शक्ति चेतना जनजागरण ‘संकल्प साधना’  शिविर, सिद्धाश्रम, 10,11,12 अक्टूबर 2024

कर्ता, क्रिया और कर्म, जब एक साथ होते हैं, तभी अभीष्ट कार्य सम्पन्न होते हैं। शारदीय नवरात्र पर्व में पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम पर आयोजित शक्ति चेतना जनजागरण ‘संकल्प साधना’  शिविर में देश-विदेश से पहुंचे ऋषिवर सद्गुरुदेव परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज के शिष्यों व माता जगदम्बे के भक्तों का प्रवाह उमड़ पड़ा था। सभी ने जहाँ अन्तर्शक्ति को जाग्रत् करने वाले ज्ञानामृत का पान किया, वहीं प्रवाहित विशेष चेतनातरंगों से अविभूत रहे।

दिनांक 10,11,12 अक्टूबर 2024 (अष्टमी, नवमी, विजयादशमी) को तीनों दिवस, सर्वप्रथम ब्रह्ममुहूर्त पर भक्तजन मूलध्वज साधना मंदिर में आरतीक्रम पूर्ण करने के पश्चात् श्री दुर्गाचालीसा अखण्ड पाठ मंदिर परिसर में पहुंचकर 28 वर्षों से चल रहे श्री दुर्गाचालीसा अखण्ड पाठ में सम्मिलित हुए, जहाँ सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज नित्यप्रति की तरह प्रात: 6.00 बजे स्वयं उपस्थित होकर आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा व सहायक शक्तियों की पूजा-अर्चना-आरती तथा ध्यान-साधना के पश्चात मूलध्वज साधना मन्दिर पहुंचे और मानवता के कल्याण की कामना माता भगवती आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बे से की। 

प्रथम दिवस ऋषिवर का दिव्य चिन्तन

अज्ञानतारूपी तम के नाशकर्ता ऋषिवर सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज उपस्थित अपने चेतनाअंशों, शिष्यों, भक्तों व शिविर व्यवस्था में लगे हुए कार्यकर्ताओं और धर्मप्रेमी विश्वजनमानस को अपना आशीर्वाद प्रदान करते हुए कहते हैं–

शक्तिस्वरूपा बहनों के द्वारा संकल्प साधना शिविर में सदगुरुदेव जी महराज के चरण पूजन का क्रम

“नवरात्र जैसा पर्व हो और इस दिव्यस्थल पर, जहाँ ‘माँ’ का गुणगान अनवरत अनन्तकाल के लिए चल रहा है और जहाँ के कण-कण को चैतन्य करने के लिए 28 वर्षों से मेरे द्वारा साधना-तपस्या की जा रही है, लाखों शक्तिसाधकों का समागम हो, जो एक विचारधारा, सत्य की विचारधारा को लेकर उपस्थित हैं, यह समागम, यह उपस्थिति सनातनधर्म की अखण्डता को प्रदर्शित करती है। यह पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम धर्म की धुरी है। जिस जगह पर मेरी जगत् जननी बैठ जाएं, वह स्थान निखिल ब्रह्माण्ड का ऐसा स्थल बन जाता है, जिसकी तुलना अन्य किसी चीज से नहीं की जा सकती है। आप सभी उस जगत् जननी के आँचल की पवित्र छाँव में बैठे हो, जहाँ ‘माँ’ की कृपा हरपल बरस रही है। यह धरती केवल धार्मिकस्थल नहीं है। यहाँ यदि केवल आश्रम का निर्माण कराना होता, तो इसकी आवश्यकता ही नहीं थी। इस सिद्धाश्रम धाम का निर्माण मानवता के कल्याण के लिए किया गया है।

चारों ओर जब अनीति-अन्याय-अधर्म बढ़ जाता है, तो चाहे देवता हों या मनुष्य, सभी जगत् जननी को पुकारते हैं। वर्तमान समय में भी समाज के बीच अनीति-अन्याय-अधर्म का अंधेरा छाया हुआ है, तो इस भयावह वातावरण को समाप्त करने के लिए ‘माँ’ ने इस अभियान का सूत्रपात किया है, जिससे तड़पती, कराहती मानवता का उद्धार होसके। इस अभियान को हमें धीरे-धीरे करके गति देना है, भले ही हमें संघर्ष का सामना क्यों न करना पड़े, जन्दबाजी में कोई कदम नहीं उठाना है। इस पावन-पुनीत लक्ष्य को पूरा करना हम सभी की जि़म्मेदारी है। तुम स्वयं जानो कि तुम कौन हो, तुम्हारा कर्म क्या है और तुम्हारा लक्ष्य क्या है? यहाँ की ऊर्जा का ही परिणाम है कि लाखों-लाख शक्तिसाधक समाज में परिवर्तन डाल रहे हैं। वे गरीब हो सकते हैं, लेकिन उनकी आत्मा गरीब नहीं है और आत्मबल से ही समाज में परिवर्तन आ सकता है। अपने आत्मबल को दृढ़ रखो, उसमें अनमोल खजाना भरा हुआ है और उस आत्मबल के माध्यम से हम बड़ा से बड़ा परिवर्तन कर सकते हैं।

समाज में सहजभाव से परिवर्तन नहीं आता, संघर्ष करना ही पड़ता है। अनीति-अन्याय-अधर्म को समाप्त करने के लिए हमें अनेक में परिवर्तित होना है । कोई भी बीज तभी अंकुरित होता है, जब वह अपने आपको गला देता है, तब जाकर वह अनेक में परिवर्तित होता है। उसी तरह बीज और हमारे शरीर में कोई फर्क नहीं है। हमें भी अपने शरीर को गलाकर एक से अनेक में बदलना है। इस शरीर को कैसे गलाना है? अपने आपको नशे-मांसाहार से मुक्त करके, चरित्रवान् व चेतनावान् बना करके, पुरुषार्थ और परोपकार के मार्ग पर चल करके।

