132वाँ शक्ति चेतना जनजागरण ‘आत्मोत्थान’ शिविर, 30 सितम्बर से 02 अक्टूबर 2025, सिद्धाश्रम

‘हमारे विचार ही हमारे व्यक्तित्त्व को बनाते और बिगाड़ते हैं तथा हमारी मानसिक अवस्था जैसी होगी, वैसे ही हमारे भाग्य व दुर्भाग्य का निर्माण होगा। यदि हम अच्छे व पावन विचार रखते हैं, तो प्रसन्न रहेंगे और यदि बुरे विचारों को प्रश्रय देते हैं, तो दु:ख-मानसिक क्लेश को आमंत्रण दे रहे होते हैं।‘

ऋषिवर सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज की तपस्थली पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम धाम पर शारदीय नवरात्र पर्व में दुर्गाष्टमी, दुर्गानवमी व विजयादशमी, दिनांक 30 सितम्बर से 02 अक्टूबर 2025 तक आयोजित 132वें त्रिदिवसीय शक्ति चेतना जनजागरण ‘आत्मोत्थान’ शिविर में ऋषिवर के शिष्यों-भक्तों व सनातनप्रेमियों का सैलाब उमड़ पड़ा था। क्या महिला, क्या पुरुष, यहाँ तक कि बालसुलभ मुस्कान बिखेरते हुए बच्चों के हाथों में सुशोभित शक्तिदण्डध्वज, अतिमनोरम दृश्य था।

शिविर के तीनों दिवस जहाँ शिविरस्थल पर उपस्थित एक लाख से अधिक भक्त ऋषिवर के अमृतमयी वचनों का रसपान कर आत्मसदृश्य-पवित्रता, सात्विकता व चैतन्यता से परिपूर्ण जीवन जीने हेतु संकल्पित हुए, वहीं प्रथम दो-दिवस के प्रथम सत्र में शक्तिस्वरूपा बहनों पूजा जी, संध्या जी और ज्योति जी के सान्निध्य में योग-ध्यान-साधनाक्रम को पूर्ण किया। इतना ही नहीं, सभी ने तीन दिव्य आरतियों से उत्सर्जित चेतनातरंगों को आत्मसात करके अपने भाग्य को सराहा। शिविर के तृतीय दिवस के प्रथम सत्र में 15 हज़ार से अधिक नए भक्तों ने परम पूज्य सद्गुरुदेव जी महाराज से दीक्षा लेकर नवीन जीवन का सूत्रपात किया।

शिविर की व्यवस्था में भगवती मानव कल्याण संगठन के पाँच हज़ार से अधिक स्वयंसेवी कार्यकर्ताओं ने, जहाँ सुरुचिपूर्ण ढंग से लाखों भक्तों को सुबह-शाम, उनके आगमन से लेकर प्रस्थान तक भोजन कराया, वहीं जनसम्पर्क कार्यालय, नि:शुल्क शक्तिजल वितरण केन्द्र, नि:शुल्क प्राथमिक चिकित्सा केन्द, वस्त्र समर्पण एवं वितरण केन्द्र, मीडिया कार्यालय, खोया-पाया विभाग एवं सभी आगन्तुक भक्तों के ठहरने के लिए रिहायशी पंडाल एवं प्रवचनस्थल व्यवस्था हेतु दिन-रात अथक परिश्रम किया। इतना ही नहीं, कार्यकर्ताओं ने सैनिकों की भांति शान्ति-सुरक्षा व्यवस्था की ज़िम्मेदारी पूर्ण निष्ठा के साथ संभाली। तथापि, संगठन के कार्यकर्ताओं की जितनी प्रशंसा की जाए, कम ही होगी।

शिविर के तीनों दिवसों में नित्यप्रति की तरह सर्वप्रथम ब्रह्ममुहूर्त में भक्तजन मूलध्वज साधना मंदिर पर पूजनीया शक्तिमयी माता जी के करकमलों से सम्पन्न होने वाले आरतीक्रम में शामिल होने के पश्चात् श्री दुगार्चालीसा अखण्ड पाठ मंदिर में पहुंचकर माता जगदम्बे के गुणगान में सम्मिलित हुये, जहाँ परम पूज्य सद्गुरुदेव जी महाराज के द्वारा प्रात: 06 बजे स्वयं उपस्थित होकर आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा व सहायक शक्तियों की पूजा-अर्चना तथा ध्यान-साधना करने के उपरान्त, मूलध्वज साधना मन्दिर पहुंचकर समस्त विश्व की मानवता के कल्याण की कामना माता जगदम्बे से की। उक्त साधनात्मक क्रमों के बाद प्रात: आठ बजे सभी भक्तों ने  शिविर पण्डाल पहुंचकर सम्पूर्ण मनोयोग से शक्तिस्वरूपा बहनों के सान्निध्य में योग-ध्यान-साधना के क्रम को पूर्ण किया।

ज्ञातव्य है कि भगवती मानव कल्याण संगठन व पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम ट्रस्ट के सदस्यों व कार्यकर्ताओं के द्वारा संयुक्त रूप से सिद्धाश्रम धाम के विशाल परिसर में दक्षिण दिशा की ओर दिन-रात अथक परिश्रम करके अत्यन्त ही आकर्षक व भव्य मंच तथा वृहदाकार प्रवचन पंडाल का निर्माण किया गया था, जहाँ तीन दिवस तक प्रतिदिन निर्धारित समय पर अपराह्न 02:00 बजे से ऋषिवर के श्रीमुख से चिन्तनामृत की वर्षा होती रही। तत्पश्चात् भक्तों ने दिव्य आरती से उत्सर्जित अलौकिक ऊर्जा का लाभ प्राप्त किया। ।

प्रथम दिवस, 30 सितम्बर

शक्ति चेतना जनजागरण ‘आत्मोत्थान’ शिविर का प्रथम दिवस, वृहदाकार पंडाल अपार जनसमुदाय से खचाखच भरा हुआ तथा सभी अनुशासित रूप से पंक्तिबद्ध बैठे हुये थे। सभी की आँखें सद्गुरुदेव जी महाराज के आगमन की प्रतीक्षा में बिछी हुई थीं, तभी निर्धारित समय में अपराह्र 02:00 बजे आपश्री के पदार्पण के साथ ही सम्पूर्ण वातावरण जयकारो, शंखध्वनि व तालियों की गड़गड़ाहट से गुंजायमान हो उठा।  गुरुवरश्री के मंचासीन होते ही सर्वप्रथम बहन पूजा, संध्या व ज्योति दीदी जी एवं सिद्धाश्रम चेतनाओं के द्वारा समस्त भक्तों की ओर से गुरुवरश्री का पद-प्रक्षालन करके पुष्प समर्पित किए गए। तत्पश्चात् कुछ शिष्यों ने भक्तिरस से परिपूर्ण भावगीत प्रस्तुत किये, जिसके मुख्य अंश इस प्रकार हैं:— माँ के चरणों में सारे देवों का सिर झुक जाता है,…। -बहन जान्हवी जी व भाग्या पाण्डेय जी, उत्तरप्रदेश।। छाया जब कलियुग में चहुंओर अंधेरा,…..।-बाबूलाल विश्वकर्मा जी, मध्यप्रदेश।।

