“अन्धकार के क्षणों में, विषम परिस्थितियों में घबड़ाकर जो व्यक्ति जीवन से निराश होकर आत्महत्या की ओर प्रवृत्त होजाते हैं, यह कायरता की निशानी है। अंधकार के क्षणों में जब मन विचलित होजाये, कहीं कुछ आसरा न दिखाई दे, उस समय ऋषिवर सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज को अपने पवित्र अन्तरूकरण से पुकारो, वे तुम्हारी दर्दभरी पुकार अवश्य सुनेंगे।”
शारदीय नवरात्र के पावन पर्व पर आयोजित शक्ति चेतना जनजागरण शिविर ‘महाशक्ति शंखनाद’ में देश-विदेश से लाखों की संख्या में पहुंचे ‘माँ’ के भक्त, ऋषिवर सद्गुरुदेव परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज के शिष्यों ने जहाँ अध्यात्मिक ज्ञानामृत का पान किया, वहीं पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम धाम के कण-कण में व्याप्त माता भगवती आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा की भक्ति से प्रवाहित विशेष चेतनातरंगों से अविभूत हुये। दिनांक 22, 23, 24 अक्टूबर 2023 (अष्टमी, नवमी, विजयदशमी तिथि) को पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम में पूर्णरूपेण नशामुक्त, मांसाहारमुक्त और चरित्रवान् लाखों भक्तों का समूह उमड़ पड़ा था।
शिविर के तीनों दिवस सर्वप्रथम ब्रह्ममुहूर्त पर भक्तजन मूलध्वज साधना मंदिर में आरतीक्रम पूर्ण करने के पश्चात् श्री दुर्गाचालीसा अखण्ड पाठ मंदिर में पहुंचकर 27 वर्षों से चल रहे श्री दुर्गाचालीसा पाठ में सम्मिलित हुये, जहाँ परम पूज्य सद्गुरुदेव जी महाराज के द्वारा प्रात: 06 बजे स्वयं उपस्थित होकर आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा और सहायक शक्तियों की पूजा-अर्चना व ध्यान-साधना नित्यप्रति की तरह करने के पश्चात् मूलध्वज साधना मन्दिर पहुंचकर मानवता के कल्याण की कामना माता जगदम्बे से की। उक्त साधनात्मक क्रमों के बाद प्रात: साढ़े सात बजे सभी ‘माँ’भक्तों ने शिविर पण्डाल में बैठकर सम्पूर्ण मनोयोग से अतिमहत्त्वपूर्ण बीज मंत्र ‘माँ-ॐ’एवं गुरुमन्त्र ॐ शक्तिपुत्राय गुरुभ्यो नमः व चेतनामन्त्र ॐ जगदम्बिके दुर्गायै नमः का सस्वर जाप किया। तदोपरान्त, शिविर पंडाल में उपस्थित भक्तों को शक्तिस्वरूपा बहन संध्या शुक्ला जी ने जहाँ साधनाक्रम की जानकारी दी, वहीं स्वस्थ जीवन की दिशा में एक और क्रम जोड़ते हुये योगाभ्यास कराया।

विदित हो कि भगवती मानव कल्याण संगठन व पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम ट्रस्ट के सदस्यों के द्वारा संयुक्त रूप से सिद्धाश्रम धाम के विशाल परिसर में दिन-रात अथक परिश्रम करके अत्यन्त ही आकर्षक व भव्य मंच तथा वृहदाकार पंडाल का निर्माण किया गया था, जहाँ तीन दिवस तक प्रतिदिन निर्धारित समय पर अपराह्न 03 बजे से ऋषिवर के चिन्तनामृत की वर्षा होती रही, इस मध्य शिविर के तीनों दिवस 04:30 बजे एक लाख से अधिक भक्तों ने ‘महाशक्ति शंखनाद’ किया तथा चिन्तन के उपरान्त सभी ने दिव्य आरती से उत्सर्जित अलौकिक ऊर्जा का लाभ प्राप्त किया।
127वें शक्ति चेतना जनजागरण शिविर ‘महाशक्ति शंखनाद’ का प्रथम दिवस
वृहदाकार प्रवचन पंडाल अपार जनसमुदाय से खचाखच भरा हुआ था। सभी की आँखें सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज के आगमन की प्रतीक्षा में बिछी हुई थीं, तभी अपराह्न 02:30 बजे परम पूज्य गुरुवरश्री के पदार्पण के साथ ही सम्पूर्ण वातावरण जयकारे, शंखध्वनि व तालियों की गड़गड़ाहट से गुंजायमान हो उठा। उनके मंचासीन होते ही सर्वप्रथम शक्तिस्वरूपा बहन पूजा जी, संध्या जी व ज्योति जी के द्वारा समस्त भक्तों की ओर से गुरुवरश्री का पदप्रक्षालन करके पुष्प समर्पित किये गए। तत्पश्चात् भगवती मानव कल्याण संगठन के सदस्यों में से, गीत-संगीत की प्रतिभा के धनी शिष्यों ने भक्तिरस से परिपूर्ण भावगीत प्रस्तुत किये, जिसके कुछ अंश इस प्रकार हैं :-
विश्व जहाँ नतमस्तक हो, माँ की ज्योति जली है। ये धर्मधुरी है, विश्व की धर्मधुरी है।।-प्रतीक मिश्रा जी, सिद्धाश्रम। जय हो जय हो ऋषिराज, लगा शिविर महाशक्ति शंखनाद।-जान्हवी जी और भाग्या पाण्डे जी, कानपुर। परिवर्तन का चक्र चला है, रोके न रुक पायेगा, आओ करें ख़ुद में परिवर्तन जगत् बदलता जायेगा। जो बढ़ चलेगा सत्य के पथ पर, माँ की कृपा वह पायेगा।। यह सुमधुर भावगीत गाकर शक्तिस्वरूपा बहन संध्या शुक्ला जी ने सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। चालीसा भवन बनकर तैयार, गुरुवर तुम्हारी जय-जयकार। हृदय समाये न हर्ष अपार, गुरुवर तुम्हारी जय-जयकार।।-बाबूलाल विश्वकर्मा जी, दमोह।