परमसत्ता ने तुम्हें इतनी शक्ति दे रखी है, फिर भी तुम भिखारियों का जीवन जीते हो! अपने अंदर कुसंस्कार भरते जा रहे हो। कुसंस्कारी बनकर कोई भी उच्चता को नहीं प्राप्त कर सकता। सत्य को सत्य के रूप में स्वीकार करो। एक बार सजग होजाओ कि जो बीत गया, सो बीत गया और अब मुझे पतन के मार्ग पर नहीं जाना है, मुझे वैराग्य के पथ पर जाना है तथा शक्ति-सामर्थ्य प्राप्त करना है। हमारे ऋषि-मुनि इतनी बड़ी सामर्थ्य रखते थे कि असम्भव से असम्भव कार्य कर सकते थे। उस काल की नारियों में, पुरुषों में वह ओज था, वह शक्ति थी कि उनके सामने कोई भी अन्यायी-अधर्मी टिक नहीं सकता था। उनमें त्याग की पराकाष्ठा थी और उन्होंने असम्भव कार्यों को सम्भव करके दिखाया है।

हमारी शक्ति हमारा सनातन है, हमारी शक्ति हमारी जगत् जननी हैं और वह शक्ति हमारे अन्दर बैठी हुई है। देवी-देवताओं के मंदिरों में जाकर मत्था रगड़ने से कल्याण नहीं होने वाला। आखिर, कब तक भिखारियों का जीवन जीते रहोगे? कब उस धरातल को प्राप्त करोगे कि जब तुम्हें यह प्रतीत हो कि तुम ‘माँ’ के पास जा रहे हो? कब यह विचार पनपेगा? ‘माँ’ से भिखारियों की तरह माँगने की क्या आवश्यकता है? वह सब जानती हैं, लेकिन ‘माँ’ से कुछ पाने के लिए तुम्हें पात्र बनना पड़ेगा। प्रकृतिसत्ता ने, ‘माँ’ ने एक विधान बना रखा है कि पानी ऊपर की ओर नहीं ढलान की ओर जायेगा, अत:  झुकना सीखो, अन्दर से विनम्र बनो, कर्मवान बनो। ध्यान रखो, ‘माँ’ ही हमारी इष्ट हैं, हमारी आत्मा की जननी हैं और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड उनका अंश है। एक तरफ ममता का अथाह सागर हो और हम प्यासे रह जाएं! तुम्हारे अन्दर भक्ति होनी चाहिए, सुधरने की तड़प होनी चाहिए, कि अब मैं अपना पतन नहीं होने दूँगा। अच्छी सोच से, अच्छे विचारों से पूरा जीवन बदलता चला जाता है। विकारों को दूर करने के लिए नित्यप्रति प्रयास करो। वे तो जगत् जननी हैं, हजारों तहखाने के अन्दर तुम जो कार्य करते हो, तुम जो सोचते हो, वे सब कुछ जानती हैं, उनसे कुछ नहीं छिपा रहता। यही विचार तुम्हारे जीवन में परिवर्तन लायेंगे।

अपने अन्दर एक तड़प पैदा करो कि मुझे दीन-हीनों का जीवन नहीं जीना है, अपितु पुरुषार्थी बनना है, कर्मवान बनना है। यदि कर्महीन जीवन जीते रहे, तो तुम्हारे साथ ही समाज का भी पतन होता चला जायेगा। माँ ने तुम्हें क्या नहीं दिया है? क्या कुछ कम मिला है? उनसे जाकर पूछो, जिनके पास नेत्र नहीं है कि वह देख नहीं पा रहे हैं। उनसे पूछो, जो सुन नहीं पा रहे हैं, उनसे जाकर पूछो, जो पैर न होने के कारण चल नहीं पा रहे हैं। तुम्हारे पास तो सबकुछ है। अरे, तुम्हारे अन्दर निखिल ब्रह्माण्ड की ताकत भरी हुई है, उसे केवल जाग्रत् करने की जरूरत है। यदि मेरे विचारों को पूर्णता से धारण कर लोगे, तो तुम्हारे जीवन में इतना सकारात्मक परिवर्तन आ जायेगा कि उसकी तुम कल्पना भी नहीं कर सकते।

माता भगवती आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा, श्री दुर्गा जी के अनेक रूप हैं, लेकिन इस भूतल पर माता महिषमर्दिनी के स्वरूप में अथाह शक्ति भरी हुई है। इस भ्रम में न रहना कि माता भगवती को देवताओं ने प्रकट करके शक्ति प्रदान की है। अरे, जो विश्वब्रह्माण्ड की जननी हैं, देवताओं की क्या औकात कि ‘माँ’ को शक्ति-सामर्थ्य प्रदान कर सकें। वे जब जहाँ चाहें, प्रकट हो सकती हैं और जब जिससे चाहें, अपनी शक्ति को खींच सकती हैं। आज हमारा सनातन अज्ञानता का जीवन जी रहा है। कुछ धर्माधिकारी राधा को, तो अनेक राम और कृष्ण को सर्वशक्तिमान कहते हैं। अरे अज्ञानियों, वे भी माता भगवती के चरणों के अंश हैं। ‘माँ’ तो अजन्मा हैं, वे कभी भी कहीं भी प्रकट हो सकती हैं और वे ही सर्वशक्तिमान हैं। अनेक लोग अपने पंथ चला रहे हैं। कबीरपंथी कबीर को निखिल ब्रह्माण्ड का स्वामी कहते हैं, जबकि कबीर एक अच्छे भक्त, एक अच्छे साधक थे।

 मैं सभी धर्मप्रमुखों से कहता हूँ कि अज्ञानता की अंधीदौड़ में मत दौड़ो, अन्यथा समाज और अज्ञानता के वशीभूत होता चला जायेगा। अधिकांश कथावाचकों के द्वारा श्रोताओं को नाच-रास-रंग में लिप्त करके समाज को बरबाद करने का कार्य किया जा रहा है। इससे युवावर्ग भटक रहा है और उनमें नास्तिकता हावी होती जा रही है। कथा सुनने से कुछ नहीं होने वाला, तपस्वी बनना पड़ेगा। यह कर्मप्रधान सृष्टि है, अपने विचारों को सात्विकता में बांधो दाण्डिया नृत्य से काम नहीं चलेगा। आज हमारे सनातन की धार्मिक क्रियाओं को हाईजैक कर लिया गया है, तो आने वाली पीढ़ी सनातन की ओर से विमुख होकर कोई ईसाई बनेगा, तो कोई इस्लामधर्म को अपनाएगा! सजग होने की जरूरत है। चारों ओर चाहे कथावाचक हों या कोई धार्मिक समारोह, अश्लीलता परोसी जा रही है। अरे, आत्मावानों का जीवन जीना सीखो।