ऋषिवर के दिव्य चिन्तन

 भावगीतों के क्रम के पश्चात् ऋषिवर सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज ने उपस्थित शिष्यों-भक्तों, श्रद्धालुओं, कार्यकर्ताओं, देशवासियों और विश्व के धर्मप्रेमी जनमानस को आशीर्वाद प्रदान करते हुए धीर-गम्भीर वाणी में कहा कि-

“नवरात्र के अतिमहत्त्वपूर्ण पावन पवित्र दिन, माता भगवती आदिशक्ति की आराधना के इस पर्व को सम्पूर्ण विश्व में रह रहे सनातनधर्मावलम्बियों के साथ ही अन्य धर्मों को मानने वाले लोग भी पूर्ण श्रद्धाभाव से मनाते हैं। इस पर्व पर ‘माँ’मय वातावरण रहता है, काश ऐसा ही वातावरण नित्यप्रति बन जाए। जनमानस जिस तरह नवरात्र पर्व पर अपने अवगुण त्याग करके व्रत-उपवास रह करके ‘माँ’ की भक्ति में रत रहता है, तो क्या हमेशा के लिए अपने अवगुणों को नहीं त्याग सकते? यदि ऐसा होजाए,तो पूरे विश्व में शांति व संतोष का वातावरण बन जाए।  हमारे लिए तो हर दिन, हर पल नवरात्र की तरह पावन पवित्र है। 

हमारे अन्दर आत्मकल्याण की, आत्मोत्थान की दृढ़ इच्छाशक्ति होनी चाहिए,  जिससे हम समझ सकें कि हमारे ऋषियों-मुनियों के पास कितनी अपार शक्ति थी? वे यह जान गए थे कि आत्मा अजर-अमर-अविनाशी है। जो आत्मारूपी तत्त्व परमसत्ता ने हमें दे रखा है, वह पावन पवित्र ही नहीं, वरन अनन्त शक्तियों से भरपूर है। हमारी यह आत्मा उस परमसत्ता का अंश है। परमसत्ता की आराधना सभी को सदैव करनी चाहिए, एक पल के लिए भी ठहराव नहीं लेना चाहिए। कर्म करते हुए भी हम उनकी स्मृति मन में हर समय बनाए रख सकते हैं। यह नहीं कि केवल एक दिन, केवल नवरात्र पर उन्हें याद कर लिया और शेष दिन अपनी इच्छा के अनुरूप कार्य करते रहें

हमारी स्वयं की आत्मा पूर्ण है, परिपूर्ण है, उसमें अनन्त शक्तियाँ निहित हैं और उसे ही अपने स्वभाव से दूर रखते हो! यदि चाहो तो अपनी आत्मा के पावन पवित्र स्वभाव को धारण करके त्याग, परोपकार के पथ पर आगे बढ़ सकते हो, आत्मोन्नति के पथ पर बढ़ सकते हो। इसी पथ का चयन तो हमारे ऋषियो-मुनियों ने किया। आत्मज्ञान को प्राप्त करके ऐसे-ऐसे असम्भव कार्यों को किया, जिनके सामने दुनिया नतमस्तक होती थी।

कुछ पल स्वयं विचार करें कि ह्यहम क्या कर रहे हैं और हमें क्या करना चाहिए? केवल कामनाओं की पूर्ति के लिए गुरु के चरणों में जाना, परमसत्ता के चरणों को नमन करना! हाँ, यदि कुछ समस्या है, तो उसके लिए ‘माँ’ के चरणों में निवेदन कर दो और अपने कर्त्तव्यकर्म में जुट जाओ।

अपने कर्मों से इतना ऊंचा उठो कि कामनाएं समाप्त होजाएं। यदि कामनाओं की ही पूर्ति में लगे रहे, तो जन्म-दर-जन्म पतन सुनिश्चित है। अरे, परमसत्ता हमारी आत्मा की जननी हैं और उनसे केवल हमें अपना रिश्ता बनाए रखना है। समस्याएं आएंगी और उन समस्याओं का समाधान होता चला जाएगा। तुम्हारा मुख्य लक्ष्य है आत्मकल्याण और उसके बाद जनकल्याण। हमें अपने कर्त्तव्य का बोध होना चाहिए। हमारे अन्दर जो आत्मा बैठी हुई है, वह सातों चक्रों के माध्यम से, इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना नाड़ी के माध्यम से, प्राणों के माध्यम से ऊर्जा देती रहती है। जिस दिन प्राण अपना सहयोग देना बन्द कर देते हैं, उस दिन मृत्यु होजाती है। प्राणसाधना वह माध्यम है, जिसके सहारे हम अपनी आत्मा के नज़दीक पहुंच सकते हैं। ध्यान रखें कि इस भौतिक शरीर में जितने भी प्रकार के कार्य होते हैं, सभी प्राणों के सहारे होते हैं। शरीर तो केवल यन्त्रमात्र है, जबकि प्राण उसको चलाने का उपकरण है।

प्राण पाँच प्रकार के होते हैं- प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, और पाँच ही उपप्राण होते हैं- देवदत्त, धनंजय, नाग, कूर्म्म, कृकर। इन दसों  प्राणों में प्राण, अपान, समान, व्यान, और उदान अन्तस्थ एवं उपप्राण-देवदत्त, धनंजय, नाग, कूर्म्म और कृकर, बहिस्थ हैं। अन्तस्थ पंचप्राण, इनका शरीर में अलग-अलग स्थान निर्दिष्ट है। हृदेश में प्राणवायु, गुह्य देश में अपान वायु, नाभिमण्डल में समान वायु, कण्ठदेश में उदान वायु और पूरे शरीर में व्यान वायु व्याप्त होकर अवस्थान कर रहा है। इसी प्रकार उपप्राण अलग-अलग स्थानों पर अपना कार्य करते हैं। इन प्राणों की निष्क्रियता ही आपकी बीमारियों का प्रमुख कारण है। यदि प्राणों को सक्रिय बनाए रखा जाए, तो निन्यानवे प्रतिशत बीमारियाँ ठीक हो सकती हैं। अधिक नहीं, तो कुछ समय प्राणायाम के लिए अवश्य दो, आप चलते-फिरते भी सहज प्राणायाम की क्रिया को कर सकते हो। सहज प्राणायाम है श्वास  को तेजी के साथ खींचना और धीरे-धीरे निकाल देना, फिर खींचना और निकाल देना। जब हम प्राणमय कोष की ओर बढ़ते हैं, तो मनोमय कोष जाग्रत् होता है, फिर विज्ञानमय कोष, इसके बाद सूक्ष्मजगत् से सम्पर्क, फिर हम आनन्दमय कोष की ओर बढ़ते हैं और इस आनन्द के सामने सभी बाह्य सुख की इच्छाएं समाप्त होती चली जाती हैं।