भावगीतों के प्रस्तुतीकरण के पश्चात् ऋषिवर सद्गुरुदेव परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज ने ध्यानावस्थित होकर माता आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा की स्तुति की और सभी शिष्यों, चेतनाअंशों तथा प्रवचन पंडाल में उपस्थित विशाल जनसमुदाय सहित शिविर की व्यवस्था में लगे सभी कार्यकर्ताओं को पूर्ण आशीर्वाद प्रदान करते हुये सुपरिचित हृदयग्राह्य मन्द मुस्कान के साथ चिन्तन प्रदान करते हैं–
“ये पावन पवित्र भक्ति से परिपूर्ण क्षण मानव के जीवन में सहज रूप से परिवर्तन लाते चले जाते हैं। हमारे जीवन पर वातावरण, परिवेश और परिवारिक पृष्ठभूमि, इन सभी का प्रभाव पड़ता है। नवरात्र पर्व पर पूरे देश में ‘माँ’मय वातावरण है। यह पावन पर्व शक्ति और साधक, ‘माँ’ और बेटे, भक्त और भक्ति के मिलन का पर्व है और ऐसा उत्तम पर्व और कोई हो ही नहीं सकता। नवरात्र पर्व हो, ‘महाशक्ति शंखनाद’ हो, सिद्धाश्रम धाम हो, जहाँ अनेक शिविर हो चुके हों, ‘माँ’ का गुणगान विगत 26 वर्ष से अनन्तकाल के लिए चल रहा हो, त्रिशक्ति गोशाला स्थापित हो और गऊमाताओं का आशीर्वाद मिल रहा हो, ऐसे पावन स्थान पर बैठने का सौभाग्य आप लोगों को मिल रहा है।

आज से 26 वर्ष पूर्व एक गाय को लेकर कुछ शिष्यों के साथ मेरे द्वारा यहाँ प्रवेश किया गया था और आज लगभग 300 गोवंश इस सिद्धाश्रम में स्थित त्रिशक्ति गोशाला में मौजूद हैं। पिछले 26 वर्ष से मेरी नित्य की साधनाएं, यहाँ के कण-कण को चैतन्य बना रही हैं और अलौकिता लिए श्री दुर्गाचालीसा अखण्ड पाठ मंदिर बन चुका है, और मंदिर बनते रहेंगे, लेकिन मेरा मूल लक्ष्य है यहाँ के कण-कण को चैतन्य बना देना, अपने शिष्यों को शक्तिसाधक बना देना और सम्पूर्ण मानवता का कल्याण। ‘माँ’ के चरणों के पास बैठकर एक बार जो निर्णय ले लिया गया है, उस पर कोई परिवर्तन नहीं और यह ‘माँ’ की कृपा ही है कि सभी कार्य निर्विघ्न सम्पन्न होते जा रहे हैं। यहाँ मेरे पूज्य पिता दण्डी संन्यासी स्वामी श्री रामप्रसाद आश्रम जी महाराज की समाधि मौजूद है, जिनका ख़ून मेरी रगों में दौड़ रहा है, जिन्होंने मुझे निर्भीक बनाया, पुरुषार्थी बनाया, धर्मवान और कर्मवान बनाया। इस पवित्र स्थल पर बाबा दानबीर की गुफा मौजूद है, जो अपनी अनेक शक्तियों के साथ इस स्थान की रक्षा करते हैं।
आपके गुरु ने अपने जीवन के किसी भी मोड़ पर एक क्षण के लिए भी आलस्य, अकर्मण्यता और जड़ता का जीवन नहीं जिया। हमारा एक-एक पल, एक-एक क्षण, जो हमारा है ही नहीं, जिसे प्रकृतिसत्ता ने हमें दिया है, उन पलों को, उन क्षणों का हम सदुपयोग करें, आत्मकल्याण और जनकल्याण के पथ पर चलें, सत्यधर्म के पथ पर चलें। इस पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम पर माता भगवती आदिशक्ति जगत् जननी का गुणगान, श्री दुर्गाचालीसा का पाठ 26 वर्ष पूर्व एक छप्पर के नीचे प्रारम्भ कराया गया था। एक वर्ष के अन्दर एक अस्थाई भवन बनवा दिया गया और विचार बना कि ‘माँ’ की कृपा रही, तो आगे स्थाई भवन बनवा दिया जायेगा। मुझे कोई जल्दी नहीं थी, मुझे विश्वास था ‘माँ’ की कृपा पर, अपने कर्म पर और अपने शिष्यों पर। उसी का प्रतिफल है कि आज विशाल और भव्य श्री दुर्गाचालीसा अखण्ड पाठ मंदिर बनकर तैयार है और जहाँ 11 दिव्यशक्तियों की स्थापना इस नवरात्र पर्व की पंचमी तिथि को की गई।
आप लोगों के प्रयास का ही परिणाम है कि हमारी तीनों धाराएं समाज में अपना स्थान बना चुकी हैं और एक विराट परिवर्तन प्रारम्भ हो चुका है। ‘माँ’ की कृपा है कि उन्होंने आप लोगों की और मेरी प्रार्थना को सुना तथा चालीसा पाठ मंदिर ने पूर्णता के साथ अपने स्वरूप को प्राप्त किया। यह तो मात्र टेलर है, असली पिक्चर कैसी होगी, आगे समाज देखेगा। यह तो शुरुआत है, हमें अपनी आत्मा की जननी पर और अपने पुरुषार्थ पर गर्व होना चाहिए। जहाँ सत्य है, वहीं शक्ति है। आप लोगों को केवल सत्य को धारण करना है। सत्य की ताक़त को आज तक कोई झुका नहीं सका है। इस धरती पर देवतुल्य वही होता है, जो परोपकारी है और तप, त्याग, पुरुषार्थ का जीवन जीता है।
इस पवित्रस्थल पर वर्ष 2011 में गुरुपूर्णिमा को स्थाई चालीसा भवन की नीव रखी गई थी, जो अपने पूर्णस्वरूप को प्राप्त करके विश्व की मानवता को भक्ति, ज्ञान और आत्मशक्ति प्राप्त करने के लिए आह्वानित कर रहा है। मुझे गर्व है कि इस चालीसा पाठ मंदिर के निर्माणकार्य में 99 प्रतिशत सहयोग मेरे शिष्यों का है। परोपकार में जिसका धन लग गया, वास्तव में वही सामर्थ्यवान है और जहाँ पर 11 दिव्यशक्तियों की स्थापना हुई है, वहाँ पर किसी का धन लग जाना उसके लिए अतिसौभाग्य की बात है। यज्ञस्थल का निर्माण कार्य भी प्रारम्भ करा दिया गया है, जिसके निर्माण की समयसीमा तीन से पाँच वर्ष रखी गई है। आप लोगों को जल्द ही महशक्तियज्ञों का भी लाभ प्राप्त होगा। उन यज्ञों से जो ऊर्जा प्रवाहित होगी, आने वाला समाज देखेगा।