लोग कहते हैं कि गुरुदेव जी को पार्टी की क्या आवश्यकता थी? मुझे आवश्यकता नहीं थी, अपितु मानवता को आवश्यकता थी, देश को आवश्यकता थी। अपने आपको संगठित करना सीखो। मैं इस राष्ट्र की रक्षा के लिए चेतनावानों का समूह खड़ा कर रहा हूँ। आप लोग कभी यह मत सोचना कि चार-पाँच सालों में जिता दूँगा। पहले कर्मवान बनो, कर्म करना सीखो। मैं आने वाले समय को जानता हूँ। आपका गुरु त्रिकालदर्शी है और इस बात का प्रमाण समाज में दिया जा चुका है।

अनीति-अन्याय-अधर्म के विरुद्ध संगठित होकर आवाज उठाओ, अपने अस्तित्व को मिटने मत दो, सत्य की ताकत को समझो। केजरीवाल की तरह अनीति-अन्याय-अधर्म को माध्यम बनाकर हमें सत्ता हासिल नहीं करनी है। इसके लिए तुम लोगों को बहुत गलना पड़ेगा, संघर्ष करना पड़ेगा, समाज के बीच अपना स्थान बनाना होगा और जब समाज तुम्हें स्वीकार कर लेगा, तभी आगे बढ़ पाओगे। मेरी तीनों धाराओं से वही जुड़े, जो अपने आपको गलाना जानता हो। राजनीतिक पार्टी में मेरी लिप्तता अंशमात्र भी नहीं है, लेकिन राष्ट्ररक्षा के लिए शिष्यों को आगे बढ़ाना मेरा कर्त्तव्य है।

इस शिविर में जो भी नशा छोड़ने के लिए आए हैं, वे केवल मुझे अपना यह अवगुण दे दें। मैं समझ लूँगा कि मुझे सबकुछ मिल गया। अपने मन में पूरी तरह से नशा छोड़ने का संकल्प ले लेना। आपका गुरु आपके लिए जीता है और आपके लिए ही मरूंगा। इस भूतल पर मैं आज भी हूँ और कल भी रहूँगा। तुम मुझे मानो या न मानो, मैं तुम्हें मानता हूँ।“

द्वितीय दिवस ऋषिवर का दिव्य चिन्तन

 “शक्ति चेतना जनजागरण संकल्प साधना शिविर के ये महत्त्वपूर्ण पल। इस पावन पवित्रस्थल पर जो क्षण आप गुजार रहे हैं, जीवन के लिए अनमोल हैं। इस पवित्रस्थल की यात्रा, जिन लोगों ने प्रारम्भ की है, उन्होंने देखा है, जाना है और इस सत्य की यात्रा का अहसास है। वे यह महसूस करते हैं कि यह एक ऐसी यात्रा है कि नियमों में अपने आपको आबद्ध करके सतत उस ओर बढ़ा जा सकता है और सतत बढ़ रहे हैं। भगवती मानव कल्याण संगठन एक ऐसा संगठन है, जिसके सदस्य, कार्यकर्ता, शक्तिसाधक पहले स्वयं को बदलते हैं, फिर दूसरों को बदलने का कार्य करते हैं। जब हम सत्य का अहसास करते हैं, तो हमारे कदम बरबस ही परोपकार की ओर बढ़ जाते हैं। बहुत कम लोग हैं, जो समाजसुधार के कार्य की ओर अपने कदम बढ़ा पाते हैं। जब हम निर्णय कर लेते हैं, तो वह कर गुजरते हैं, जिसे असम्भव कहा जाता है।

देवता भी मानवजीवन पाने के लिए तरसते हैं। यह मानवजीवन सामान्य जीवन नहीं है। मानवजीवन को पाकर देवत्व से बड़े ऋषित्व के पद को प्राप्त किया जा सकता है। आत्मज्ञान प्राप्त कर लेना मनुष्य का मूल लक्ष्य होना चाहिए। आज का समाज इतना दीन-हीन, असमर्थ क्यों हो गया है? इसलिए कि हमने इस शरीर के सुख को ही सबकुछ मान लिया है और भौतिक सम्पत्ति की ही फेर में लगे रहते हैं तथा अपनी अध्यात्मिक विरासत को भूल चुके हैं। भौतिक सम्पत्ति को हमारे ऋषियों-मुनियों ने पैरों से ठोकर मारी है और हम क्या कर रहे हैं? हम अपनी विशाल संस्कृति को भूल बैठे! दधीच जैसे ऋषि के सामने देवताओं को भी नतमस्तक होना पड़ा है उनकी अस्थियों के लिए, क्योंकि उनकी अस्थियों से बने अस्त्र-शस्त्रों से ही असुरों का संहार किया जा सकता था। देवताओं को भी ऋषियों-मुनियों से शक्तियाँ प्राप्त होती हैं। श्रीराम को अस्त्र-शस्त्रों का ज्ञान ऋषियों ने ही दिया था, जिससे वे असुरों का संहार कर सके। ऋषि विश्वामित्र के पास नए स्वर्ग की रचना कर देने की क्षमता थी।

हमारा सनातन, हमारा हिन्दुत्व, यह हमें अपने ऋषि-मुनियों से ही प्राप्त हुआ है। सनातन न कभी हिंसक था और न है तथा असुरों का संहार करना हिंसा नहीं कहलाती। उस काल की अलग व्यवस्था थी और आज के कानून की अलग व्यवस्था है। सनातन से पुराना, सनातन से बढ़कर कोई धर्म नहीं और हमारा यह सनातन विश्वकल्याण के लिए समर्पित है। राजा जनक जैसे अनेक ऐसे ज्ञानी रहे, जो राजपाट चलाते हुए, कर्म करते हुए विदेह कहलाए, क्योंकि उनकी किसी चीज में लिप्तता नहीं थी। यदि हमने आत्मज्ञान को अपनी पूँजी माना है, अपनी आन्तरिक चेतना को अशुद्ध नहीं किया है, तो हम हर कार्य करते हुए त्यागी, वैरागी, योगी बन सकते हैं।

