131वाँ राष्ट्र सेवा शक्ति साधना नशामुक्ति शिविर, नेपाल, 16-17 मई 2025

समय का अखण्ड प्रवाह अपनी गति पर है और ज्यों-ज्यों यह प्रवाह आगे बढ़ता जा रहा है, आपसी वैमनस्यता, आदर्श आचरण का अभाव, समाजिक, सांस्कृतिक व राष्ट्रीय समस्याएं तथा असाध्य रोग, मानवता को अपने विकराल क्रूर पंजे में दबोचते जा रहे हैं। परिलक्षित हैय नित्यप्रति अविश्वास, धोखा, अधर्म, अनैतिकता एवं भयपूर्ण वातावरण समूचे विश्व को प्रदूषित करता जा रहा है और त्यों-त्यों इस अंधकारमय परिवेश को प्रकाश प्रदान करने के लिए प्रदीपरूप ऋषिवर सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज के कालजयी चिन्तन की उपयोगिता बढ़ती जा रही है।

इतिहास की अविरल धारा में जब-जब ऐसी समस्याएं आईं हैं, तब-तब ऋषियों के चिन्तन सतत उनका समाधान करते रहे हैं। वर्तमान समय में भी संदर्भित परिस्थितियाँ मानवता को अपने विकराल जबड़े में दबोचने के लिए तत्पर हैं, तथापि विश्व की मानवता के कल्याण हेतु ऋषिवर श्री शक्तिपुत्र जी महाराज के अमूल्य, अमोघ चिन्तनों की वर्षा दिनांक 16-17 मई 2025 को पशुपतिनाथ मंदिर परिसर, काठमाण्डो, नेपाल में आयोजित राष्ट्रसेवा शक्ति साधना नशामुक्ति शिविर में हुई, जिसे सुनकर व आत्मसात करके निश्चय ही नेपालवासी भी नशे-मांसाहार से मुक्त होकर चरित्रवान् जीवन जीते हुए अपने राष्ट्र की उन्नति में सहभागी बनेंगे। आइए, हम सभी ऋषिवर के कालजयी चिन्तनों का स्मरण करते हुए विश्वकल्याण एवं प्रकाशमयी जीवन की कामना करें।

पशुपतिनाथ मंदिर परिसर, काठमाण्डो, नेपाल में आयोजित राष्ट्रसेवा शक्ति साधना नशामुक्ति शिविर में  ऋषिवर सद्गुरुदेव परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज के दर्शनों एवं चिन्तन श्रवण करने हेतु अपार भीड़ उमड़ पड़ी थी। सभी ने आपश्री के दर्शन पाकर अपने भाग्य को सराहा और प्रकृतिमय चिन्तन को आत्मसात करते हुए नशे-मांसाहार से मुक्त चरित्रवान्, चेतनावान्, पुरुषार्थी एवं परोपकारमय जीवन जीने सहित अनेक जीवनोपयोगी संकल्पों को धारण किया।

शिविर के प्रथम दिवस प्रात:  7.30 बजे ‘माँ’  के सभी भक्तों ने शिविर पण्डाल में  बैठकर पूरे मनोयोग से अतिमहत्त्वपूर्ण बीज मंत्र ‘माँ- ॐ’ का सस्वर जाप किया व शक्तिस्वरूपा बहन संध्या शुक्ला जी के सान्निध्य में यौगिक क्रियाओं का लाभ प्राप्त किया। इस अवसर पर शक्तिस्वरूपा बहन पूजा जी व ज्योति जी भी विशेष रूप से उपस्थित रहीं।

शिविर के द्वितीय सत्र की अपराह्न बेला, भगवती मानव कल्याण संगठन के कलाकार कार्यकर्ताओं के द्वारा निर्मित मंच व आसन की भव्यता देखते ही बनती थी। भव्य मंच के एक ओर ‘माँ’  और गुरुवरश्री की संयुक्त छवि व समक्ष प्रज्ज्वलित अखण्ड ज्योति तथा दूसरी ओर श्रीफल से सुशोभित सुख-समृद्धि का प्रतीक कलश। मंच की अद्वितीय आभा सभी को आकर्षित कर रही थी।