मैं अपने शिष्यों को चेतनावान्, पुरुषार्थी और परोपकारी बनाना चाहता हूँ। आप लोगों को एक चेतनावान् गुरु की प्राप्ति हुई है। यदि मैं चाहूँ, तो कुबेर का आवाहन करके स्वर्ण की वर्षा करा सकता हूँ। अनेकऋषियों-मुनियों ने ऐसा किया है। मेरी बात सुनकर पर्चाधारी स्वकथित सिद्ध, त्रिकालज्ञ बौखला उठे होंगे।
एक सम्मानित शंकराचार्य ने उत्तराखंड के जोशीमठ की समस्या को ठीक करने की चुनौती रखी थी, लेकिन पर्चा बनाने वाले ये सिद्ध, कुकरमुत्ते की तरह मौन बैठे रहे। लेकिन, आपके गुरु ने प्रयागराज की धरती पर उस चुनौती को स्वीकार किया था। आज अष्टमी तिथि और शिविर का प्रथम दिवस है, दो दिन का शिविर और है, जितने भी पर्चा बनाने वाले त्रिकालज्ञ, दिव्य दरबार लगाने वाले हैं, सभी को ससम्मान एक और चुनौती देता हूँ कि तीन प्रदेशों- मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में किसकी सरकार बनेगी? मैं तीन लिफाफों पर लिखकर रखूंगा और वे भी लिखकर रखें और जब परिणाम आ जायें, तो खोलकर देखें कि सत्य किसमें निकलता है? लफ्फाजी से काम नहीं चलता। कथायें हों, अच्छी बात है, देवी-देवताओं का गुणगान हो, अच्छी बात है, कथावाचक हो, ज्ञानी हो, लेकिन यदि अपने आपको सिद्ध कहोगे, तो सिद्धों को चुनौती देने के लिए सच्चिदानंद मौजूद हैं। मैं समाज को इन कुकरमुत्तों से बचाने का हमेशा प्रयास करूंगा।
कुछ लोग समाज को उग्र बनाकर यह दिखाना चाहते हैं कि मैं सनातन का रक्षक हूँ। पगड़ी लगाकर, टोपी पहनकर लफ्फाजी करते हैं और इस बात को बीजेपी भंजाने में लग गई। समाज में उग्रवाद पैदा करोगे, तो मारा जायेगा समाज, तुम तो शासन-प्रशासन से सुरक्षा ले लोगे। कौन ग़लत है और कौन सही है? साधु ऐेसे नहीं होते। साधु वह है, जो सच कह सके। यह कहने की ताक़त इन सिद्धों में, दिव्य दरबार लगाने वालों में नहीं है, ये सनातन के नाम पर समाज को केवल भ्रमित करना जानते हैं। कांग्रेस देशद्रोही पार्टी है, बीजेपी भी कम नहीं है, लेकिन कांग्रेस से अच्छी है, क्योंकि इसने देश के लिए कुछ तो किया है, फिर भी देश के प्रति, देशवासियों के प्रति पूरी तरह से ईमानदार नहीं है। इसीलिए मैंने भारतीय शक्ति चेतना पार्टी का गठन किया है।

हमारे सनातन की जो शक्ति है, उससे परे कुछ है ही नहीं! सनातन के लुटेरे तो तथाकथित धर्माधिकारी ही हैं। सनातन ही सबकुछ है। हम पेड़-पौधों, पहाड़ों-पत्थरों तक को पूजते हैं। मैं तो कहता हूँ कि एक पूरे लोक को भी नष्ट कर दिया जाए, तो भी सनातनधर्म को नष्ट नहीं किया जा सकता। क्योंकि ब्रह्मांड में अनेक लोक हैं, देव लोक हैं, सिद्धाश्रम लोक हैं। सनातन की जननी को कौन मिटा सकता है? आज आवश्यकता है कि निष्ठा, विश्वास, समर्पण की भावना को लेकर चला जाए और अपने बच्चों को भी उसी पथ पर चलाया जाए, जो आगे चलकर तपस्वी बनें, पुरुषार्थी बनें।
सत्य को खुली आँखों से देखने का प्रयास करो और सत्यपथ पर चलो। स्वयं को जानो कि तुम कौन हो, तुम्हारी सामर्थ्य क्या है और तुम्हारे कर्त्तव्य क्या हैं? माचिस की तीली को देखो कि किस तरह शांत पड़ी रहती है और चाहो तो उसे प्रचण्ड ज्वाला का रूप दे सकते हो। उसी तरह तुम्हारे अन्दर आत्मा बैठी हुई है, तुम यदि चाहो तो उसके दिव्य आलोक से विश्व को आलोकित कर सकते हो, केवल अपने आपको जानने की जरूरत है, पहचानने की जरूरत है।”
प्रेरणास्पद चिन्तन के उपरान्त, सायं साढ़े चार बजे परम पूज्य सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज के सान्निध्य में एक लाख से अधिक शिष्यों-भक्तों ने ‘महाशक्ति शंखनाद’ किया। शंखनाद के बाद शिविर में उपस्थित जनसमुदाय ने दोनों हाथ उठाकर नशे-मांसाहार से मुक्त चरित्रवान् जीवन जीने और धर्मरक्षा, राष्ट्ररक्षा व मानवता की सेवा के प्रति आजीवन समर्पित रहने का संकल्प लिया, तत्पश्चात् ‘माँ’-गुरुवर की दिव्य आरती को आत्मसात करके जीवन को धन्य बनाया।
अंत में सभी गुरुचरणपादुकाओं को नमन करके प्रसाद प्राप्त करते हुए अन्नपूर्णा भंडारा स्थल की और प्रस्थित हुए।
शिविर के द्वितीय दिवस का द्वितीय सत्र
पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम धाम की अलौकिक छटा से अविभूत होकर धर्मप्रेमी आगन्तुकजन मोहित हो उठे थे तथा रह-रहकर यहाँ प्रवाहित ऊर्जात्मक चेतनातरंगों से लोगों का पूरा शरीर रोमांचित हो रहा था। शक्ति चेतना जनजागरण शिविर में आयोजन स्थल की अद्भुत छटा देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो माता जगदम्बे आसुरीतत्त्वों के पराभव और युगपरिवर्तन के लिए किए जा रहे ‘महाशक्ति शंखनाद’ को अपना पूर्ण आशीर्वाद प्रदान कर रही हों।