ब्रह्मा, विष्णु, महेश, माता सरस्वती, माता लक्ष्मी, माता काली, राम, कृष्ण, सीता, राधा, ये सभी माता भगवती आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा के अंशावतार हैं और सनातन के परिवार हैं। हमारे अन्दर भी माता जगदम्बे के अंशस्वरूप आत्मा बैठी हुई है और इतनी बड़ी सामर्थ्य को लिए हुए भी हम दीन-हीन बने हुए हैं! ‘माँ’ से हम छोटी-छोटी कामनाओं की पूर्ति की भीख मांगते हैं! अरे, उनसे कुछ मांगना ही है, तो भक्ति, ज्ञान और आत्मशक्ति मांगो। अगर ये प्राप्त होगए, तो इनमें सबकुछ समाहित है। जब प्रकृतितत्त्व सूर्य, चन्द्र, तारे, नियमपूर्वक अपने कार्य करते हैं, तो हम क्यों नहीं कर सकते। ‘माँ’ तो सबकुछ देना चाहती हैं, बस केवल हम अपने आपको निर्मल बना लें, नशे-मांसाहार से मुक्त चरित्रवान् जीवन जीने लगें।

‘माँ’ की आराधना से सहज-सरल और किसी देवी-देवता की आराधना नहीं है। हमें आत्मा को देने वाली, चेतना को देने वाली ‘माँ’ ही हैं। लेकिन, हमने अनीति-अन्याय-अधर्म के पथ पर चलकर उस चैतन्यस्वरूप आत्मा पर विकारों का आवरण डाल लिया है। मुक्ति का तात्पर्य यह नहीं कि हम स्वर्गलोक चले जाएं। जब तक हम अपने विकारों को नष्ट नहीं करेंगे, आत्मा के ऊपर पड़ चुके आवरण को अपने सद्कर्मों से नहीं हटायेंगे, तब तक मुक्ति नहीं मिल सकती। यदि हम सच्चे सनातनी नहीं बन सकते, तो ‘माँ’ के सच्चे भक्त तो बन ही सकते हैं। इसके लिए केवल हमारे अन्दर जड़ जमा चुके विकारों को दूर करने की आवश्यकता है।

आज के बच्चे, युवा, 9वीं-दसवीं की कक्षा में पढ़ने वाले छात्र विकारग्रस्त हो चुके हैं, अपने माता-पिता की बात नहीं मानते, उनका सम्मान नहीं करते। क्यों? इसलिए कि उन्हें संस्कार नहीं दिए जा रहे हैं। कहते हैं कि कलिकाल का साया है। अरे, कलिकाल नाम की कोई चीज नहीं है। हजारों साल से बन्द पड़ी कोठरी में यदि एक सुराख कर दिया जाए, तो प्रकाश की एक किरण के प्रवेश करते ही अंधकार का साम्राज्य समाप्त होजाता है। संस्कारवान बनो और अपने बच्चों को संस्कारवान बनाओ। अपनी नित्य की साधना में किसी प्रकार की कमी मत आने दो और अपने मानवीय कर्त्तव्य का पालन करते रहो, उच्चता की ओर बढ़ते चले जाओगे।

अपनी शक्ति को पहचानो। आप लोगों के अन्दर शान्ति की पराकाष्ठा है, लेकिन जब चहुंओर अधर्म हावी हो, तो हम अधर्मियों के अस्तित्व को मिटा सकें, जिस दिन सनातनियों की ऐसी क्षमता हो जायेगी, तभी हमारा भारत विश्वधर्मगुरु बन पायेगा। हम मानव हैं, तो मानवीयधर्म का पालन करना हमारा कर्त्तव्य है, अन्यथा अधर्म, अत्याचार हमें तोड़कर रख देगा।

भगवती मानव कल्याण संगठन अनीति-अन्याय-अधर्म को समाप्त करने की दिशा में कार्य कर रहा है और संगठन के द्वारा नशामुक्ति अभियान चलाया जा रहा है। देश के कोने-कोने में नशामुक्ति के केन्द्र बने हुए हैं, लेकिन उन केन्द्रों के द्वारा जितने लोगों को नशामुक्त नहीं कराया गया होगा, उससे कई गुना अधिक लोग संगठन के प्रयास से और मेरा आशीर्वाद लेकर नशामुक्त हो चुके हैं। इतना ही नहीं, संगठन के कार्यकर्ताओं ने पिछले कुछ सालों में दो हजार से अधिक स्थानों से नशे की खेपें पकड़वाई हैं और उनके द्वारा जनजागरण, दिव्यअनुष्ठानों-श्री दुर्गाचालीसा अखण्ड पाठ, आरतियों एवं महाआरतियों के माध्यम से समाज को चेतनावान् बनाया जा रहा है।

 सबसे बड़ी शक्ति प्राणशक्ति है। क्या उससे आपको मोह है? यदि मोह होता, तो समाज नित्यप्रति प्राणायाम कर रहा होता। ध्यान रखें, भौतिक जगत् की सम्पत्ति से अधिक मूल्यवान हमारी प्राणशक्ति है। नित्यप्रति सुबह-शाम या जब भी समय मिले प्राणायाम अवश्य करें, साथ ही मन की शक्ति को पकड़ने का प्रयास करें, मन में अलौकिक शक्ति भरी हुई है। मन से ही भटकाव होता है और यदि हम मन की शक्ति को समझ जाएं, उस शक्ति को परमसत्ता की भक्ति में, अच्छे कार्यों में लगा दें, तो किसी का मन विकारों की ओर नहीं बढ़ सकता। मन की इतनी बड़ी शक्ति होती है कि हम जो सोचते हैं, वही करने लग जाते हैं। यदि मन की शक्ति को नहीं पहचाना, तन की शक्ति को नहीं पहचाना, तो तुम्हारा जीवन विकारी और बीमार होता चला जायेगा। आपके मन और तन को अलौकिकशक्ति कैसे प्राप्त होगी? अध्यात्मिक और सात्विकआहार से।

संकल्प ही हमारा जीवन होना चाहिए। संकल्प के बिना कुछ नहीं किया जा सकता और संकल्प के बल पर लोगों ने बड़ा से बड़ा कार्य किया है। संकल्प दृढ़ होना चाहिए। यदि कभी किसी कार्य में असफलता मिलती है, तो निराश नहीं होना चाहिए, बल्कि अपने लक्ष्य की प्राप्ति हेतु लगे रहना चाहिए, एक-न-एक दिन सफलता अवश्य मिलगी। आप लोगों को 11 संकल्प दिलाए जा रहे हैं, जिनका आप लोगों को आजीवन पालन करना है। आइए, माता भगवती आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा का स्मरण करते हुए दोनों हाथ ऊपर उठाकर संकल्प करें–

