाग, नि:शुल्क प्राथमिक उपचार केन्द्र, विघ्नविनाशक नि:शुल्क शक्तिजल वितरण केन्द्र बनाए गए थे। इतना ही नहीं, अन्नपूर्णा भोजन भंडारे में लाखों भक्तों ने शिविर के दोनों दिवस सुबह-शाम तृप्तिपूर्ण खिचड़ी प्रसाद ग्रहण किया। इससे पूर्व सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज के सान्निध्य में दिनांक 07 फ़रवरी को पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम से जनजागरण सद्भावना यात्रा शहडोल मार्ग से होते हुए डिण्डौरी पहुँची। भक्तों और क्षेत्रीयजनों ने यात्रा का जगह-जगह पुष्पवर्षा करके स्वागत किया।  

जनजागरण सद्भावना यात्रा,  सिद्धाश्रम से डिण्डौरी तक

दिनांक 07 फ़रवरी को प्रात:काल पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम में आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा की आरती व ध्यान-साधना के उपरान्त, सच्चिदानंदस्वरूप ऋषिवर सद्गुरुदेव परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज प्रात: 08:00 बजे मध्यप्रदेश के जि़ला-डिण्डौरी हेतु प्रस्थित हुए। आश्रमवासियों व भक्तों के जयकारों तथा किए गए शंखनाद से वायुमंडल का वातावरण सुवासित हो उठा था। गुरुवरश्री के वाहन के पीछे पूजनीया शक्तिमयी माता जी और शक्तिस्वरूपा बहनों के वाहन चल रहे थे तथा उनके पीछे सैकड़ों वाहनों में शिष्यगण चल रहे थे।

वाहन से ही आश्रमवासियों को आशीर्वाद प्रदान करते हुये सद्गुरुदेव जी महाराज सर्वप्रथम स्वामी श्री रामप्रसाद आश्रम जी महाराज की समाधिस्थल पर गये, पश्चात् त्रिशक्ति गौशाला पहुंचे, जहाँ उन्हें नमन् करने के लिये दोनों ओर के द्वार पर तोरणद्वार सजाए गोसेवक कतारबद्ध जयकारे लगाते व शंखध्वनि करते हुये खड़े थे, इन्हें भी आपश्री ने आशीर्वाद प्रदान किया।

 जनजागरण सद्भावना यात्रा धीरे-धीरे शहडोल मार्ग पर आगे बढ़ी। चाहे ग्रामीण क्षेत्र हों या नगरीय क्षेत्र, स्थान-स्थान पर दर्शनाभिलाषी जयकारे लगाते हुए पंक्तिबद्ध खड़े थे। शिष्यों-भक्तों के द्वारा स्वागतद्वार सजाये गये थे, गुरुदेव भगवान् की अगवानी में राह पर फूलों की पंखुड़ियां विखेरी गई थीं और परम पूज्य गुरुवरश्री के पहुंचते ही भक्तगण अपनी अंजुलि में पुष्प भरकर वर्षा करने लगते थे।