      सबसे बड़ा दुर्लभ कार्य आत्मज्ञान प्राप्त करना है। इस भौतिक जगत् में, समाज में रह करके, कठोर साधनाएं व तप के मार्ग पर चलकर मैंने आत्मज्ञान प्राप्त किया है। अपने चेतनावान् गुरु के प्रति, परमसत्ता के प्रति निष्ठा, विश्वास, समर्पण की पराकाष्ठा होनी चाहिए। ग्रन्थों में कुछ त्रुटियाँ हो सकती हैं, मगर चेतनावान् गुरु का निर्देशन सत्य से जुड़ा होता है। गुरुजन, धर्मनिष्ठ माता-पिता के निर्देशनों का पालन भी निष्ठापूर्वक करना चाहिए और इन पर कभी भी संदेह नहीं करना चाहिए। हमें उनके निर्देशनों पर चलकर देखना चाहिए और जब हम उस पर चलेंगे, बढ़ेंगे, तभी तो सत्य का ज्ञान हो सकेगा। ध्रुव, प्रह्लाद जैसे छोटे-छोटे बच्चों ने भी तप-साधना के माध्यम से अपनी कीर्ति चहुंओर फैलाई और उनकी त्याग-तपस्या के फलस्वरूप देवताओं को भी इस धरती पर आने के लिए विवश होना पड़ा। यदि माता-पिता अपने बच्चों से प्रेम करते हैं, तो उन्हें योग-ध्यान-साधना के पथ पर बढ़ाएं।

   यह कर्मप्रधान सृष्टि है और हर मनुष्य को उसके कर्मों के अनुरूप ही फल की प्राप्ति होती है, तो क्यों न हम सभी कर्त्तव्यपथ पर चलें। साधनापथ पर चलकर क्यों न आत्मज्ञान प्राप्त करें। ध्यान रखें, आत्मज्ञान से बड़ा और कोई ज्ञान नहीं है। ग्रंथज्ञानी एक बार भटक सकता है, लेकिन आत्मज्ञानी सदा सत्यपथ पर ही चलेगा। अपने अन्दर दृढ़ इच्छाशक्ति पैदा करो कि मुझे आत्मज्ञान प्राप्त करना है, दिव्यता को प्राप्त करना है। यदि आप इस ओर बढ़ना प्रारम्भ कर दोगे, तो दिव्यचेतना की प्राप्ति होने लगेगी, फिर तुम्हें हाथ फैलाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। अपने साथ ही अपने बच्चों को भी इस दिशा में आगे बढ़ाओ, तुम चेतनावान् बनोगे, तभी तुम्हारे बच्चे चेतनावान् बनेंगे और उनका जीवन स्वस्थ रहेगा, उनकी कार्यक्षमता बढ़ेगी।

इस भूतल पर यह एकमात्र धरती है, जहाँ 28 वर्षों से ‘माँ’ का गुणगान चल रहा है। ऐसी पवित्र धरती पर बैठने का सौभाग्य आपको प्राप्त हुआ है। यहाँ की ऊर्जा व्यापक है। यहाँ शक्तिपीठ की स्थापना हो रही है और किसी शक्तिपीठ की स्थापना युगों-युगों के बाद होती है तथा युगों-युगों तक यहाँ से जनमानस को लाभ प्राप्त होता रहेगा। समाज में फैली बुराइयों को एक दिन में दूर नहीं किया जा सकता। अनीति-अन्याय-अधर्म-भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी हैं, जिन्हें समाप्त करने के लिए त्याग-तपस्या की ज़रूरत है, एक ऐसे केन्द्र की ज़रूरत है, जहाँ से दिशा दी जा सके और यहाँ से यही कार्य किया जा रहा है।

अभी तो मुझे अपने संकल्पित 108 महाशक्तियज्ञों में से 100 यज्ञ पूर्ण करने है और ये यज्ञ यहीं, इसी सिद्धाश्रम की धरती पर पूर्ण होंगे। इन यज्ञों की ऊर्जा इतनी प्रचंड होगी कि समाज में चेतना का संचार होता चला जायेगा।

अरे, सनातनधर्म को न तो आज तक कोई नष्ट कर सका है और न कभी कोई नष्ट कर सकेगा। हमें मुखर होकर ग़लत के विरुद्ध आवाज़ उठाना है, लेकिन हिंसक नहीं बनना है। हमारा कर्त्तव्य ही हमारी साधना है। आलस्य हमारा सबसे बड़ा दुश्मन है, अत: हर पल सजग रहें।‘’

   ऋषिवर के चिन्तन उपरान्त, शक्तिस्वरूपा बहनों व सिद्धाश्रम चेतनाओं ने दिव्य आरती का क्रम पूर्ण किया। तत्पश्चात् शिविरस्थल पर अनुशासनपूर्वक बैठे हुए भक्तों ने क्रमबद्ध होकर गुरुचरणपादुकाओं को नमन करते हुए प्रसाद प्राप्त किया और अन्नपूर्णा भंडारा परिसर की और प्रस्थित हुए।

द्वितीय दिवस, 01 अक्टूबर

पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम धाम की अलौकिक छटा से अविभूत होकर सद्गुरुदेव भगवान् के शिष्य, धर्मप्रेमी आगन्तुकजन मोहित से हो उठे थे तथा रह-रहकर प्रवाहितऊर्जात्मक चेतनातरंगों से सभी का पूरा शरीर रोमांचित हो उठता था। शक्ति चेतना जनजागरण ‘आत्मोत्थान’ शिविर में आयोजन स्थल की और मंच की छटा देखकर ऐसाप्रतीत हो रहा था, मानो आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बे ने सिद्धाश्रम धाम में अपनी समस्त ममता उड़ेल दी हो। 

द्वितीय दिवस की अपराह्न बेला,  सुसज्जित मंच में विराजमान ऋषिवर की मोहक गम्भीरता, त्याग-तपस्या और भक्ति के आलोक से आलोकित उनके आभामंडल कोअपलक देखते हुये भक्तगण मुग्ध हो रहे थे कि तभी भावगीतों का क्रम प्रारम्भ हुआ, जिनके भावगीतों के प्रारम्भिक अंश इस प्रकार हैं—