‘ मैं संकल्प करता हूँ कि मैं नशे-मांसाहार से मुक्त चरित्रवान् तथा पुरुषार्थी एवं परोपकारी जीवन जियूंगा। ’ मैं संकल्प करता हूँ कि मैं धर्मरक्षा, राष्ट्ररक्षा और मानवता की सेवा में अपने जीवन को समर्पित करूंगा। ’ मैं संकल्प करता हूँ कि मैं गौसेवा और गौसंरक्षण के लिए अपने जीवन को समर्पित करूंगा। ’ मैं संकल्प करता हूँ कि मैं पर्यावरण की रक्षा के लिए वृक्षारोपण को बढ़ावा दूँगा, स्वयं वृक्षारोपण करूंगा और संरक्षण करूंगा। ’ मैं संकल्प करता हूँ कि मैं जातिभेद, छुआछूत को दूर करके समाज में सद्भावना का माहौल बनाऊंगा। ’ मैं संकल्प करता हूँ कि मैं धर्मद्रोहियों, राष्ट्रद्रोहियों को व राष्ट्र की सम्पत्ति को किसी प्रकार से नुकसान पहुँचाने वालों का कभी भी सम्मान नहीं करूंगा और उनके विरुद्ध खुलकर आवाज उठाऊंगा। ’ मैं संकल्प करता हूँ कि मैं किसी भी खाद्यपदार्थ में मिलावट नहीं करूंगा और मिलावट करने वालों को कानून के दायरे में लाकर सजा दिलाने का कार्य करूंगा। ’ मैं संकल्प करता हूँ कि मैं नारी की रक्षा के लिए, नारी के सम्मान के लिए अपने जीवन को समर्पित करूंगा। ’ मैं संकल्प करता हूँ कि मैं अपने माता-पिता का सम्मान करूंगा और माता-पिता को कभी भी अनाथालय में निराश्रित नहीं छोड़ूंगा। ’ मैं संकल्प करता हूँ कि मैं कभी भी, किसी भी परिस्थिति में न स्वयं आत्महत्या करूंगा और न किसी की हत्या करूंगा। ’ मैं संकल्प करता हूँ कि मैं भगवती मानव कल्याण संगठन के सभी जनजागरण कार्यक्रमों में पूर्ण मर्यादा, अनुशासन एवं नियमों-निर्देशनों के अन्तर्गत कार्य करूंगा।

संकल्प में बड़ी शक्ति होती है। इन संकल्पों को पूरा करने में जुट जाओ, तृप्ति मिलेगी, शान्ति की अनुभूति होगी। इस दिशा में कार्य आप लोगों को करना है।

 सरकारों के द्वारा चलाए जा रहे नशे के कारोबार से पूरा समाज बरबाद होता जा रहा है। बीजेपी चाहे तो नशे का कारोबार बन्द कर सकती है और यदि यह कार्य कर लिया जाए, तो बीजेपी को 25 साल तक कोई सत्ता से डिगा नहीं सकता। मैं बीजेपी की सत्ता को स्थिर कर दूँगा।“

उप मुख्यमंत्री मध्यप्रदेश शासन श्री राजेन्द्र शुक्ल जी

इस अवसर पर उपस्थित उप मुख्यमंत्री मध्यप्रदेश शासन श्री राजेन्द्र शुक्ल जी ने अपने उद्बोधन में कहा कि “ नवरात्र का पर्व शक्ति की आराधना का पर्व होता है और नवमी के दिन हम यहाँ इतनी बड़ी संख्या में उपस्थित हुए हैं, यह हम सभी का सौभाग्य है। यहाँ 28 सालों से सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज के आशीर्वाद से श्री दुर्गाचालीसा पाठ चल रहा है, शक्ति की आराधना हो रही है। शक्ति के बिना कुछ नहीं किया जा सकता। यह आस्था का देश है, यह देवभूमि है और साक्षात भगवान् ने इस धरती पर जन्म लेकर कुरीतियों को दूर किया है। यहाँ नशामुक्ति की बात हो रही है। मेरे द्वारा नशामुक्ति के लिए कार्य किया जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी देश को सबसे बड़ी आर्थिक महाशक्ति बनाने हेतु प्रयासरत हैं, जिससे देश का विकास हो सके और धर्मगुरुओं के नेतृत्व में देश धर्मगुरु बनेगा। यदि गरीबी दूर होगई, सबकुछ ठीक होगया और फिर नशे ने यदि सबकुछ बरबाद कर दिया, तो ऐसा विकास किस काम का? हमें ऐसा विकास नहीं चाहिए। अपने रीवा जि़ले में मैंने रीवा की पुलिस को नशे के अवैध कारोबार को पूरी तरह बन्द कराने के लिए कह दिया है, नशे की खेपें जब्त की गई हैं और यह कार्य चलता रहेगा। नशे की बीमारी को दूर करने के लिए हम जरूर कार्ययोजना बनाएंगे।“

सद्गुरुदेव जी महाराज ने कहा कि “शराबमाफियाओं के द्वारा इतना बड़ा नशे का कारोबार नहीं किया जा रहा है, जितना कि सरकारें कर रही हैं। यदि राजस्व ही चाहिए, तो एक टैक्स और लगा दिया जाए, जनता सहर्ष दे देगी, लेकिन नशेरूपी जहर का कारोबार पूरी तरह बन्द करने की जरूरत है। मैं चाहूँगा कि मेरी आवाज देश के प्रधानमंत्री और प्रदेश के मुख्यमंत्री तक पहुँचाई जाए। 

हम सभी को नशामुक्ति अभियान में  निर्मल मन से लगे रहना है। हमें इस कुरीति को दूर करना है, घर-घर जाकर लोगों को समझाना है और एक-न-एक दिन सरकारों को बाध्य कर देंगे कि वे देश को नशामुक्त करें। एक-न-एक दिन अवश्य परिवर्तन आयेगा। कोई भी कार्य असम्भव नहीं है। हमारे ऊपर माता जगदम्बे की कृपा है।“