मंच के समक्ष प्रवचन पंडाल व विशाल परिसर में अनुशासित ढंग से पंक्तिबद्ध बैठे हुए माता भगवती के भक्त गुरुवरश्री के आगमन की प्रतीक्षा में जयकारे लगाने में लीन थे कि तभी अपराह्न 01:30 बजे गुरुवरश्री का आगमन हुआ और शिविरस्थल तालियों की गड़गड़ाहट और शंखध्वनि से गुंजायमान हो उठा। सद्गुरुदेव भगवान् के मंचासीन होते ही शक्तिस्वरूपा बहनों पूजा जी, संध्या जी, ज्योति जी एवं सिद्धाश्रम चेतनाओं ने उपस्थित समस्त भक्तों की ओर से गुरुवरश्री का पदप्रक्षालन करके पुष्प समर्पित किये। 

तत्पश्चात् भगवती मानव कल्याण संगठन के सदस्यों में से, गीत-संगीत की प्रतिभा के धनी शिष्यों ने भक्तिरस से परिपूर्ण भावगीत प्रस्तुत किये। जिसके प्रारंभिक अंश इस प्रकार हैं: —

स्वागतम गुरुवर, सुस्वागतम गुरुवर। स्वागतम ऋषिवर, सुस्वागतम ऋषिवर-नम्रता पौणेल जी और सुशीला पाण्डे जी, काठमाण्डो, नेपाल। हमारे साथ गुरुवर हैं, तो तूफानों से क्या डरना-वीरेन्द्र दीक्षित जी दतिया (मध्यप्रदेश, भारत)। पशुपतिनाथ की पावन नगरिया, युगचेतना करतार आ गए हैं-बाबूलाल विश्वकर्मा जी, दमोह (मध्यप्रदेश, भारत)।

भावगीतों के क्रम के बाद, उपस्थित सभी भक्तों ने ‘माँ- ॐ’ बीजमंत्रों का पाँच-पाँच बार क्रमिक उच्चारण किया। तत्पश्चात् ऋषिवर सद्गुरुदेव परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज ने ध्यानावस्थित होकर माता भगवती आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा की स्तुति की और सभी शिष्यों, शिविर व्यवस्था में लगे सभी कार्यकर्ताओं, प्रवचन पंडाल में उपस्थित विशाल जनसमुदाय सहित नेपाल राष्ट्र के सम्पूर्ण जनमानस को पूर्ण आशीर्वाद प्रदान किया। तत्पश्चात् मृदुल मुस्कान के साथ ऋषिवर की वाणी मुखर हो उठती है–

“नेपाल राष्ट्र में पशुपतिनाथ धाम परिसर पर आयोजित यह शिविर एक विशेष चेतना को लिए हुए है और जहाँ पर भी शक्ति चेतना जनजागरण शिविरों का आयोजन किया जाता है, वहाँ पर उपस्थित होने वाले शिष्यों, भक्तों, श्रद्धालुओं, उस क्षेत्र से जुड़े जनमानस के साथ ही सम्पूर्ण अध्यात्मिक जनमानस और विश्वजगत् में कहीं भी, जो सत्यधर्म के पथ पर चल रहे हैं, उन सभी का कल्याण निहित रहता है।

माता भगवती आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा ही मेरी और आपकी, जन-जन की जननी हैं, हमारी आत्मा की जननी हैं, हमारी मूल इष्ट हैं। देवी-देवता अनेक हैं। हर काल-परिस्थितियों में देवी-देवताओं ने अलग-अलग स्थानों पर अवतरित होकर मानवता को सही दिशा दी, पर उनके मूल में माता भगवती आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा हैं, जिन्हें देवाधिदेव भी माँ कहकर पुकारते हैं। ‘माँ’  की शरण में आने से वर्तमान के कलिकाल के भयावह वातावरण में मानव को सुख-शांति-समृद्धि तो प्राप्त होगी ही, परन्तु सबसे बड़ा धन जो प्राप्त होना है, वह है आत्मकल्याण का। आत्मकल्याण ही हमारा मूल है, जो कहानी-किस्सों से नहीं हो सकता, कथाओं से नहीं हो सकता। हमारा आत्मकल्याण प्रचण्ड पुरुषार्थ से होगा, प्रचण्ड त्याग की भावना से होगा। एक ऐसी ऊर्जा अपने अन्दर स्वयं पैदा करनी पड़ेगी, जिस ऊर्जा के बल पर हम अपनी आत्मचेतना को पहचान सकें, आत्मावान बन सकें, अपनी चेतना को जाग्रत् कर सकें।