द्वितीय दिवस की अपरान्ह बेला, पदप्रक्षालन के क्रम के उपरान्त भगवती मानव कल्याण संगठन के कुछ सदस्यों ने भावगीत प्रस्तुत किए और सिद्धाश्रम चेतना नन्हें साधकों ने अतिमनमोहक प्रस्तुति दी, जिसके प्रारम्भिक अंश इस प्रकार हैं–
हे सबके प्राणाधार, हे शक्ति के अवतार, कर लिए दर्शन साकार तुमने बारम्बार।-ओमवती आठ्या जी, दमोह। तूने लिया न माँ का नाम, तीरथ फिरे तमाम। उमर कम होती जाती है, उमर कम होती जाती है।।-वीरेन्द्र दीक्षित जी, दतिया।

ॐ अस्य श्री दुर्गासप्तश्लोकी स्तोत्रमन्त्रस्य नारायण ऋषिरू अनुष्टुप छन्दरू श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वत्यो देवतारू, श्री दुर्गा प्रीत्यर्थं सप्तश्लोकी दुर्गापाठे विनियोगरू।-ॐ ज्ञानिनापि चेतांसि देवि भगवती हि सा। बालादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति। -सिद्धाश्रम चेतना नन्हें साधक अद्वैत जी ने माता अम्बे की स्तुति करके शिविर में उपस्थित अपार जनसमुदाय को आश्चर्यचकित कर दिया। जय-जय गुरुवर भगवान्, हे दयानिधान,…।-सिद्धाश्रम चेतना नन्हे साधक आत्रेय जी के श्रीमुख से गुरुवन्दना सुनकर तो भक्तजन मोहित हो उठे। हर लो पाप अंधियारा, कर लो धर्म उजियारा। -बाबूलाल विश्वकर्मा जी, दमोह।
भावसुमनों के प्रस्तुतीकरण के पश्चात् सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज शिविरस्थल पर उपस्थित शिष्यों-भक्तों व श्रद्धालुओं को आशीर्वाद प्रदान करते हुए कहते हैं–
“यह सौभाग्यशाली क्षण जो आप लोग प्राप्त कर रहे हैं, यही जीवन का सत्य है। इस दिव्यधाम में सौभाग्यशाली लोग ही उपस्थित हो पाते हैं। यह स्थान जो परोपकार और पुरुषार्थ से भरा हुआ है, माता भगवती आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा की चेतना से भरा हुआ है और ‘माँ’ की सहायकशक्तियों के आशीर्वाद से हर समय प्लावित रहता है, निश्चित है कि एक दिन यह विश्व की धर्मधुरी बनेगा और समस्त तीर्थों की क्षमताएं यहाँ समाहित होंगी तथा यहाँ से सदैव मानवता का कल्याण होता रहेगा।
‘माँ’ की साधना-आराधना के द्वारा ही कलिकाल की भयावहता से बचा जा सकता है। परम सौभाग्य है कि आप लोगों को माता जगदम्बे की स्तुति, वन्दना, आरती करने का अवसर मिला हुआ है। यदि यह सौभाग्य बना रहा, तो आपसे जो छिन गया होगा, उससे कई गुना अधिक प्राप्त कर लोगे। परमसत्ता की, ‘माँ’ की जब हम स्तुति करते हैं, तो हमारी सात्विक कोशिकाएं जाग्रत् होने लगती हैं। ‘माँ’ की स्तुति करते ही हमारे अन्दर एक विशेष निर्मलता का उद्भव होता है और बाह्यजगत् की सत्ताएं सहज ही सहयोग करने लगती हैं। अत: नित्यप्रति ‘माँ’ की स्तुति, श्री दुर्गाचालीसा का पाठ अवश्य करें। जीवन में चाहे जितने झंझावात आएं, अपने गुरु के इस आदेश का कभी उल्लंघन मत करना, किसी भी परिस्थिति में ‘माँ’ की भक्ति से दूर मत होना। वे हमारी जननी हैं, हमारी सर्वस्व हैं, वे कभी अहित कर ही नहीं सकतीं और जो दु:ख, कठिनाई आती हैं, वह कर्मों के प्रतिफलस्वरूप आती हैं। ‘माँ’ को तो मैंने नजदीक से देखा है, मैंने अपने हाथों से ‘माँ’ के आँसुओं को पोछा हैं। बेटे की आँखों से आँसू निकलें और ‘माँ’ की आँखों में आँसू न आएं, यह कभी हो ही नहीं सकता।
धन तो कोई भी कमा सकता है, लालसा करो धर्म कमाने की और यदि धर्म आपके पास है, तो धन पीछे-पीछे दौड़ेगा। अपने अन्दर सत्कर्म करने की भूख पैदा करो। इस काल में यदि आप ‘माँ’ की भक्ति के पथ पर बढ़ेंगे, तो जो पतन हो रहा है, वह रुक जायेगा। साधना के पथ पर चलो, इस देश में अनेक ऋषि-मुनि, साधक-साधिकाएं हुए हैं। तुम स्वयं कब इस पथ पर बढ़ोगे? अपने साधनात्मक धरातल को नष्ट मत करो। जिस तरह भौतिकता के साधन जुटाने में दिन-रात लगे रहते हो, यदि वही प्रयत्न धर्म के लिए करने लगो, तो जीवन आनन्दमय होता चला जायेगा।

वर्तमान समय में अनेक जि़म्मेवारियाँ हैं। जहाँ हमें साधनापथ पर चलना है, वहीं शोषित और निरीह समाज को भी ऊपर उठाना है, जिन्हें अज्ञानता के पथ पर ढकेल दिया गया है और जो नास्तिकता की राह पकड़ चुके हैं। उन्हें हमें आस्तिक बनाना है और हम उन्हें अज्ञानता से, गरीबी से, निरीहता से उबारकर ज्ञान के क्षेत्र में बढ़ा सकते हैं। नारी का सम्मान जब तक नहीं होगा, समाज दलदल में धसता चला जायेगा। ऊंच-नीच, छुआछूत, जातपात का भेदभाव हमें समाप्त करना है। एक बार निर्णय ले लो कि तुम जगत् जननी के हो और जब तुम उसके हो, तो सभी जगत् जननी के हैं, फिर ऊँच-नीच, छुआछूत, जातपात का भेदभाव कैसा?