तृतीय व अन्तिम दिवस ऋषिवर का दिव्य चिन्तन

ऋषिवर वचनरूपी अमृतकणिकाएं बिखेरते हुए कहते हैं कि-

“मैं अपनी ऊर्जातरंगों के माध्यम से शक्तिसाधक तैयार कर रहा हूँ। मेरी निगाह केवल ‘माँ’ से जुड़ी हुई उस कड़ी पर रहती है कि कहीं उसमें जंग तो नहीं लग रहा है। अध्यात्म के पथ पर, सत्य के पथ पर चलकर जिस तरह आप लोगों के जीवन में परिवर्तन आया है, उसी तरह समाज में भी परिवर्तन आयेगा और यह कार्य भगवती मानव कल्याण संगठन करेगा। अपने जीवन को सार्थक बनाने का प्रयास करते रहें। आपका गुरु आपको जो निर्देशन देता है, पहले वह उस तरह का जीवन स्वयं जीता है। आज जिस काल में हम जीवन जी रहे हैं, उस भयावह काल की समाप्ति के लिए ‘माँ’ ने पहले से रचना कर रखी है और यही संगठन समाज की आवाज बनेगा।

मानवता कराह रही है, तड़प रही है। 10 प्रतिशत समाज को आगे बढ़ाकर उसे ही प्रगति मत समझ लेना। 90 प्रतिशत समाज विपन्नता का जीवन जी रहा है। अन्यायी-अधर्मियों का साम्राज्य बढ़ता जा रहा है, जेहादी मानसिकता के लोगों का वर्चस्व बढ़ रहा है, जो कि देश की अस्मिता के लिए, हिन्दुओं की अस्मिता के लिए, सनातन के लिए घातक है। हर पल सजग रहने की जरूरत है और यदि अपने कर्त्तव्य से च्युत रह गए, तो आने वाली पीढ़ी कराहती, तड़पती रहेगी, कोई ध्यान देने वाला नहीं होगा। अत:  सजग हो जाओ और सशक्त बनकर समाज को बचाने का कार्य करो। मानवता की सेवा, धर्म की रक्षा और राष्ट्र की रक्षा के लिए अपना जीवन समर्पित कर दो। मेरी तीनों धाराओं का लक्ष्य यही है।

हमें अपनी अध्यात्मिकशक्ति को हरपल बढ़ाना है, लेकिन इस शक्ति को प्राप्त करके अकर्मण्य नहीं, अपितु कर्मवान बनना है। अपनी ऊर्जाशक्ति को, अपने तपबल को लेकर के समाज के बीच कार्य करना है। एक बार ठान लो कि अब तक जो हो चुका, वह हो चुका, लेकिन अब हम अपना पतन नहीं होने देंगे। मैं बड़ी शांति और धैर्यता के साथ अपने जीवन की यात्रा तय कर रहा हूँ। आपके गुरु को परमसत्ता ने वह शक्ति दे रखी है कि असम्भव से असम्भव कार्य को किया जा सकता है, लेकिन मैं तुम्हारे माध्यम से कार्य कराना चाहता हूँ। भगवान् राम ने वानरों की सेना लेकर असुरों पर विजय पाई थी, फिर तुम तो शक्तिसाधक हो। मेरे पास जो है, वही तुम्हारे पास है, जो मैं हूँ, वही तुम भी हो। तुम भी मेरे समान हो, अत: अपनी अध्यात्मिकशक्ति को और जाग्रत् करो, हजारों रावणों का विनाश करने की शक्ति तुम्हें प्राप्त हो जायेगी।

आज विजयादशमी पर्व है। जगह-जगह रावण और कुम्भकरण के पुतले जलाए जा रहे हैं। असत्य पर सत्य की विजय ऐसे नहीं हो जायेगी। इसके लिए हमें नित्यप्रति प्रयास करना पड़ेगा, अपनी अन्तर्शक्ति को जाग्रत् करना पड़ेगा, सात्विकता का जीवन जीना पड़ेगा। यह यात्रा कठिन अवश्य है, लेकिन असम्भव कुछ भी नहीं है। हमें कमजोर न समझा जाए, हम ‘माँ’ के चरणों के सेवक हैं, ‘माँ’ के समान ही हमारे अन्दर भी ममता का सागर हिलोरें ले रहा है और यदि हम अनीति-अन्याय-अधर्म के विरुद्ध उठ खड़े हों, तो हमारा हृदय पाषाण से भी अधिक कठोर है। श्जब चलेंगी आंधियाँ माँ के ममता प्यार की, काल के वटवृक्ष ढहकर धूल में मिल जायेंगे। मैं प्रतीक्षा कर रहा हूँ उन क्षणों का, जब मेरा महाशक्तियज्ञस्थल बनकर तैयार होजाए। उन यज्ञों की शक्ति को एक बार पुन:  समाज देखेगा।

 हमें नित्यप्रति ‘माँ’ की भक्ति करना है। डूब जाओ ‘माँ’ के चरणों की भक्ति में, चेतनातरंगों से तुम्हारा स्थूल तरंगित हो उठेगा। हमें नित्यप्रति अपने जीवन में परिवर्तन डालने का प्रयास करना है। जब तक आसुरीतत्त्वों का, गलत लोगों का विरोध नहीं करोगे, तब तक वे सुधरने वाले नहीं हैं। सनातन की शक्ति को पहचानने का प्रयास करो। हमें हिंसक नहीं बनना, लेकिन अपनी रक्षात्मकशक्ति को बढ़ाना अनिवार्य है कि हम अपनी भी रक्षा कर सकें, दूसरों की भी रक्षा कर सकें और नारियों के सम्मान की भी रक्षा करें।

हम शक्तिसाधक हैं और हर सनातनी के घर के आंगन में या छत में एक त्रिशूल अवश्य लगा होना चाहिए। नित्यप्रति उस स्थल पर पूजन करें, जहाँ पर त्रिशूल स्थापित हो। यह ‘माँ’ का त्रिशूल है और यह हिंसा के लिए नहीं है।

लोग धार्मिकस्वरूप कटार रखते हैं, तलवारें रखते हैं। हम सनातनी हैं, तो ‘माँ’शक्ति के प्रतीकस्वरूप त्रिशूल क्यों नहीं रख सकते? कभी भी कोई परिस्थिति आ जाए, कोई आक्रमण करने के लिए आ जाए, तो आत्मरक्षा के लिए या दूसरों पर ऐसी विपत्ति आ जाए, तो उनकी रक्षा के लिए ‘माँ’ का स्मरण करो और उस त्रिशूल को उठा लो, तुम्हारे अन्दर ऐसी शक्ति का संचार होगा कि तुम उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते। वे धमकी देते हैं कि हम तलवार लेकर निकल आयेंगे, तो हिन्दू भागते नजर आयेंगे! जब कभी आवश्यकता पड़ेगी, हजारों सनातनियों के हाथों में त्रिशूल होगा, तो वे आक्रमणकारी, जेहादी मानसिकता के लोग भागते नजर आयेंगे। सत्य के ऊपर असत्य कभी विजयी नहीं हो सकता।