  खामडाड़ पंचायत, ब्यौहारी, जयसिंहनगर, खन्नौधी व गोहपारू में खड़े गुरुभाई-बहनों व ग्रामवासियों ने यात्रा का स्वागत जयकारों व शंखनाद करके किया। ब्यौहारी के श्रद्धालुओं ने सभी यात्रियों को बिस्किट के पैकेट प्रदान किए। सद्भावना यात्रा दियापीपर पहुंची। यहाँ पर शहडोल, सोहागपुर के गुरुभाई अनेक दोपहिया वाहनों से यात्रा की अगवानी के लिए पहुँचे हुए थे। शनै:-शनै: यात्रा आगे बढ़ी। सद्भावना यात्रा ग्राम-छतवई और पिपरिया होते हुए जैसे ही शहडोल संभाग मुख्यालय स्थित जयस्तंभ चौक पर पहुँचती है, ‘माँ’-गुरुवर के जयकारों व शंखध्वनि से समूचा क्षेत्र गूंज उठा। मार्ग के दोनों ओर गुरुभाई-बहनों, ‘माँ’ के भक्तों व अनुशासनपूर्वक करबद्ध खड़े बच्चे गुरुदर्शन पाकर कृतकृत्य हुए। गुरुवरश्री ने सभी को आशीर्वाद प्रदान किया। शहडोल में मगज के लड्डू व समोसे प्रदान किए गए। बुढ़ार, अमलाई और चचाई में भक्तगणों ने यात्रा का स्वागत फूलों की पंखुड़ियाँ विखेरकर व पटाखे फोड़कर किया। शनै:-शनै: सद्भावना यात्रा अनूपपुर पहुँची। यहाँ भी क्षेत्रीय भक्तगण गुरुदर्शन पाने हेतु जयकारे लगाते हुए खड़े थे, महिलाओं के सिर पर कलश, सड़क मार्ग के किनारे बनाई गई रंगोली और स्वागतद्वार की मनमोहक छटा देखते ही बनती थी। विशेल मिशन हाईस्कूल के छात्र-छात्राओं ने भी परम पूज्य गुरुवरश्री को नमन करके आशीर्वाद प्राप्त किया। अनूपपुर में सभी सद्भावना यात्रियों को लंच पैकेट्स पूड़ी-सब्जी प्रदान किए गए।

अनूपपुर से पुष्पराजगढ़ जाते समय किरर घाटी के घुमावदार मोड़ पर निर्मित लम्बी सुरक्षा दीवाल पर क्रमबद्ध रूप से सैकड़ों बन्दर बैठे हुए थे। ऐसा प्रतीत हो रहा था, जैसे कि वे भी अपने आराध्य के दर्शनों हेतु प्रतीक्षारत हों। यह दृश्य तुलसीकृत रामायण में वर्णित त्रेतायुग की याद दिला रहा था।

किररघाटी के आगे कान्हा टोला पटना में महिलाएं, पुरुष व बच्चे यात्रा के स्वागत हेतु जयकारे लगाते हुए खड़े थे और गुरुदर्शन पाकर सभी धन्य हुए। राघवटोला पटना और सुरिचन्दास में भी यात्रा का भव्य स्वागत किया गया। पुष्पराजगढ़ (राजेन्द्रग्राम) में भक्तों और शासकीय माध्यमिक स्कूल की छात्राओं ने जयकारों और गुदुम नगाड़े की स्वरलहरियों के साथ सद्गुरुदेव जी महाराज को नमन-वन्दन किया। यहाँ पर सभी को अंकुरित चने व लईया, बूंदी प्रदान की गई।

 यात्रा ग्राम लखौरा, गोगा, गिरारी होते हुए तिवारी टोला पहुंची। सभी ग्रामों में मार्ग के किनारे कतारबद्ध खड़े भक्त ‘माँ’-गुरुवर के जयकारे लगाने के साथ ही अंजुलि में भरकर पुष्प की वर्षा कर रहे थे। महिला भक्तों एवं बच्चियों के हाथों व सिर में रखे कलश शोभायमान हो रहे थे। सुसज्जित स्वागतद्वारों की अलग ही छटा थी। तिवारी टोला में तो प्राथमिक स्कूल के बच्चे अपने गणवेश में अनुशासनपूर्वक करबद्ध खड़े थे। सद्गुरुदेव परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज ने सभी शिष्यों-भक्तों और बच्चों को आशीर्वाद प्रदान किया।