सामर्थ्यवान लोग, ज्ञानी, त्रिकालज्ञ, योद्धा जो थे, उन्हें भी जो परम्परागत ज्ञान मिला, उसी लकीर पर चलते रहे और कभी भी ऊँच-नीच, जातपात का भेदभाव मिटाने का प्रयास नहीं किया। इस सम्बंध में कुछ चेतनावान् लोगों ने आवाज भी उठाई, तो उनकी आवाज को दबा दिया गया। कोई जब ग़लत पर आवाज उठाता है, तो वही समाज उसके पीछे पड़ जाता है और वही ग़लत परम्परा चलती चली जाती है। बड़ी-बड़ी सामर्थ्यवान राजसत्ताओं ने भी छुआछूत, जातपात के भेदभाव को मिटाने की दिशा में कार्य नहीं किया। मेरा विरोध अभी अनेक ऐसी बातों पर होना है, जिस पर देश की राजसत्ताएं दहल उठेंगी और बड़े-बड़े धर्माधिकारी सोचने के लिए बाध्य होंगे।
बेटियों का मामा बनकर उन्हें हजार-दो हजार देकर उनकी भावनाओं को ख़रीद लेना चाहते हैं और उनके पतियों को शराब पिला रहे हैं। सरकारें शराब की दुकानें खोलें, शराब बेचें और लोगों का शोषण करें! मैं मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह से कहना चाहता हूँ कि अपनी उन बेटियों के घरों पर जाकर देखो कि उनके पति शराब पीकर क्या गुल खिला रहे हैं? शराब पीकर वे अपनी पत्नियों को प्रताड़ित करते हैं और उनके घर की दुर्दशा देखोगे, तो कलेजा कांप जायेगा। मैं तो सभी राजनेताओं को कहता हूँ कि आगे ये कुत्ते-बिल्लियों की योनि में जायेंगे। आप लोग उसी पार्टी को अपना समर्थन दो, उसी पार्टी को अपना वोट दो, जो यह कहे कि हम सत्ता में आते ही नशामुक्त भारत बनायेंगे, अपने प्रदेश को पूर्ण नशामुक्त घोषित करेंगे। ये जो बड़ी-बड़ी पार्टियों के राजनेता हैं, कहते हैं कि हम कर्ज मा$फ कर देंगे, बिजली का बिल इतने यूनिट तक फ्री कर देंगे। अरे, जब देश को, प्रदेश को नशामुक्त कर दोगे, तो अपने आप सभी खुशहाल हो जायेंगे, तुम्हें न कर्ज माफ़ करने की जरूरत पड़ेगी और न बिजली के बिल में छूट देनें की। आप लोगों को यहाँ से संकल्प लेकर जाना है कि नशे का व्यवसाय करने वाली पार्टियों को वोट नहीं देंगे।
आज तक समाज को जातीयता के दलदल से बाहर निकाला ही नहीं गया। हर धर्म में लिखा है कि सभी मनुष्य जन्म से शूद्र हैं और कर्म के आधार पर जातियाँ निर्धारित होंगी और आज अधर्मी-अन्यायी राजनेता उसी जाति को आधार बनाकर विद्वेष फैला रहे हैं, बार-बार जातीय जनगणना की माँग कर रहे हैं। आख़िर ये जातीय जनगणना है क्या? ये अन्यायी-अधर्मी राजनेता धर्म को माध्यम बनाकर लोगों को सम्प्रदायिकता की आग में झोंक रहे हैं। आज हिन्दू-मुस्लिम व अन्य धर्मों के बीच सम्प्रदायिकता की आग लगी हुई है, लोग एक स्थान से दूसरे स्थान की ओर भाग रहे हैं। जहाँ जिस धर्म के लोगों का बाहुल्य है, वे अन्य धर्म को मानने वालों को भगा करके अपना एकछत्र अधिकार जमाना चाहते हैं। क्या यही होता रहेगा कि जहाँ जिस धर्म के, जिस जाति के लोगों का बाहुल्य है, वे अन्य पर हावी होते जायें? कांग्रेस के राहुल गांधी जैसे नेता बार-बार जातीय जनगणना की बात करते हैं! उनकी बहन कहती है कि मेरा भाई विदेश से पढ़कर आया है। अरे, यदि वह अपने देश में पढ़ा होता, तो उसमें कुछ अच्छे संस्कार होते। आने वाली सरकार को यह निर्णय लेना पड़ेगा कि कोई जातिगत जनगणना नहीं होगी।
आज लोकतंत्र है, सभी को अनीति-अन्याय-अधर्म के ख़िलाफ़ आवाज उठाने का अधिकार है। हमें इस जातिगत भेदभाव को दूर करना है। कोई करे या न करे, भगवती मानव कल्याण संगठन इस दिशा में प्रयास करता रहेगा। समाज को केवल एक निगाह से देखने की जरूरत है, समाज में केवल गरीबी और अमीरी के आधार पर कार्य करने की जरूरत है, गरीबी और अमीरी के बीच की खाई को पाटने की जरूरत है। अपने निर्णय पर अडिग रहो, जातीयता, सम्प्रदायिकता से ऊपर उठो, तुम जगत् जननी के हो, मेरे अपने हो, मेरे परिवार के हो। पूरी तरह सजग रहने की जरूरत है, क्योंकि देश में देशद्रोहियों की संख्या बढ़ती जा रही है। धर्म के नाम पर एक बार देश का विभाजन हो चुका है, लेकिन अब हम देश के टुकड़े नहीं होने देंगे।”
चेतनाप्रद अमृततुल्य चिन्तन के उपरान्त शिविरस्थल पर उपस्थित सभी भक्तों ने परम पूज्य गुरुवरश्री के सान्निध्य में ‘महाशक्ति शंखनाद’ करके स्वयं को ऊर्जावान बनाया। आरतीक्रम के पश्चात् सभी ने क्रमबद्ध होकर एक-एक करके गुरुचरणपादुकाओं को स्पर्श करते हुए प्रसाद प्राप्त किया।
शिविर के तृतीय दिवस का द्वितीय सत्र
“आत्मा के पवित्र रूप को प्रगट करने के लिए शुद्ध-सात्त्विक जीवन की आवश्यकता है। यह शुद्धता आचार से प्रारम्भ होती है। कदाचरण कभी भी सहायक नहीं हो सकता। यदि उथलापन न हो और लक्ष्य स्पष्ट हो, तो जीवन की गतिविधि सभी बाधाओं को पार कर सकती है, क्योंकि कर्मसाधना में लीन शुद्ध-सात्त्विक जीवन प्रकृति को भी परिवर्तित करने की क्षमता रखता है।”
तृतीय दिवस की अपरान्ह बेला, पदप्रक्षालन के क्रम के उपरान्त भगवती मानव कल्याण संगठन के कुछ सदस्यों ने भावगीत प्रस्तुत किए, जिसके प्रारम्भिक अंश इस प्रकार हैं–