आज से आप लोग मेरे इस आदेश का भी पालन करेंगे कि अपने बच्चों को सूर्योदय से पहले अवश्य जगा देना। संकल्प लेकर जाओ कि मैं स्वयं सूर्योदय से पहले जागूंगा और अपने बच्चों को भी जगाऊंगा। इस संकल्प का नित्यप्रति पालन करोगे, तभी घर में सुख-शांति-समृद्धि का वास होगा।“

केन्द्रीय राज्यमंत्री, भारत सरकार, प्रतिमा भौमिक जी

शिविरस्थल पर उपस्थित त्रिपुरा की पूर्व प्रथम महिला केन्द्रीय राज्यमंत्री, भारत सरकार, प्रतिमा भौमिक जी ने परम पूज्य गुरुवरश्री को नमन करते हुए अपने उद्बोधन में कहा कि ‘मुझे इसी साल अगस्त माह में सिद्धाश्रम आने का अवसर प्राप्त हुआ था और जब मैंने माता के मंदिर में प्रवेश किया, तो वहाँ बैठते ही मेरा मन शांत होता चला गया, उठने की इच्छा ही नहीं हो रही थी। नानस्टॉप किसी स्थान पर माता का गुणगान होता है, तो वहाँ का वाईब्रेशन अलग ही होता है, फिर इस सिद्धाश्रम में तो 28 वर्षों से माता का गुणगान हो रहा है।

अभी गुरुजी ने आदेश दिया है कि सुबह जागना है, इसलिए आज से वादा करती हूँ कि ब्रह्ममुहूर्त में जाग जाऊंगी। हमारे भारत में ऐसे गुरु हैं, इसीलिए सनातन जिन्दा है। हमारी चेतना को जगाने के लिए श्री शक्तिपुत्र जी महाराज जैसे गुरु मौजूद हैं। त्रिपुरा को नशामुक्त बनाने के लिए और वहाँ श्री दुर्गाचालीसा पाठ कराने के लिए गुरुजी से अनुमति चाहती हूँ और माता त्रिपुर सुन्दरी के दर्शन हेतु त्रिपुरा आने के लिए आग्रह करती हूँ।‘

परम पूज्य गुरुवरश्री ने प्रतिमा जी को त्रिपुरा आने का आश्वासन देते हुए शिष्यों-भक्तों से कहा कि “अपने जीवन में सतत परिवर्तन लाने का प्रयास करते रहना है, अपने बच्चों को सही दिशा देना है और यदि बच्चों की ओर, आने वाली पीढ़ी की ओर अच्छी तरह से ध्यान दे दिया और उन्हें नशे-मांसाहार से मुक्त चरित्रवान्, चेतनावान् बनाने में सफल रहे, तो हमारा सनातन पुन: अपनी अध्यात्मिक ऊँचाईयों को प्राप्त कर लेगा। “

श्रमशक्ति पुरस्कार से समान्नित शिष्य

सद्गुरुदेव जी महाराज के आनन्ददायक, रमणीय और पवित्र वचनों को आत्मसात करके शिष्यों-भक्तों व इस शिविर में उपस्थित रहे जनसमुदाय का जीवन धन्य हो गया।

तीसरे दिन की दिव्य आरती से पूर्व शक्तिस्वरूपा बहनों पूजा जी, संध्या जी और ज्योति जी ने सिद्धाश्रम धाम में सेवारत सात सदस्यों को श्रमशक्ति पुरस्कार देकर उन्हें सम्मानित किया। पुरस्कार पाने वालों में कैलाश तिवारी जी उर्फ भजन, नरेन्द्र विश्वकर्मा जी, ब्रम्हे सिंह जी, सुमन सिंह जी, रेखा सिंह जी उर्फ गेसू, सुमन राजपूत जी, सभी निवासी-पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम और कुशबाई साहू जी, निवासी-महासमुंद, छत्तीसगढ़ शामिल रहे। पुरस्कार रूप में इन्हें प्रमाणपत्र, दस हजार रुपए, एक शॉल और संगठन का एक बैग प्रदान किया गया। इन सभी ने अपनी सेवा एवं पुरुषार्थ से निश्चित ही परम पूज्य गुरुवर के श्रीचरणों की नजदीकता प्राप्त की है।

शिविर में उपस्थित समस्त भक्तों की ओर से शक्तिस्वरूपा बहनों और सिद्धाश्रम चेतनाओं के द्वारा तीनों दिवस सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज एवं माता आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा की दिव्यआरती सम्पन्न की गई। तीनों दिवस दिव्य आरती के समय का वातावरण अत्यन्त ही भक्तिमय रहा। गुरुवरश्री की ध्यानावस्थित मुद्रा और प्रवाहित चेतनातरंगों की अनुभूति की अलौकिकता में सभी भक्तों ने एकाग्र होकर दिव्य आरतियों का लाभ प्राप्त किया।

विजयादशमी के पावन पर्व पर दस हजार से अधिक नए भक्तों ने ली सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज से गुरुदीक्षा

तृतीय दिवस के प्रथम सत्र में सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज से दस हजार से अधिक नए भक्तों ने दीक्षा लेकर नवजीवन में कदम रखा। परम पूज्य गुरुवर ने दीक्षा देने से पूर्व कहा कि श्श्जिस दिन, जिस क्षण से मनुष्य एक चेतनावान् गुरु से दीक्षा प्राप्त कर लेता है, उसका नवीन जीवन प्रारम्भ होता है। इस पावन-पुनीत अवसर पर सभी नए शिष्यों ने नशे-मांसाहार से मुक्त चरित्रवान्, चेतनावान्, पुरुषार्थी और परोपकारमय जीवन जीने का संकल्प लिया।

शिविर में हुआ जुड़वा बच्चों का जन्म

शक्ति चेतना जनजागरण शिविर के दूसरे दिन नवमी पर्व पर जुड़वा बच्चों का जन्म हुआ। शक्तिस्वरूपा बहनों ने उन बच्चों के नाम संकल्प और शक्ति रखा।