मिला था जो न कभी यहाँ आकर पाया है, उन्होंने चेतना से जन-जन को जगाया है। हो न कितना ही सुषुप्त यहाँ आकर चैतन्य होजाता है, महायोगी ने यहाँ आकर ख़ुद कोतपाया है- सौरभ द्विवेदी (अनूप  भइया) जी, पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम (मध्यप्रदेश)। इससे पहले बाबूलाल विश्वकर्मा जी, दमोह (मध्यप्रदेश) के द्वारा प्रस्तुतभावसुमन- हो रहा है शिविर आत्मोत्थान सिद्धाश्रम के आंगन में, गुरुकृपा सुधा का कर लो पान सिद्धाश्रम के आंगन में। शिविर का संचालन करते हुए वीरेन्द्र दीक्षित जी, दतिया (मध्यप्रदेश) ने अपने भावसुमन अर्पित करते हुए कहा- माँ तेरी बस्ती भी अजीब बसती है, कल कहीं उजड़ी और आज कहीं बसती है। सिद्धाश्रम चेतना आरूणी जी नेअपने अपने भावों को प्रक़ट करते हुए कहा कि ह्यहम सभी परम सौभाग्यशाली हैं कि परम पूज्य सद्गुरुदेव जी का हमें सान्निध्य मिला है। गुरुआज्ञा का पालन करने से हीहमारा कल्याण होगा। 

ऋषिवर के दिव्य चिन्तन

आशीर्वाद प्रदान करने के बाद ऋषिवर की अमृतमयी वाणी मुखर हो उठी—

“जीवन का हर पल महत्त्वपूर्ण होता है,अगर इसे सभी समझने लग जाएं।  हम उस जगत् जननी के आराधक हैं, जिन्हें देवाधिदेव भी माँ कहकर पुकारते हैं। माता आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा ही हमारी आत्मा की मूल जननी हैं और वही हमारी इष्ट हैं। आप मूल से कहीं-न-कहीं धीरे-धीरे भटकते जा रहे हैं और वही भटकाव आपके जीवन में अशान्ति व असन्तुलन पैदा करता चला गया। 

    हमारा सनातन आदिकाल से शक्तियों से परिपूर्ण रहा है और हर काल-परिस्थितियों में देवपुरुषों ने अवतार ले-ले करके समाज को दिशा दी है, लेकिन समाज की अज्ञानता रही कि वे देवपुरुष जो अवतरित हुए, उन्हें ही मूल मानकर उनकी आराधना करने लगे। आराधना करनी भी चाहिए, क्योंकि वे हर काल-परिस्थिति में समाज का कल्याण करने के लिए, कर्म का मार्ग प्रशस्त करने के लिए अवतरित होते हैं। मगर क्या आज यदि कोई हमें सहारा देना प्रारम्भ कर दे; हमारा पड़ोसी, हमारे रिश्तेदार सहारा देना प्रारम्भ कर दें, तो क्या हम अपने माता-पिता को भूल जाएंगे? त्रेतायुग में श्रीराम का जन्म हुआ, द्वापर में श्रीकृष्ण का जन्म हुआ और उन्होंने समाजकल्याण के लिए कार्य किया, जीवनआदर्श प्रस्तुत किया, कर्म का पाठ पढ़ाया। ठीक है कि समाज उनकी आराधना करने लगा, करनी भी चाहिए, लेकिन क्या हम अपने मूल को, अपनी आत्मा की जननी, अपनी मूल इष्ट को भूल जाएं?

शक्तिस्वरूपा बहन ज्योति शुक्ला जी, बहन संध्या शुक्ला जी, बहन पूजा शुक्ला जी

इस बिन्दु पर विचार कीजिए कि जब भगवान् राम का जन्म नहीं हुआ था, भगवान् कृष्ण का जन्म नहीं हुआ था, तब हमारे ऋषि-मुनि किसकी आराधना करते थे? आत्मा की जननी आदिशक्ति जगदम्बे की और हम उन्हें ही भूल बैठे!  मैं उस मूल की ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ कि हमारे लिए राम, सीता, कृष्ण, राधा सभी पूज्य हैं, सभी आराध्य हैं और इन सभी का ध्यान-चिंतन करना चाहिए, लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारी आत्मा की मूल जननी आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा हैं। राम को भी अपने शरीर का त्याग करना पड़ा और कृष्ण को भी अपने शरीर का त्याग करना पड़ा। सिर्फ़ और सिर्फ़ माता जगदम्बा ही अजन्मा है , अविनाशी सत्ता हैं और उन्होंने देवाधिदेवों की भी जन्म दिया है।

  आप लोग यदि प्रकृति को ही देखना प्रारम्भ कर दो, तो आश्चर्यचकित रह जाओगे। पहाड़ों, नदियों, कन्दराओं, पेड़-पौधों, एक से एक बढ़कर एक अतिसुन्दर विभिन्न रंगों से भरे पुष्प, देखो और सोचो कि इनकी रचना करने वाला कौन है? जब प्रकृति इतनी सुन्दर है, तो इनकी रचना करने वाली ‘माँ’ कितनी सुन्दर और ममतामयी होंगी? कभी पीपल के वृक्ष को आपने देखा है, जिससे दिन-रात ऑक्सीजन का प्रवाह बना रहता है। जब गर्मियों में पत्ते झड़ जाते हैं, इसके तुरन्त बाद पीपल के वृक्ष में अतिकोमल पंखुड़ियां, गुलाब के फूल से भी अधिक कोमल पंखुड़ियां निकल आती हैं और  40-50 डिग्र्री तापमान में भी नहीं झुलसतीं। आख़िर क्यों? इसलिए कि वह अपने मूल से जुड़ा हुआ है, उसका मूल उसे चेतना दे रहा है।

इतनी सुन्दर रचना से अधिक माता जगदम्बे और तुम्हें क्या दे सकती हैं? कि तुम्हारे अन्दर आत्मा के रूप में अपना अंश बिठा दिया, जिससे तुम्हें चेतना प्राप्त होती रहे। हमारी आत्मा की व्यापकता अनन्त लोकों से जुड़ी हुई है, एक नहीं, अनेक सौरमंडलों से जुड़ी हुई है, मगर हम उन मूल स्रोतों से अपने आपको काटते चले गए और उसका परिणाम यह हुआ कि अपनी इतनी शक्तिशाली आत्मा को ही विस्मृत कर दिया, उसके ऊपर आवरण पर आवरण डालते चले गए!