हर धरती का एक महत्त्व होता है और नेपाल की यह धरती, जहाँ पर एक नहीं, हमारे अनेक ऋषियों-मुनियों ने तपस्या की है और उनकी ऊर्जा, उनकी तप-त्याग-तपस्या आज भी इस धरती के वासियों को दिशा प्रदान कर रही है। भारत और नेपाल में कभी द्वेष का भाव रहा ही नहीं। हम दोनों देश एक हैं और दो भाइयों के समान सदा ही एक-दूसरे से लगाव बना रहा है। ये दोनों राष्ट्र सदा एक रहे हैं और सदा एक रहेंगे तथा भगवती मानव कल्याण संगठन की विचारधारा, इन दोनों राष्ट्रों को और मजबूती प्रदान करेगी। उसी दिशा में हमें और आप सभी को मिलकर कार्य करना है।

एक ऐसा परिवर्तन, जिससे समाज में ऐसी लहर पैदा हो कि समाज में अनीति-अन्याय-अधर्म का कोई स्थान न हो। अपने अन्दर के तप-बल के माध्यम से सबकुछ सम्भव किया जा सकता है। हमें यह परिवर्तन अपने आपमें डालना है, अपने समय को नष्ट नहीं करना है। कहानी-किस्से-कथाएं तो बहुत सुन चुके, अब अपने आपको तप के प्रति आकर्षित करो, नित्यप्रति अपने घरों में तपस्या करो, माता भगवती आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा की साधना-आराधना करो। जिस इष्ट में भी आपका विश्वास है, उस इष्ट की साधना करो। साधना केवल प्रलोभनों के लिए न हो, साधना केवल कामनाओं से जुड़ी हुई न हो। आपकी सबसे बड़ी कामना आत्मकल्याण की होनी चाहिए कि हम यह जान सकें कि हम कौन हैं, हमारा कौन हैं और हमारा कर्म क्या है? इन तीन बिन्दुओं को हम तभी जान सकेंगे, जब हम सत्यपथ पर चलेंगे, साधना-आराधना के पथ पर चलेंगे, माता भगवती आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा की भक्ति करेंगे।

मन है हमारी अलौकिक शक्ति 

भक्ति में अलौकिक क्षमता होती है। भक्ति का प्रवाह जब भक्तों के अन्दर प्रवाहित होता है, तो सहजभाव से उनके अन्दर के अवगुण दूर होते चले जाते हैं एवं चेतना की प्राप्ति होती है, मन में सद्विचार आने लगते हैं, आपकी प्राणशक्ति चैतन्य  होने लगती है, बुद्धि चैतन्य  होने लगती है, मन:शक्ति चैतन्य  होने लगती है। ये तीनों ही अतिमहत्त्वपूर्ण हैं। प्राणशक्ति, बुद्धि की शक्ति और मन की शक्ति। मन को कभी चंचल मत मानो, मन बिल्कुल निर्दोष है, मन में कोई दोष नहीं होता। समझने का प्रयत्न करो, मन हमारी अलौकिक शक्ति है। हमारी प्राणशक्ति की, बुद्धिशक्ति की चेतना है मन।

मन में हम जैसा विचार डालेंगे, मन वैसा कार्य करने लग जाता है। मन को आप जिस दिशा में डालो, उस दिशा में कार्य करने लग जाता है। केवल अपने मन को माता भगवती आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा की भक्ति में लगा करके देखो। भक्त प्रहलाद ने क्या किया था, ध्रुव  ने क्या किया था? जिन्हें आज भी हम याद करते हैं। ये छोटे बालक, क्या इन्होंने किस्से-कहानियाँ सुनी थीं? नहीं। केवल अपने गुरुओं से जो मन्त्र मिले, पूर्ण आस्था और विश्वास से उन मन्त्रों को लेकरके तप में लीन होगए। जब हम सबकुछ छोड़ करके बस एक लक्ष्य में लग जाते हैं, हमारी मन:शक्ति एक लक्ष्य पर लग जाती है, तो भक्त प्रहलाद और ध्रुव  जैसे एक नहीं, अनेक शक्तिसाधक तैयार हो सकते हैं।