मैं अज्ञानी हूँ गुरुवर, ये मैं मानती हूँ, पर तुम हो करुणा के सागर, ये मैं जानती हूँ।-प्रियंका शर्मा जी, उत्तराखंड। जो सोचा भी नहीं जा सकता था, वह करके दिखाया है, मेरे गुरुवर ने धरा पर सिद्धाश्रम धाम बनाया है।-सिद्धाश्रमरत्न सौरभ द्विवेदी जी। एक ही तू जग बेगाना, पर गुरुवर मेरी लाज रखना।-वीरेन्द्र दीक्षित जी, दतिया। भाग्य सिद्धाश्रम सबको बुलाया, जग से न्यारी गुरुवर की माया।-बाबूलाल विश्वकर्मा जी, दमोह।
सुसज्जित मंच में विराजमान सद्गुरुदेव परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज की मोहक गम्भीरता, त्याग-तपस्या और भक्ति के आलोक से आलोकित उनके आभामंडल को अपलक देखते हुये भक्तगण मुग्ध हो रहे थे , तभी गुरुवरश्री की अमृतमयी वाणी मुखर हो उठी। प्रकृति के अनेक अनसुलझे रहस्यों को उजागर करते हुये गूरुवर श्री कहते हैं–

“इस दिव्यधाम की यात्रा निश्चित ही संघर्ष, विषमताओं से भरी हुई है, लेकिन उससे भी अधिक इसमें आनन्द और तृप्ति समाहित है। आप लोग सोचते होंगे कि इतना बड़ा कार्य कैसे होगा? यहाँ पर सबकुछ पहले से सुनिश्चित है, क्योंकि हमारे साथ में माता भगवती आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा हैं और जो कुछ भी हो रहा है, उन्हीं की कृपा से हो रहा है। माता भगवती ने मुझे जो कार्य अपना आशीर्वाद देकर सौंपा था, तो यह सुनिश्चित था कि वे जो कार्य चाहती हैं, वह होकर रहेगा, समय भले ही लग जाए। मैंने ‘माँ’ के चरणों पर संकल्प लिया था कि मेरे जीवन का हर कार्य परोपकार के लिए, सनातनधर्म के लिए होगा। तबसे यह यात्रा उसी विचारधारा को लेकर चल रही है। यह एक लम्बी यात्रा अवश्य है, क्योंकि सत्यता को लेकर यहाँ की एक-एक नीव डाली गई है।
आवश्यकता है तो केवल साधकप्रवृत्ति की और मैंने कभी भी, जो समय मुझे परमसत्ता ने दिया है, उस समय का एक पल भी नष्ट नहीं किया। मैं आप लोगों को भी पुरुषार्थी बनाना चाहता हूँ, क्योंकि यह कर्मप्रधान सृष्टि है और कर्म का ही फल प्राप्त होना है, तो क्यों न हम ऐसे रास्ते का चयन करें कि सुख-शान्ति प्राप्त हो और जीवन आनन्दमय रहे। इसके लिए एकमात्र रास्ता है कर्मवान बनना, सत्कर्म करना, लेकिन मनुष्य चाहता है कि उसे फल तो मिले, लेकिन कर्म न करना पड़े। आज अधिकांश समाज अकर्मण्य और विवेकहीन हो चुका है। परमसत्ता ने मनुष्य को अलौकिक शक्तियाँ दे रखी हैं, फिर भी वह निरीहता का जीवन जी रहा है, क्योंकि उसने कर्म से मुख मोड़ लिया है।
हमारे ऋषि-मुनियों ने, साधक-साधिकाओं ने असम्भव को भी सम्भव करके दिखाया है, लेकिन आप लोग सत्कर्म करना ही नहीं चाहते। ध्यान रखें, मेरे सान्निध्य में मिलने वाले क्षण देवताओं को भी दुर्लभ हैं, मैं सच्चिदानंद का स्वरूप हूँ, इस सृष्टि में उसी कड़ी का रूप हूँ, जिसके एक पल का सान्निध्य प्राप्त करने के लिए बड़े-बड़े ऋषि-मुनि और देवी-देवता भी तरसते हैं। समाज के बीच मैं एक लक्ष्य को लेकर आया हूँ, मैं सम्मान भोगने के लिए नहीं आया, मेरा सम्मान तो जगत् जननी के चरणों पर है। मैं आपके लिए जीता हूँ और मुझे लगता है कि मैं अपने शरीर को और तपाऊं, जिससे मानवता का अधिक से अधिक कल्याण हो सके। जब तक यह धरती रहेगी, इस पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम से समाज ऊर्जा प्राप्त करता रहेगा।
आज जिस पतन के मार्ग पर मानवता खड़ी है, वहाँ से निकलने के लिए प्रचण्ड पुरुषार्थ की, प्रचण्ड साधना की आवश्यकता है। मेरे सान्निध्य में गुजारने के लिए एक जीवन मिला है, सुख-वैभव भोगने के लिए तो अनेक जीवन मिल जायेंगे। मेरे द्वारा बताए गए छोटे-छोटे साधनाक्रमों को अपनाकर बहुत आगे बढ़ सकते हो। मैं आप लोगों को सामर्थ्यवान बनाने आया हूँ, पात्र बनाने आया हूँ। कर्मवान बनो और पवित्रता, सात्विकता का जीवन जियो। तुम्हारी बातचीत में, तुम्हारे रहन-सहन में, तुम्हारे कार्यों में साधकप्रवृत्ति नजर आनी चाहिए।
आज विजयदशमी है और अनेक लोग रावण के पुतले बनाकर जला रहे होंगे। बड़े-बड़े नेता, अभिनेता, मंत्री, मुख्यमंत्री रावण के पुतले को जला रहे होंगे, लेकिन अपने अन्दर के रावण को नहीं जलायेंगे, अपने अन्दर के रावण को नहीं मारेंगे। अरे, रावण का पुतला जलाने से पहले अपने अन्दर के रावण को मारो। आज भी समाज उन्हीं परम्पराओं में उलझा हुआ है कि रावण का पुतला जल जायेगा, तो रामराज्य आ जायेगा। अरे, रावण का पुतला जलने से रामराज्य नहीं आयेगा। रामराज्य आयेगा, जब साधक बनोगे, पुरुषार्थी बनोगे। आज विवेकहीन समाज, अच्छा क्या है और बुरा क्या है, यह सोच ही नहीं पाता? इसीलिए मैं आप लोगों को साधक बनाना चाहता हूँ, जिससे ज्ञानवान बन सको, विवेकवान बन सको और विवेकवान बनकर आपको समाज के अविवेक को दूर करना है। अपने बेटे-बेटियों को भी साधना के पथ पर बढ़ाओ, जिससे वे पतन के मार्ग पर न जा सकें। दुनिया कैसे जीती है, जीने दो, तुम्हें कैसे जीना है, उस पर विचार करो।