यदि चाहते हो कि तुम्हारे एक नहीं, अनेक जन्म उन्नति के पथ पर, सुख-समृद्धि के पथ पर चलें, तो तुम्हारे पास केवल एक ही रास्ता है कि मूल से जुड़ जाओ, अपने अन्दर की ओर प्रवेश करना प्रारम्भ कर दो। सद्कर्म करो, ध्यान-साधना करो, आपके छोटे-छोटे पावन कार्य, जिससे ऊर्जा मिलने लगेगी। परमसत्ता ने हमें चक्रों के रूप में अलौकिक कुण्डलिनीशक्ति प्रदान की है। धीरे-धीरे उन चक्रों को ही जाग्रत् करने का प्रयास करो। आपकी शक्ति बढ़ेगी, आपकी कार्यक्षमता बढ़ेगी, निर्णय लेने की क्षमता बढ़ेगी। इतना ही नहीं, शान्ति की अनुभूति होने लगती है, प्राणचेतना जाग्रत् होने लगती है और ज्योंही तुम्हारी प्राणचेतना जाग्रत् होगी, आत्मचेतना जाग्रत् होती चली जाएगी।।

हमारे सनातन की जो शक्ति थी, उस शक्ति को हमें पुन: जाग्रत् करना है। हर मनुष्य का स्वयं का अपना लक्ष्य होना चाहिए कि अपनी आत्मा की असीम शक्तियों को हमें जाग्रत् करना है और यह प्रयास करते रहें। इसमें कितना समय लगेगा, कितने दिन लगेंगे, यह सब भुला दो। संकल्प ले लो कि मुझे आत्मा की शक्तियों को जानना है, पहचानना है। यदि इसमें सफल होगए, तो माता जगदम्बे तुमसे दूर नहीं हैं। रास्ता यही है और इसके अलावा यदि कोई दूसरा रास्ता बताता है, तो वह तुम्हें अंधकार की खाई में लेजा रहा है। नित्य योग-ध्यान-साधना करें, विशेषकर प्राणायाम को प्राथमिकता दें। अपनी इष्ट माता जगदम्बे की नित्य आरती-पूजन करें। यही साधना का पथ है, यही आराधना का पथ है। 

यह सिद्धाश्रम धाम कल्पवृक्ष की तरह है, जहाँ सभी भक्तों की कामनाएं पूरी होती हैं।  मेरा पूरा जीवन अग्नि के समक्ष ही गुज़रना है, महाशक्तियज्ञस्थल मंदिर का निर्माण जारी है और जैसे ही बनकर तैयार हो जाएगा, यज्ञ प्रारम्भ कर दिए जाएंगे। इस नवरात्र पर्व पर सभी संकल्प ले लें कि हमें भटकाव से हट करके केवल और केवल साधना के पथ पर चलना है। अपने चेतनावान् गुरु और इष्ट से सच्चा रिश्ता जोड़कर तो देखो, तृप्ति मिलेगी, आनन्द का अनुभव होगा।”

    “आज इस शिविर में मध्यप्रदेश शासन के तीन मंत्री आए हैं, जो सागर संभाग से हैं और मैं चाहता हूँ कि पाँच-पाँच मिनट गौसंवर्धन, गौरक्षा के लिए, प्रदेश के हर ज़िले में गौअभ्यारण्य बनाने तथा प्रदेश को नशामुक्त करने के सम्बन्ध में अपना उद्बोधन दें।”     सर्वप्रथम अपने उद्बोधन मे गोपालन एवं डेयरी विकास राज्यमंत्री, स्वतंत्र प्रभार- लखन पटेल जी ने कहा कि ह्यगुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महराज और उपस्थित माता जी के चरणों में मेरा नमन वन्दन प्रणाम! यहाँ जो शिविर हो रहा है, इसे शिविर नहीं महाकुंभ कहें, तो अतिशयोक्ति न होगी। लाखों की संख्या में यहाँ लोग मौज़ूद हैं।  गुरुदेव जी का आशीर्वाद मेरे ऊपर है और मैं चाहता हूँ कि हमेशा बना रहे।

भगवती मानव कल्याण संगठन के कार्यकर्ता जनजागरण के कार्य में लगे हुए हैं और कार्यकर्ताओं के प्रयास से दमोह ज़िले में ही लगभग 200 गांव नशामुक्त हो चुके हैं, जो अतिसराहनीय कार्य है और इस कार्य में हम बराबर सहयोग देते रहते हैं। प्रदेश को नशामुक्त घोषित करने और हर ज़िले में गौअभ्यारण्य के लिए आपका आदेश मैं ज़रूर मुख्यमंत्री तक पहुँचाऊंगा और मैं आपके निर्देशानुसार गौरक्षा के लिए अपने कर्त्तव्य को अवश्य पूरा करूंगा।  गुरुदेव जी, आपने गौरक्षा के लिए अभ्यारण्य बनाए जाने की बात कही थी, तो 14 जगहों पर अभ्यारण्य बनाए जा रहे हैं, क्योंकि वहाँ के लिए भूमि मिल चुकी है और जैसे-जैसे ज़मीन की उपलब्धता होगी, हर ज़िले में गौअभ्यारण्य बनाए जाने का लक्ष्य है। एक-एक अभ्यारण्य की क्षमता 10 से 15 हज़ार गायों के रहने की होगी।‘

संस्कृति, पर्यटन, धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व विभाग राज्यमंत्री-स्वतंत्र प्रभार धर्मेन्द्र सिंह लोधी जी ने अपने उद्बोधन में कहा कि ‘मैं गुरुदेव जी का दीक्षित शिष्य हूँ और मुझे भी ऐसी चेतना प्रदान करें, जिससे समाज के लिए अच्छा से अच्छा कार्य करने की प्रेरणा मिलती रहे। मैं जबेरा विधानसभा क्षेत्र से हूँ और आपकी चेतनातरंगों के माध्यम से भगवती मानव कल्याण संगठन के लोग वहां गांव-गांव जाकर नशामुक्ति के लिए सराहनीय कार्य कर रहे हैं। मुख्यमंत्री जी के निर्देश पर हमने 19 धार्मिक क्षेत्रों में शराबबन्दी करने का कार्य किया है।

      गुरुदेव जी, आप जैसा चाहते हैं कि पूरा प्रदेश नशामुक्त होना चाहिए, तो हमारे मुख्यमंत्री जी इस ओर क़दम बढ़ा रहे हैं। गुरु देव जी, आपने जो हिन्दू जागरण का कार्य किया है, वह अनुकरणीय है। पहले लोग जो कहते थे कि हिन्दू कभी एक नहीं हो सकते, तो आपके द्वारा किया गया हिन्दू जागरण का यह कार्य ऐसा कहने वालों के मुँह पर तमाचा है। गुरुदेव जी, अपने इस शिष्य पर हमेशा की तरह कृपा बनाए रखिएगा।‘