भक्ति को सीमा में नहीं बांधना चाहिए

 भक्ति का प्रवाह यदि प्रबल होजाए, तो मूर्तियाँ भी बात करती हैं, भक्ति का प्रवाह यदि प्रबल होजाए, तो असम्भव भी सम्भव होजाता है, भक्ति का प्रवाह यदि प्रबल होजाता है, तो अदृश्य भी दृश्य होजाता है। आवश्यकता है अपने अन्दर तप-बल की। एकनिष्ठता का भाव, तपस्या के पथ पर चलने की इच्छाशक्ति, भक्ति का प्रवाह जाग्रत् करने की इच्छाशक्ति, जिनसे आज समाज दूर होता चला जा रहा है। भक्ति असीमित होनी चाहिए, साधना असीमित होनी चाहिए, इन्हें कभी सीमाओं में बांधना ही नहीं चाहिए। जो क्षमता भक्त प्रहलाद के पास थी, जो क्षमता भक्त ध्रुव  के पास थी, जो क्षमता हमारे ऋषियों-मुनियों के पास थी तथा उन्होंने उस पथ का चयन किया और उस पथ पर चल करके असम्भव को भी सम्भव किया।

 आप लोग भी उस पथ पर चलने का प्रयास करो। कहीं-न-कहीं से शुरुआत करनी ही पड़ेगी। भौतिकतावाद के झंझावातों में अपने आपको मत उलझाओ और सत्य के पथ का चयन करो। एक बार यह निर्णय करो कि हमारे जीवन की आवश्यकता क्या है? अपने जीवन की आवश्यकता को जब तलाशोगे, तब लगेगा कि हमने अपने अन्दर का बहुत कुछ खो दिया है। तुम्हारे अन्दर की जो क्षमताएं थीं, तुम्हारे अन्दर का जो ज्ञानबल था, तुम्हारे अन्दर का जो शरीरबल था, तुम्हारे अन्दर का जो साधनाबल था, तुम्हारे अन्दर की जो प्राणशक्ति थी, कहाँ खोती जा रही है? पूर्वजों के पास जो क्षमताएं थीं, उनसे आप कितना पीछे होते जा रहे हो? तुम्हारे पूर्वजों के पास कम संसाधन थे, पर वे तृप्त थे और शान्ति व सन्तोष का जीवन जीते थे। आज तुम्हारे पास उनसे ज्यादा संसाधन हैं, फिर भी अतृप्त हो, हमेशा भयग्रस्त रहते हो! इस तथ्य को समझना होगा कि सत्यपथ पर चल करके असम्भव को भी सम्भव किया जा सकता है।

अपने हृदय को पवित्र और निर्मल बनाओ

जीवन की जो सबसे बड़ी आवश्यकता है कि अपने हृदय को पवित्र और निर्मल बनाओ। आपके अन्दर जो चक्र हैं, उन्हें स्पंदित करो, उन्हें चैतन्य  बनाने का प्रयास करो, फिर देखो कि तुम्हारी कार्यक्षमता किस प्रकार बढ़ती है। निर्णय लेने की क्षमता बढ़ेगी तथा तुम्हारी समस्याओं का समाधान सहजभाव से होता चला जायेगा। मगर, समाज को दो बातों पर ध्यान रखना ही पड़ेगा- इच्छाएं और आवश्यकताएं। आज समाज क्यों सन्तुष्ट नहीं हो पा रहा है? वह इच्छाओं की ओर भागता चला जा रहा है और आवश्यकताएं क्या हैं, इस पर ध्यान ही नहीं जा रहा है? आज तक इस धरती पर एक भी ऐसा मानव नहीं पैदा हुआ, जिसने अपनी सभी इच्छाओं की पूर्ति की हो। मगर, जिन्होंने अपनी आवश्यकताओं को समझा और उन्हें पूरा किया, तो उनका जीवन सत्यपथ की ओर बढ़ा। हमारे ऋषि-मुनि रहे हैं, साधक और साधिकाएं रहीं हैं, जिन्होंने अपने जीवन में पूर्णतृप्ति को प्राप्त किया, पूर्ण चेतना को प्राप्त किया।

कब तक अपनी इच्छाओं के पीछे भागते रहोगे?