नवजात बच्चों के पिता श्रवण कुमार पाल और माता राजपति पाल, निवासी ग्राम-भलाया टोला, पोस्ट-खनुआ, तहसील-खरई, जि़ला-सिंगरौली, म.प्र., सन् 2013 से भगवती मानव कल्याण संगठन से जुड़े हैं। अपने चिन्तन के दौरान परम पूज्य गुरुवरश्री ने अपना आशीर्वाद प्रदान करते हुए कहा कि “आश्रम आने पर आवास हेतु इनके लिए एक कमरा सुरक्षित रहेगा और आशीर्वादस्वरूप 25 हजार रुपए भी दिए जा रहे हैं।“

योग-ध्यान-साधना का क्रम    

उक्त साधनात्मक क्रमों के पश्चात् प्रात: 7.30 बजे ‘माँ’ के सभी भक्तों ने प्रवचन स्थल में बैठकर पूरे मनोयोग से अतिमहत्त्वपूर्ण बीज मंत्र ‘माँ-ॐ’ का सस्वर जाप व शक्तिस्वरूपा बहन संध्या शुक्ला जी के सान्निध्य में यौगिकक्रियाओं का लाभ प्राप्त किया। इस अवसर पर एक लाख से अधिक लोगों ने एकाग्रचित्त होकर योग-ध्यान-साधना की विधाओं को क्रियात्मक रूप से समझा और संकल्पित हुए कि इन क्रमों के बिना उनका जीवन निरूसार है। इस अवसर पर शक्तिस्वरूपा बहन पूजा दीदी जी व ज्योति दीदी जी भी विशेष रूप से उपस्थित रहीं। शिविर के द्वितीय दिवस भी प्रथम सत्र में भक्तों ने योग-ध्यान-साधना के क्रमों को पूर्ण किया।

भावगीतों का क्रम

 शक्तिस्वरूपा बहनों पूजा जी, संध्या जी, ज्योति जी एवं सिद्धाश्रम चेतनाओं आरुणि जी, अद्वैत जी, आत्रेय जी तथा अधीश जी के द्वारा परम पूज्य गुरुवरश्री के पदप्रक्षालन एवं वन्दन के उपरान्त भगवती मानव कल्याण संगठन के सदस्यों में से कुछ सदस्यों के द्वारा ‘माँ’-गुरुवर के श्रीचरणों में भावगीत प्रस्तुत किए गए। प्रथम दिवस प्रस्तुत भावगीतों केप्रारंभिक अंश इस प्रकार हैं-

जिनके चरणकमलों पर हमने पाया जीवन का सार है,…।-बाबूलाल विश्वकर्मा जी। पधारो-पधारो हे माँ भवानी…।-वीरेन्द्र दीक्षित जी। जब मन निश्छल होगा, हृदय निर्मल होगा, मानव का ये जीवन तभी तो सफल होगा।-शक्तिस्वरूपा बहन संध्या शुक्ला जी। 

द्वितीय दिवस सिद्धाश्रमरत्न सौरभ द्विवेदी जी के द्वारा प्रस्तुत चेतनाप्रद भावगीत सुनकर शिविर में उपस्थित सम्पूर्ण जनसमुदाय मन्त्रमुग्ध होगया, जिसकी प्रारंभिक पंक्तियाँ इस प्रकार हैं–

है नशामुक्त जीवन अगर आपका, जानिए स्वर्ग जैसा है घर आपका।

आपके घर विराजेंगे ईश्वर स्वयं, होगा आसान हर सफर आपका।।

इससे पूर्व बाबूलाल विश्वकर्मा जी एवं वीरेन्द्र दीक्षित जी ने अपने भावसुमन को गीत में पिरोया और अपनी बालसुलभ वाणी में सिद्धाश्रम चेतना अद्वैत जी ने गीता के अनेक श्लोक सुनाकर सबको आश्चर्यचकित कर दिया- देहिनोह्यस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।…।।

तृतीय दिवस प्रतीक जी, सिद्धाश्रम के द्वारा प्रस्तुत भावगीत की प्रारंभिक पंक्तियाँ- गुरुचरणों में सारा संसार झुकता, गुरुचरणों में पाई है माँ की ममता। बाबूलाल विश्वकर्मा जी और वीरेन्द्र दीक्षित जी ने भी गुरुचरणों में अपने भावसुमन रखे।

सुरुचिपूर्ण रही व्यवस्था

 इस वृहद् आयोजन की विभिन्न व्यवस्थाओं को सुचारू रूप से संचालित करने में भगवती मानव कल्याण संगठन के पाँच हजार से भी अधिक समर्पित कार्यकर्ताओं ने अपनी अग्रणी भूमिका निभाई। भक्तों की सुविधा के लिए जनसम्पर्क कार्यालय, नि:शुल्क  प्राथमिक उपचार केन्द्र, खोया-पाया विभाग, मीडिया कार्यालय, वस्त्र समर्पण केन्द्र सहित आगन्तुक शिविरार्थियों के लिए आवासीय पण्डाल और  वाहनों के लिए पार्किंग व्यवस्था रही।

 हजारों कार्यकर्ताओं ने भोजन व्यवस्था के अन्तर्गत निर्माण व वितरण में अपना सराहनीय योगदान दिया। शिविर पण्डाल में श्रोताओं को पंक्तिबद्ध बैठाने और अन्त में क्रमबद्ध ढंग से प्रणाम कराने एवं प्रसाद वितरण में हजारों कार्यकर्ता लगे रहे। मूलध्वज साधना मन्दिर और श्री दुर्गाचालीसा अखण्ड पाठ मंदिर के प्रात: एवं सायंकालीन साधनाक्रम व आरती सम्पन्न कराने तथा शिविर पण्डाल में प्रात:कालीन योग-ध्यान-साधना क्रम सम्पन्न कराने में भी हजारों कार्यकर्ताओं ने अपने कर्तव्य का निष्ठापूर्वक निर्वहन किया।

शिविर पण्डाल में प्रथम दो दिवसों में प्रात: सात से नौ बजे तक मंत्रजाप एवं योग-ध्यान-साधना का क्रम तथा अपराह्न एक बजे से भावगीतों का क्रम रहता था।

तदुपरान्त, प्रवचनस्थल पर उपस्थित जनसमुदाय के द्वारा ‘माँ’-गुरुवर के जयकारे लगाए जाते और वातावरण में तरंगित शंखध्वनि के मध्य ऋषिवर सद्गुरुदेव जी महाराज का शुभागमन होता था।

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