गोविन्द सिंह राजपूत कैबिनेट मंत्री-खाद्य नागरिक  आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग जी ने अपने सारगर्भित उद्बोधन में कहा कि ह्यगुरुदेव जी तो सबको ज्ञान दे रहे हैं और उनके सामने लम्बी-चौड़ी बातें करना मुझे शोभा नहीं देता। हमारे मुख्यमंत्री जी ने यह निर्णय लिया है कि किसी भी धार्मिक स्थल क्षेत्र में शराब नहीं बिकेगी। निश्चित मानिए कि परम पूज्य गुरुवरश्री की जो इच्छा है, आने वाले समय में वह भी अवश्य पूरी होगी।‘

सद्गुरुदेव जी महाराज ने कहा कि “मेरा मानना है कि हमारा हर घर धार्मिक है, सभी घरों में पूजा-पाठ होता है, तो हमारा हर घर नशामुक्त होना चाहिए। केवल धार्मिकस्थल क्षेत्रों में ही नशामुक्ति की घोषणा कहाँ तक न्यायसंगत है? ‘माँ’ की कृपा से भगवती मानव कल्याण संगठन जो अपना कार्य कर सकता है, कर रहा है। नेपाल के लोग भी यहां उपस्थित हैं, वहाँ भी संगठन के कार्यकर्ता नशामुक्त समाज व चेतनावान् समाज के निर्माण के लिए प्रयासरत हैं।”

परम पूज्य गुरुवरश्री ने जैसे ही अपनी चिन्तन वाणी को विराम् दिया, आरती का क्रम शक्तिस्वरूपा बहनों व सिद्धाश्रम चेतनाओं ने प्रारम्भ किया। आरतीक्रम सम्पन्न होने के पश्चात् शिविरस्थल पर उपस्थित सभी भक्तों ने क्रमबद्ध होकर गुरुचरणपादुकाओं का स्पर्श करते हुए प्रसाद प्राप्त किया।

तृतीय दिवस, 02 अक्टूबर का प्रथम सत्र

गुरुदीक्षा क्रम

शक्ति चेतना जनजागरण शिविर के तृतीय दिवस का प्रथम सत्र, मंचस्थल पर प्रात: 08:00 बजे से गुरुदीक्षा का कार्यक्रम प्रारम्भ हुआ।  इस अवसर पर 15 हज़ार से अधिक नये भक्तों ने गुरुदीक्षा प्राप्त करके नवीन जीवन में पदार्पण किया। दीक्षा प्रदान करने से पूर्व गुरुवरश्री ने कहा कि-

“मानवजीवन में सबसे महत्त्वपूर्ण क्षण वे होते हैं, जब किसी चेतनावान गुरु से दीक्षा प्राप्त करने का समय होता है और वह भी नवरात्र के पावन क्षणों में विजयादशमी के दिन यह अवसर मिल जाए, तो इससे बड़ा सौभाग्य और कुछ नहीं हो सकता।

 गुरु और शिष्य का रिश्ता एक ऐसा अटूट रिश्ता है, जो इस भूतल के समस्त रिश्तों से सर्वोपरि है। यही वो रिश्ता है, जो आत्मिक होता है। जबकि, भौतिक जगत् का ऐसा कोई रिश्ता नहीं, जो कि स्वार्थ से न जुड़ा हो। चाहे माता-पिता का रिश्ता हो, या भाई-बहन का या पति-पत्नी का।  चेतनावान् गुरु केवल शिष्यों का कल्याण चाहता है।”

द्वितीय सत्र

अपराह्न 02:00 बजे ऋषिवर सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज के आगमन और मंचासीन होने के बाद शक्तिस्वरूपा बहनों व सिद्धाश्रम चेतनाओं ने पदप्रक्षालन का क्रम पूर्ण किया। तदोपरान्त भावगीतों का क्रम प्रारम्भ हुआ, जिसकी महत्त्वपूर्ण पंक्तियाँ उद्धृत हैं—

मन को पावन करो, धन्य जीवन को करो, गुरुनाम की ये पावन दवाई है। – बाबूलाल विश्वकर्मा जी, दमोह, मध्यप्रदेश।  अनन्त समस्याओं का एक बार ही हल होगया। गुरुचरणों को पाकर जीवन सफल होगया।। -सिद्धाश्रम चेतना अद्वैत जी, सिद्धाश्रम, मध्यप्रदेश।  जबसे होगए पिया पुजारी, गुरुवर से जब मिलकर आए …।।- वीरेन्द्र दीक्षित जी, दतिया, मध्यप्रदेश।

भावगीतों के मध्य में शक्तिस्वरूपा बहन संध्या शुक्ला जी ने शिविरस्थल पर उपस्थित जनमानस को सम्बोधित करते हुए परम पूज्य गुरुवरश्री की त्याग-तपस्या और विराटता का वर्णन करते हुए कहा, “जिन्होंने अपनी पूर्ण कुण्डलिनीचेतना जाग्रत् कर ली हो, जिन्होंने स्वयं माता आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बे के दर्शन प्राप्त कर लिए हों, जिनके हाथों में नवग्रहों की सिद्धियाँ प्राप्त हों और तन्त्र-मन्त्र के हर प्रयोग करने का ज्ञान प्राप्त किया हो तथा जिनके हाथों में प्रलय करने की क्षमता हो, जिनके हाथों में किसी को जीवनदान देने की क्षमता हो, जरा विचार कीजिए, तप-त्याग-पुरुषार्थ की प्रतिमूर्ति गुरुदेव जी इतनी विराटता को लेकर मानव रूप में सामने बैठे हैं। ऐसे ऋषिवर, ऐसे सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज ने अपने शिष्यों से क्या मांगा है? यही मांगा है कि अपने अवगुण मुझे दे दो, मुझे और कुछ नहीं चाहिए और मेरा सबकुछ तुम्हारा है।

परम पूज्य गुरुवरश्री ने अपनी चेतनातरंगों के प्रभाव से लाखों नहीं, करोड़ों भक्त तैयार कर दिए, जो उनकी विचारधारा को अपनाकर युग परिवर्तन के लिए अपने क़दम बढ़ा चुके हैं।”

ऋषिवर के दिव्य चिन्तन

सद्गुरुदेव परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज ने भौतिकतावाद से ग्रसित मनुष्यों के आत्मोत्थान हेतु और जीवनपथ पर अग्रसर रहने के लिए आध्यात्मिक ज्ञानामृत का पान कराते हुये कहा कि—

 “आज नवरात्र से जुड़ी विजयादशमी की पावन तिथि है और इस तिथि के आते ही यह अहसास होता है कि असत्य पर सत्य की विजय, अन्धकार पर प्रकाश की विजय की तिथि है यह। यह तिथि हमें यह अहसास कराती है कि असत्य कभी सत्य पर हावी नहीं हो सकता। इसलिए हमें स्वयं सोचना चाहिए कि जब असत्य का विनाश सुनिश्चित है, तो हम क्यों इस पथ पर चलें। आज नहीं तो कल, असत्य के अस्तित्व को समाप्त होना ही है। क्यों न हम ऐसे पलड़े का चयन करें, जो हमें सत्य की ओर ले जाता है, जिसमें तृप्ति हो, शांति हो, संतोष हो और माता आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बे का आशीर्वाद हो। अत: इस पर्व पर स्वयं के द्वारा स्वयं को संकल्पित करें कि अवगुणों के रास्ते से, असत्य के रास्ते से मुख मोड़कर हम सत्य के रास्ते पर चलेंगे।