इच्छाओं के पीछे भाग करके आप पतन के मार्ग पर चले जाते हैं। अरे, इच्छाएं तो अनन्त हैं, जिनकी पूर्ति कभी हो ही नहीं सकती। एक इच्छा की पूर्ति होगी और दूसरी इच्छाएं आपके अन्दर जाग्रत् हो जायेंगी। कब तक आप अपनी इच्छाओं के पीछे भागते रहोगे? नित्यप्रति विचार करो कि मेरे जीवन की कौन-कौन सी आवश्यकताएं हैं? उन आवश्यकताओं की पूर्ति करो। जीवन की बहुत कम आवश्यकताएं होती हैं और यदि केवल उन आवश्यकताओं की ही पूर्ति करोगे, तो तुम्हारा बहुत समय बचेगा, बहुत कुछ सामर्थ्य बचेगी। उस सामर्थ्य को आत्मकल्याण और जनकल्याण में लगाओ। अपनी इष्ट की कृपा प्राप्त करने के लिए ये दो ही रास्ते हैं कि अपना आत्मकल्याण करते रहो और जनकल्याणकारी कार्य करो। इन दोनों की कमी के कारण ही समाज अनीति-अन्याय-अधर्म के मार्ग पर बढ़ता चला गया, जबकि सामर्थ्यवानों की कमी नहीं रही, चेतनाओं की कमी नहीं रही, मगर उन चेतनावानों ने अपने आपको सीमित दायरे में बांध लिया। परोपकार को कभी महत्त्व दिया नहीं और परोपकार किया भी तो केवल दिखावे के लिए। उनके द्वारा अनीति-अन्याय-अधर्म के विरुद्ध कभी आवाज नहीं उठाई गई और न ही समाज को आत्मकल्याण के पथ पर, सत्य के पथ पर बढ़ाने का प्रयास किया गया।

अपने आहार, विचार और व्यवहार पर ध्यान दें

आप लोगों को सबसे ज्यादा अपने आहार, विचार और व्यवहार पर ध्यान देने की जरूरत है। इन तीन बातों पर नित्यप्रति सजग रहें कि मैं आहार कैसा कर रहा हूँ, मेरे विचार कैसे हैं और मेरा व्यवहार किस तरह का है? हमें यदि अपने पतन को रोकना है, साधनापथ पर चलना है, तो सबसे पहले अपने आहार पर ध्यान देना होगा। आहार हमारा शुद्ध, सात्विक, पवित्र और संतुलित हो और हमें हर आधे घंटे में विचार करते रहना चाहिए कि हमारे विचार सतोगुणी हैं या नहीं, हमारे विचार नकारात्मक दिशा में तो नहीं जा रहे हैं। हर पल अपने विचारों को सही दिशा देते चलो। अच्छे विचारों पर आपका चिन्तन चलता रहेगा, तो आपका व्यवहार भी अच्छा होता चला जायेगा।

नशा ही समाज के पतन का मूल कारण है

 राष्ट्ररक्षा, धर्मरक्षा और मानवता की सेवा करना हर मनुष्य का कर्त्तव्य है। हमें अपने राष्ट्र की रक्षा के लिए हर पल तत्पर रहना चाहिए और भ्रष्टाचार व नशे के विरुद्ध मुखर होकर आवाज उठानी चाहिए। नशा ही समाज के पतन का मूल कारण है। भगवती मानव कल्याण संगठन के द्वारा समाज की जो सबसे बड़ी महामारी नशा है, उसे दूर करने के लिए पूरी क्षमता लगाई जा रही है। शिक्षा, सुरक्षा और स्वास्थ्य, इन तीन विभागों में तो एक भी व्यक्ति नशा करने वाला होना ही नहीं चाहिए। अगर इन विभागों में नशा करने वाले व्यक्ति होंगे, तो वे राष्ट्र को बरबादी की ओर ले जायेंगे। अत:  सजगता से इस दिशा में कार्य करो।

नेपाल में भी भगवती मानव कल्याण संगठन के हजारों कार्यकर्ता नशामुक्ति की दिशा में धीरे-धीरे कार्य कर रहे हैं। नेपाल राष्ट्र भी नशामुक्त बने, इसके लिए मैं अपना चिन्तन बनाए रखता हूँ। यहाँ के पर्यावरण के लिए भी संगठन के कार्यकर्ताओं के द्वारा संगठन के केन्द्रीय पदाधिकारी अजय अवस्थी जी के मार्गदर्शन में एक करोड़ वृक्षारोपण का जो लक्ष्य रखा गया है, वह भी सतत चल रहा है।