भौतिकतावाद की अन्धी दौड़ में मत दौड़ो, साधना का पथ ही कल्याणकारी पथ है। योग-ध्यान-साधना में मन को एकाग्र करो। जब मन एकाग्र होगा, तभी तो ज्ञानवान बनोगे, विवेकवान बनोगे और तभी सोचने-समझने की शक्ति प्रबल होगी। निरोगी काया के लिए, चेतनात्मकशक्ति को प्राप्त करने के लिए नित्यप्रति कम से कम पन्द्रह मिनट ध्यान-साधना में दो। छोटे-छोटे क्रम जो आप लोगों को बताए गए हैं, बीजमंत्र ‘माँ’-ॐ का क्रमिक उच्चारण करो, सहज प्राणायाम करो, आज्ञाचक्र पर ध्यान लगाओ। बहुत कम लोग हैं, जो मेरे बताए हुए रास्ते पर चल रहे हैं। आप सभी यहाँ से संकल्प लेकर जाओगे कि नित्यप्रति कम से कम पन्द्रह मिनट ध्यान-साधना अवश्य करेंगे। धीरे-धीरे इस क्रम को बढ़ाओ और हो सके तो योग के लिए एक घण्टे का समय निकालो। तीन महीने योग-ध्यान-साधना करके देखो, आपके अन्दर दिव्यचेतना का संचार होने लगेगा और तृप्ति का अहसास होगा। शक्तियोग पुस्तक में सरल से सरल योग के क्रम बतलाए गए हैं, जिसके माध्यम से आप योग-ध्यान-साधना में महारथ हासिल कर सकते हो।
आज इस बात की भी आवश्यकता है कि सभी प्रदेशों में, सभी जि़लों में, तहसील क्षेत्रों में गौ-अभ्यारण्य बनें। आप लोग अपने-अपने क्षेत्रों के लिए अपने प्रदेश की सरकार से गौ-अभ्यारण्य बनाने की मांग करो। हमारे देश के प्रधानमंत्री विदेशों से चीते मंगाते हैं, चीता अभ्यारण्य बनाने में लगे हुए हैं, चीतों की सुरक्षा में लगे हुए हैं और सनातनधर्म की बात करते हैं, सनातनी हैं, लेकिन गायों को सुरक्षा नहीं दे पा रहे हैं। जिस तरह शेर-चीतों के लिए अभ्यारण्य बनाए गए हैं, उसी तरह गायों की सुरक्षा के लिए गौ-अभ्यारण्य बनाकर, उनके लिए चारे-पानी की समुचित व्यवस्था की जानी चाहिए। गौ-अभ्यारण्य के लिए आवाज उठाओ और जो सरकार ऐसा न करे, उसे अपना वोट मत दो। पाँच साल में वोट डालने का अवसर आता है। जब वोट डालने जाओ, तो पहले यह विचार करो कि जिसे वोट देने जा रहे हो, कहीं वह भ्रष्ट और बेईमान तो नहीं है, अन्यायी और अधर्मी तो नहीं है।”
चेतनाप्रद चिन्तन के उपरान्त शिविरस्थल पर उपस्थित एक लाख से अधिक शक्तिसाधकों ने ‘महाशक्ति शंखनाद’ किया और फिर साधनाक्रम पूर्ण करते हुए दिव्यआरती का लाभ प्राप्त किया। तत्पश्चात् गुरुचरणपादुकाओं को स्पर्श करते हुए प्रसाद ग्रहण करके प्रस्थित हुए।
शिविर के प्रथम दो दिवस योग-ध्यान-साधना का क्रम
‘महाशक्ति शंखनाद’ शिविर के प्रथम दिवस के प्रथम सत्र में योग-ध्यान-साधना सीखने की ललक लिए प्रवचन पंडाल में उपस्थित भक्तों, गुरुभाईयों-बहनों को सम्बोधित करते हुए शक्तिस्वरूपा बहन संध्या दीदी जी ने योग के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि श्श्नित्यप्रति योग करने से शरीर व मनमस्तिष्क स्वस्थ रहता है, जिससे जीवन आनन्दमय बनता है। योगपथ पर चलने के लिए योग के प्रति पूर्ण निष्ठा, विश्वास और समर्पण की आवश्यकता होती है। योग के माध्यम से हमारी कोशिकाएं चैतन्य होती हैं और बुद्धि की निर्मलता व मन की एकाग्रता के लिए ध्यान-साधना भी आवश्यक है।”
शक्तिस्वरूपा बहन ने योग के विभिन्न आसनों व ध्यान-साधना के बारे में बतलाया, जिसे सुनकर व प्रशिक्षित शिष्यों की क्रियाओं को देखकर उपस्थित सभी लोगों नें योग-ध्यान-साधना के क्रमों को सीखा।
इस प्रकार त्रिदिवसीय शिविर के प्रथम दो दिवस, प्रथम सत्र की प्रातरूकालीन बेला में प्रात: 07:30 बजे से 09:00 बजे तक योग-ध्यान-साधना के क्रमों को सम्पन्न किया गया। इस अवसर पर शक्तिस्वरूपा बहन पूजा दीदी जी भी उपस्थित रहीं।
शक्तिस्वरूपा बहनों ने की दिव्य आरती
शक्तिस्वरूपा बहनों पूजा, संध्या व ज्योति दीदी जी तथा सिद्धाश्रम चेतना आरुणि जी, अद्वैत जी व आत्रेय जी के द्वारा उपस्थित समस्त भक्तों की ओर से प्रथम दिवस परम पूज्य गुरुवरश्री एवं माता भगवती की दिव्य आरती सम्पन्न की गयी। उस समय का वातावरण अत्यंत ही भक्तिमय, गुरुवरश्री की ध्यानावस्थित मुद्रा और प्रवाहित चेतनातरंगों के अनुभूति की अलौकिकता उपस्थित लाखों भक्तों के रोम-रोम को पुलकित कर रही थी। इसी तरह द्वितीय व तृतीय दिवस भी दिव्य महाआरती का लाभ उपस्थित अपार जनसमुदाय ने प्राप्त किया।
11 हजार से अधिक नए भक्तों ने ली गुरुदीक्षा
शिविर के तृतीय दिवस मंचस्थल पर प्रात: 08 बजे से गुरुदीक्षा कार्यक्रम प्रारम्भ हुआ। इस अवसर पर 11 हजार से अधिक नये भक्तों ने ऋषिवर श्री शक्तिपुत्र जी महाराज से गुरुदीक्षा प्राप्त करके अपने जीवन में परिवर्तन का सूत्रपात किया। दीक्षा प्रदान करने से पूर्व गुरुवरश्री ने कहा कि “गुरू और शिष्य का रिश्ता एक ऐसा अटूट रिश्ता है, जो इस भूतल के समस्त रिश्तों से सर्वोपरि है। समाज का रिश्ता केवल भौतिक जगत् से जुड़ा रहता है, जबकि गुरु का रिश्ता दृश्य और अदृश्य दोनों ही जगत् में कायम रहता है। चेतनावान् गुरु शिष्यों से, दीक्षा देते समय अपना पूजन नहीं कराता, क्योंकि वह शिष्यों को अपने हृदय में धारण कर रहा होता है।