  आत्मोत्थान के लिए हमें सत्य के रास्ते पर चलना ही पड़ेगा। सत, रज, तम में से सतोगुण को प्राथमिकता दो, तभी हमारी सतोगुणी कोशिकाएं प्रभावी होंगी और हमारे कार्य करने की क्षमता बढ़ेगी।  हर पल हमारा प्रयास होना चाहिए कि हमारी सतोगुणी कोशिकाएं प्रभावक हों और रजोगुण, तमोगुण इसके आधीन रहें, तभी तो हम अपने सनातन का परचम फहरायेंगे।।

   सनातनधर्म ही ऐसा धर्म है, हिन्दूधर्म ही ऐसा धर्म है, जो विश्वकल्याण की बात करता है। दुनिया में इसके अलावा कोई भी दूसरा धर्म बता दो, जो विश्वकल्याण की बात करता हो, जो विश्वकल्याण के बारे में सोचता हो? हिन्दूधर्म ही ऐसा है, जो सभी धर्मों का सम्मान करता है। आज समाज को दिशाभ्रमित करके छोटे-छोटे अनेक धर्म बना दिए गए! अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंकने के लिए, अपनी परम्परा चलाने के लिए या अपनी पहचान बनाने के लिए कुछ पार्टियां जाति-उपजातियों का खेल खेलकर समाज को खण्ड-खण्ड कर रहीं हैं!

वर्तमान में सबसे ज़्यादा सनातनधर्म, हिन्दूधर्म को आघात पहुंचाया जा रहा है। चाहे इस्लामधर्म के जेहादी मानसिकता के हों या ईसाई मिशनरियाँ, ये हिन्दुओं का धर्मपरिवर्तन कराने में लगे हुए हैं और इनमें ईसाईधर्म को मानने वाले तो मक्कार हैं, जो हिंसक प्रवृत्ति भी अपना चुके हैं, ग़रीबी का फायदा उठाकर व पैसे का प्रलोभन देकर हिन्दुओं का धर्मपरिवर्तन कराया जा रहा है और हमारे शंकराचार्य चादर तानकर सो रहे हैं। आख़िर किसी-न-किसी को तो आवाज़ उठानी ही पड़ेगी। हिन्दूधर्म के देवी-देवताओं के अनादर की बात की जाती है, देवी-देवताओं को घरों से बाहर निकालने की बात करते हैं और जो धर्म ऐसा कहता है, वह धर्म नहीं पाखण्ड है।

कोई कह रहा है कि कबीर ही इस सृष्टि के रचयिता हैं! अरे, कबीर एक संत थे, जिन्होंने समाजसुधार का कार्य किया। इस दृष्टि से उनका सम्मान करना चाहिए, लेकिन कुछ धूर्तों के द्वारा उन्हें सृष्टि का रचयिता कहा जा रहा है! इससे समाज को  सजग होने की ज़रूरत है। हमारे सैकड़ों नहीं, हज़ारों ऐसे ऋषि-मुनि हैं, जिनके पैर की धूल के बराबर भी कबीर नहीं थे। कबीर को संत के रूप में, समाजसुधारक के रूप में, जो जैसा हो, उसे उसी अनुरूप परिभाषित करना चाहिए।

 सनातन को खण्ड-खण्ड करने की कोशिश की जा रही है। अरे, जबसे माता आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा ने इस सृष्टि की रचना की, तबसे सनातनधर्म चलता चला आ रहा है। सनातन भारतभूमि की मूलधुरी है। सनातन हमारा है, हिन्दूधर्म हमारा है और अगर हिन्दूधर्म में कोई कमी है, तो उसे सुधारा जाना चाहिए, न कि प्रलोभन में आकर अपना धर्म परिवर्तित कर लें। मक्कारों से हमें बचना है, सनातन को टुकड़े-टुकड़े करने वालों से हमें बचना है। हम सनातनधर्म के थे, हैं और रहेंगे। सनातन को खण्ड-खण्ड कर देने की कुत्सित मंशा रखने वालों को, लोगों को धर्म और जाति के नाम पर बांटने वालों वे राजनीति का खेल खेलने वालों को सबक सिखाना पड़ेगा।

    द्वापर में पाँच पाण्डव, कौरवों पर भारी थे। पांडवों की बात छोड़ दें, तो इस कलिकाल में एक योगी आदित्यनाथ ही हज़ारों जेहादियों पर भारी हैं। देश में यदि 20-50 लोग ही योगी आदित्यनाथ जैसे बन जाएं, तो हमारा भारत देश विश्वगुरु बन जाए। इसके लिए विचारों में दृढ़ता होनी चाहिए, सत्यता होनी चाहिए। अपने बच्चों को चेतनावान् बनाओ, धर्मवान बनाओ, कर्मवान बनाओ, संस्कारवान बनाओ। इससे तुम्हारा भी कल्याण होगा और समाज व देश का भी कल्याण होगा। आप लोगों को विवेकवान बनने की ज़रूरत है। राष्ट्र सुरक्षित है, तो हम सुरक्षित हैं और हम सुरक्षित हैं, तो हमारा सनातनधर्म सुरक्षित है।  नित्यप्रति पीपल के वृक्ष के नीचे कुछ देर बैठो, शुद्ध प्राणवायु प्राप्त होगी, चैतन्यता प्राप्त होगी, नित्यप्रति योग-ध्यान-साधना, प्राणायाम करो, तुम्हारा अन्तर्मन, तुम्हारा हृदय और शरीर सभी स्वस्थ रहेंगे। अकेले कार्य मत करो, संगठित होकर कार्य करो। आहार व विचार शुद्ध, सात्विक होने चाहिए। शाकाहारी भोजन करो, तामसिक आहार मत लो। अनुशासनात्मक जीवन जियो तथा भारतीय परिवेश में रह करके अपने आपको गौरवान्वित करो। ऐसी कंपनियों के प्रोडक्ट खरीदना बन्द करो, जो नारी की नग्नता परोसते हैं। धर्म, राष्ट्र की रक्षा और मानवता की सेवा के लिए जीवन समर्पित करो।