ग्राम बम्हनी, देवरा, खुरदरा, घोटईकला, कोहका, बेलडोंगरी होते हुए सद्भावना यात्रा लीलाटोला पहुंची। सभी स्थानों पर भक्तों ने रोड के किनारे फूलों की मनभावन रंगोली सजा रखी थी। लीला टोला में तो भक्तों व ग्रामवासियों की भीड़ गुरुदर्शन हेतु उमड़ पड़ी थी। भव्य स्वागतद्वार बना हुआ था और गुरुभाई-बहन सड़क मार्ग के किनारे जयकारे लगाते हुए खड़े थे। महिलाओं के सिर में कलश शोभायमान थे और स्थानीय आदिवासियों के द्वारा पारम्परिक वेशभूषा में प्रस्तुत सैलानृत्य को देखकर यात्रा में चल रहे सद्भावना यात्री मन्त्रगुग्ध हो उठे। सभी ने गुरुवरश्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। लीलाटोला में श्रद्धालुओं ने मिष्टान्न, फल व पेयजल प्रदान किया।

 जनजागरण सद्भावना यात्रा ग्राम बेनीबारी, चंदनघाट, सुकुलपुरा, सागरटोला चौराहा, सुनियामार, बिझौरी, खरगहना, हर्रा, बुधगांव, गीधा, कूंड़ा, महावीर टोला, सेमरिया तिराहा, घानाघाट होते हुए सायंकाल 04 बजे डिण्डौरी पहुंची। सभी स्थानों पर ग्रामवासियों ने हर्षोल्लासपूर्वक यात्रा की अगवानी की। डिण्डौरी में स्वागतार्थी पैदल ही यात्रा के साथ लगभग दो किलोमीटर चलकर गुरुआवास (हॉटल श्री माया) तक पहुंचे। यहाँ हजारों की संख्या में लोग जयकारे लगाते व शंखध्वनि करते हुए खड़े थे और ग्रामवासियों के द्वारा प्रस्तुत पारम्परिक सैला नृत्य ने तो वातावरण को बांध सा दिया था। सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज ने हॉटल श्री माया की छत से सभी शिष्यों-भक्तों और नृत्य के माध्यम से अपनी प्रसन्नता का इजहार कर रहे क्षेत्रीय कलाकारों को अपना आशीर्वाद प्रदान किया।

जनजागरण सद्भावनायात्रा, डिण्डौरी से सिद्धाश्रम तक

 दिनांक 11 फ़रवरी, दिन मंगलवार को प्रात:काल 08:00 बजे ऋषिवर सद्गुरुदेव परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज सिद्धाश्रम वापिसी हेतु जैसे ही मध्यप्रदेश के डिण्डौरी जि़ला मुख्यालय स्थित गुरुआवास श्री माया हॉटल से बाहर निकलते हैं, शिष्यों व ‘माँ’ भक्तों के मुखारविन्दों से उच्चारित जयकारों व शंखनाद की प्रतिध्वनि से समूचा क्षेत्र गूंज उठा। 

 जनजागरण सद्भावना यात्रा डिण्डौरी जि़ला मुख्यालय से ग्राम जोगी टिकरिया, शाहपुर, विक्रमपुर, अमेरा होते हुए शहपुरा पहुँची। सभी स्थानों पर क्षेत्रीय भक्तों के द्वारा सड़क मार्ग पर स्वागतद्वार व फूलों की अत्यन्त ही मनमोहक रंगोली बनाई गई थीं। हजारों ग्रामवासियों ने गुरुदेव जी को नमन करके आशीर्वाद प्राप्त किया। यात्रा शहपुरा से आगे बढ़ी और रैपुरा, निगहरी, उमरिया, मानपुर होते हुए अपराह्न 02:30 बजे पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम पहुंची। उमरिया में हजारों शिष्यों-भक्तों ने गुरुवरश्री को नमन किया और उनके द्वारा सद्भावना यात्रियों को स्वल्पाहार प्रदान किया गया।

 सभी स्थानों पर परम पूज्य गुरुवरश्री का भव्य स्वागत किया गया, ग्रामीणजनों ने वाद्य गुदुम व ढोल की धुन बजाकर गुरुवरश्री के आगमन पर अपनी अपार प्रसन्नता जताई और सिद्धाश्रम में तो अपने आराध्य के वापस लौटने से सिद्धाश्रमवासी हर्ष से अविभूत रहे। सभी ने जयकारे व शंखध्वनि के मध्य आपश्री की अगवानी की।             

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