परम पूज्य सद्गुरुदेव जी महाराज ने शिष्यों को दीक्षा प्रदान करते हुये कहा कि श्श्मैं शक्तिपात के माध्यम से सभी को अपनी चेतना से आबद्ध कर रहा हूँ।” पश्चात् उन्होंने ‘माँ’ की सहायक शक्तियों गणेश जी, भैरव जी एवं हनुमान जी के मंत्र के साथ चेतनामंत्र ॐ जगदम्बिके दुर्गायै नमः एवं गुरुमन्त्र ॐ शक्तिपुत्राय गुरुभ्यो नमः प्रदान किया। अंत में सभी नये दीक्षाप्राप्त शिष्यों ने परम पूज्य गुरुवरश्री को नमन करते हुये नि:शुल्क शक्तिजल प्राप्त किया।

लाखों भक्तों ने अन्नपूर्णा भंडारे में किया भोजन
शारदीय नवरात्र पर्व पर आयोजित शक्ति चेतना जनजागरण शिविर में पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम पहुंचने वाले लाखों भक्तों के लिये सुबह-शाम नि:शुल्क भोजन प्रसाद की विशेष व्यवस्था अन्नपूर्णा भोजनालय में रही। गुरुवरश्री के आशीर्वाद से विशाल परिसर में भण्डारे की व्यवस्था की गई थी। सभी ‘माँ’ भक्तों ने सुबह-शाम दोनों समय भोजनालय परिसर में पंक्तिबद्ध रूप से बैठकर तृप्तिपूर्ण भोजन प्रसाद ग्रहण किया। इस वृहद व अतिमहत्त्वपूर्ण व्यवस्था की जि़म्मेदारी का निर्वहन भगवती मानव कल्याण संगठन के हजारों परिश्रमी समर्पित कार्यकर्ताओं के द्वारा दिन-रात अथक परिश्रम से पूर्ण किया गया।
शिविर व्यवस्था में लगे रहे हजारों कार्यकर्ता
शक्ति चेतना जनजागरण शिविर ‘महाशक्ति शंखनाद’ के वृहद कार्यक्रम को सफलतापूर्वक सम्पन्न कराने में भगवती मानव कल्याण संगठन के पाँच हजार से भी अधिक सक्रिय समर्पित कार्यकर्ताओं ने महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। कार्यकर्ताओं ने नवरात्र पर्व के एक सप्ताह पूर्व से पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम पहुंचकर लाखों श्रद्धालुओं के ठहरने हेतु दिन-रात अथक परिश्रम करके आवासीय व्यवस्था प्रदान की व शिविर में शांति व्यवस्था के लिये सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने अग्रणी भूमिका निभाई। भोजन व्यवस्था, पंडाल व्यवस्था, सफाई-स्वच्छता व्यवस्था, निरूशुल्क प्राथमिक उपचार, निरूशुल्क शक्तिजल वितरण व्यवस्था, खोया-पाया विभाग, वस्त्र सहायता केन्द्र, वस्त्र समर्पण केन्द्र, जनसम्पर्क कार्यालय, स्टॉल व्यवस्था, पेयजल व्यवस्था, प्रसाद वितरण व्यवस्था और मूलध्वज साधना मंदिर, श्री दुर्गाचालीसा पाठ मंदिर तथा शिविर पण्डाल में प्रातरूकालीन व सायंकालीन साधनाक्रम व आरती सम्पन्न कराने हेतु हजारों कार्यकर्ता अनुशासित ढंग से लगे रहे। इस तरह परमसत्ता व गुरुवरश्री की कृपा से आसुरीतत्त्वों के विनाश और विश्वशांति व मानवीय मूल्यों की स्थापना के लिये आयोजित यह कार्यक्रम धार्मिक वातावरण में शालीनतापूर्वक सम्पन्न हुआ। व्यवस्था कार्य में नेपाल से आये कार्यकर्ताओं का भी सराहनीय योगदान रहा।
नवनिर्मित श्री दुर्गाचालीसा अखण्ड पाठ मंदिर की दिव्यता से आलोकित हुआ पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम

पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम पर माता भगवती आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा की कृपा से ऋषिवर सद्गुरुदेव परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज भक्ति, ज्ञान और कर्म की धारा निरन्तर प्रवाहित कर रहे हैं। फलस्वरूप सिद्धाश्रम में 15 अप्रैल 1997 से अनन्तकाल के लिए एक साधारण छप्पर, फिर अस्थाई भवन में प्रारम्भ कराया गया श्री दुर्गाचालीसा पाठ, आज भव्यतम विशाल मंदिर में परिवर्तित हो चुका है। शारदीय नवरात्र 2023 की पंचमी तिथि, 19 अक्टूबर दिन गुरुवार को सद्गुरुदेव जी महाराज ने दिव्य आलोक से आलोकित नवनिर्मित श्री दुर्गाचालीसा अखण्ड पाठ मंदिर में माता भगवती आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा सहित ग्यारह दिव्यशक्तियों की स्थापना करने के बाद हजारों शिष्यों-भक्तों की उपस्थिति में पूजा-अर्चना की।
ज्ञातव्य है कि अध्यात्मिक पुण्यभूमि भारत के सनातनधर्म को विकासोन्मुख करने, लोगों में अन्तर्चेतना के विकास और उन्हें ज्ञान के क्षेत्र में ले जाने के लिए धर्मसम्राट् युग चेतना पुरुष सद्गुरुदेव परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज ने माता आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा की प्रेरणा से पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम की स्थापना करके श्री दुर्गाचालीसा का अखण्ड पाठ प्रारम्भ कराया है। अज्ञानान्धकार से ग्रसित इन्द्रियां, जो मन को भटकाकर पतन की ओर ढकेल रही हैं, उन पर नियंत्रण पाने के लिए एकमात्र उपाय है श्री दुर्गाचालीसा पाठ। अत: 27 वर्षों से अनन्तकाल के लिए प्रारम्भ श्री दुर्गाचालीसा अखण्ड पाठ को विश्वव्यापी बनाने के लिए सिद्धाश्रम धाम में विशाल व भव्यरूप में ऐसे चालीसा पाठ मंदिर का निर्माण कराया गया है, जिससे कि युग-युगों तक मनुष्य, ‘माँ’ के गुणगान के माध्यम से अपने मन के दूषित विचारों की दिशा को सात्विक विचारों की ओर मोड़़कर अपने जीवन को आनन्दमय बना सके।