शिविरस्थल पर उपस्थित एक लाख से अधिक जनमानस को ऋषिवर ने 11 अतिमहत्त्वपूर्ण

संकल्प दिलाए  

     1- मैं नशे-मांसाहार से मुक्त चरित्रवान्, चेतनावान्, पुरुषार्थी व परोपकारी जीवन जियूंगा। 2- मैं मानवता की सेवा, धर्मरक्षा एवं राष्ट्ररक्षा के लिए अपने जीवन को समर्पित करूंगा। 3-  मैं गौसेवा और गौसंरक्षण के लिए अपने जीवन को समर्पित करूंगा। 4- मैं पर्यावरण की रक्षा के लिए वृक्षारोपण को बढ़ावा देते हुए स्वयं वृक्षारोपण करूंगा और उन्हें संरक्षित करूंगा। 5- मैं जातिभेद, छूआछूत की भावना को दूर करके समाज में सद्भावना का वातावरण बनाऊंगा। 6- मैं धर्मद्रोहियों, राष्ट्रद्रोहियों व राष्ट्र की सम्पत्ति को क्षति पहुंचाने वालों का कभी सम्मान नहीं करूंगा। 7- मैं अपने भगवती मानव कल्याण संगठन के सभी जनजागरण के कार्यों में पूर्ण अनुशासित, मर्यादित रहकर नियमों, निर्देशनों के अन्तर्गत कार्य करूंगा। 8-  मैं किसी भी खाद्य पदार्थ में मिलावट नहीं करूंगा और मिलावट करने वालों को क़ानून के दायरे में लाकर सजा दिलाने का कार्य करूंगा। 9- मैं नारी की रक्षा के लिए, नारी के सम्मान के लिए सदैव तत्पर रहूँगा। 10- मैं माता-पिता एवं वृद्धजनों का सदैव सम्मान करूंगा और माता-पिता को कभी भी किसी अनाथालय में नहीं छोडूंगा। 11- मैं कभी भी, किसी भी परिस्थिति में आत्महत्या नहीं करूंगा।

    अतिमहत्त्वपूर्ण संकल्प दिलाने के उपरान्त सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज ने कहा कि “इन संकल्पों के बीच जीवन जीकरके देखो, आत्मचेतना की प्राप्ति होगी, आत्मोत्थान होगा। ऐसे विचार ही हमें शक्ति देते हैं। जिस तरह के विचार हम रखते हैं, उसी तरह की ऊर्जा हमें प्राप्त होती है। सद्विचारों का जीवन जीकर देखो, आनन्द मिलेगा, शांति और संतोष मिलेगा।”

शिविर समापन के अवसर पर पूर्व के दो-दिनों की भांति शिविरस्थल पर उपस्थित जनमानस ने आरतीक्रम सम्पन्न करके शांतिपूर्वक क्रमबद्ध होकर गुरुचरणपादुकाओं को श्रद्धापूर्वक नमन करते हुए आश्रम में ही प्रसादरूप में निर्मित शुद्ध चिरौंजी दाना को ग्रहण किया। तत्पश्चात् अन्नपूर्णा भंडारे में भोजन प्रसाद ग्रहण किया। इस तरह शक्ति चेतना जनजागरण ‘आत्मोत्थान’ शिविर सुनियन्त्रित व्यवस्था के बीच शांतिपूर्ण रूप से सम्पन्न हुआ।

।। जय माता कीजय गुरुवर की।।

दिव्य आरती का क्रम

शक्तिस्वरूपा बहनों पूजा शुक्ला जी, संध्या शुक्ला जी, ज्योति शुक्ला जी एवं सिद्धाश्रम चेतनाओं आरूणी जी, अद्वैत जी, आत्रेय जी, अधीश जी के द्वारा उपस्थित समस्त भक्तों की ओर से तीनों दिवस माता भगवती आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा व परम पूज्य गुरुदेव जी की दिव्य आरती सम्पन्न की गई। उस समय का वातावरण चेतनातरंगों से आच्छादित ‘माँ’मय व भक्तिभाव से परिपूरित था। गुरुवरश्री की ध्यानावस्थित मुद्रा और प्रवाहित चेतनातरंगों की अनुभूति की अलौकिकता उपस्थित लाखों भक्तों के रोम-रोम को पुलकित कर रही थी। 

इसे चमत्कार नहीं कहेंगे, तो क्या कहेंगे?

पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम पर शारदीय नवरात्र की अष्टमी, नवमी, विजयादशमी को आयोजित त्रिदिवसीय शिविर के दौरान भारी बारिश के योग थे। चहुंओर, यहां तक कि सिद्धाश्रम से बाहर तीन-चार किलोमीटर तक बारिश होती रही और इस बारे में मौसम विभाग के द्वारा जानकारी प्रसारित की जा रही थी, मोबाइल ऐप से भी दिखाया जा रहा था कि तेज बारिश हो रही है। आसमानी बिजलियाँ कड़क रहीं थीं, शीतल हवाएं चल रहीं थी, लेकिन शिविर के तीन दिनों तक सिद्धाश्रम में एक बूंद भी पानी नहीं गिरा और यदि बारिश होजाती, तो विभिन्न व्यवस्थाएं अव्यवस्थित हो सकती थीं और देश-देशान्तर से सिद्धाश्रम पहुंचे लाखों भक्तों को परेशानी का सामना करना पड़ता। इसे हम चमत्कार नहीं कहेंगे, तो क्या कहेंगे?

विजयादशी को शिविर सम्पन्न होने के बाद दूसरे दिवस तक, जब भक्तगण अपने-अपने गृहक्षेत्रों की ओर चले गए, तब एकादशी तिथि को सिद्धाश्रम में इतनी तेज बारिश हुई कि बादलों ने तीन दिनों की कसर पूरी कर दी। ‘मायापति की माया, वे ही जानें।‘ इस तरह माता आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा की असीम कृपा और ऋषिवर सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज के आशीर्वाद से चल रहीं शीतल हवाओं, सूर्यरश्मियों और भक्तिमय चेतनातरंगों के आनन्दमय वातावरण में शिविर निर्विघ्न सम्पन्न हुआ।

सिद्धाश्रम स्थापना दिवस पर होगा अगला शिविर

सद्गुरुदेव जी महाराज ने अपने चिन्तन के दौरान कहा कि “ मैं चाहता हूँ कि महाशक्तियज्ञस्थल मंदिर शीघ्र से शीघ्र तैयार होजाए, जिससे यज्ञों का क्रम प्रारंम्भ किया जा सके। अत: जनजागरण शिविर, जो सिद्धाश्रम से बाहर आयोजित होते थे, उन्हें विराम दे रहा हूँ, तथा भक्तों की भावना के आधार पर शारदीय नवरात्र के अलावा सिद्धाश्रम स्थापना दिवस पर भी एक शिविर के लिए मैंने निर्णय लिया है और अगला शिविर 22-23 जनवरी 2026 को आयोजित किया जाएगा।

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