अपने आपको पहचानो

पुरुषार्थी, परोपकारी जीवन ही सच्चा जीवन होता है और जो पुरुषार्थी नहीं, जिसके अन्दर परोपकार की भावना नहीं, वह इन्सान होकर भी इन्सान कहलाने का अधिकारी नहीं है। कभी भी अनीति-अन्याय-अधर्म के रास्ते का चयन मत करो, भिखारी बनकर जीवन मत जियो। अपने आपको पहचानो, अपनी कार्यक्षमता को, अपनी सामर्थ्य को पहचानो। अधिक से अधिक श्रम करना सीखो, आपका शरीर कभी कमजोर नहीं होगा। आपका गुरु भी वैसा जीवन जीता है। सत्यपथ के राही बनो, पुरुषार्थी और परोपकारी बनो, नशे-मंासाहार से मुक्त चरित्रवान् जीवन जियो, इससे जीवन खुशहाल रहेगा और तृप्ति मिलेगी, सन्तोष मिलेगा। तुम्हारे अन्दर अलौकिक शक्ति-सामर्थ्य छिपी हुई है, उसे जानने का प्रयास करो, अपनी कुण्डलिनीशक्ति को जगा करके देखो। 

साधनाआराधना के पथ पर चलो

माता भगवती आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा की कृपा प्राप्त करने के लिए नशे-मांसाहार से मुक्त चरित्रवान् जीवन जीना ही होगा, पुरुषार्थ और परोपकार के पथ पर चलना ही होगा।

नित्यप्रति साधना-आराधना के पथ पर चलो और अपने कर्त्तव्य का पालन करो। निष्ठा, विश्वास, समर्पण की पराकाष्ठा हासिल करो, तभी तुम्हारे अन्दर ‘माँ’  की चेतना प्रभावक होगी। हर एक के जीवन में गुरु का होना आवश्यक है और वे सौभाग्यशाली होते हैं, जिन्हें एक चेतनावान् गुरु की प्राप्ति होजाए। चेतनावान् गुरु करोड़ों मील दूर रहकर भी अपने शिष्यों को ऊर्जा प्रदान कर सकता है। आज हमारे समाज का दुर्भाग्य है कि चेतनावान्, तपस्वी गुरुओं की कमी होती जा रही है, क्योंकि लोग तप के पथ पर, साधना-आराधना के पथ पर बढ़ना ही नहीं चाहते। माता भगवती आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा की साधना-आराधना से ही समाज अपना कल्याण कर सकता है।

प्राणशक्ति को जगाकर प्राणवान बनें

मैंने सात प्रकार की शक्तियाँ बतलाई हैं। प्राणशक्ति, बुद्धि की शक्ति और मन:शक्ति, ये तीन शक्तियाँ हमारी आन्तरिक शक्तियाँ हैं, जबकि चार बाह्यशक्तियाँ होती हैं- तन की शक्ति, धन की शक्ति, जन की शक्ति और मान-प्रतिष्ठा की शक्ति। यदि हम इन शक्तियों का सदुपयोग करने में सफल होजाएं, तो समाज का कल्याण सहजभाव से होता चला जायेगा।

अपनी प्राणशक्ति को जगा करके हम स्वयं प्राणवान बनें और समाज को प्राणवान बनाने का प्रयास करें। अपनी बुद्धिशक्ति को जगा करके दुर्बुद्धि को समाप्त करें। मन:शक्ति को परमसत्ता के चरणों में लगा करके अपने आपको इतना पवित्र और निर्मल बना लें कि आपके आलोक से समाज में अपवित्रता का नामोनिशान न रह जाए। अपने तन की शक्ति को परोपकार के कार्यों में लगाएं, अनीति-अन्याय-अधर्म के पथ पर न लगाएं। यदि धन की शक्ति प्राप्त हो, तो अपना धन परोपकार के कार्य में लगाएं, अनीति-अन्याय-अधर्म के कार्य में न लगाएं। यदि जनशक्ति प्राप्त हो, तो इस शक्ति को परोपकार के कार्य में लगाएं, आतंकवाद के कार्य में न लगाएं और मान-प्रतिष्ठा की शक्ति प्राप्त हो, तो उससे दूसरे लोगों की मान-प्रतिष्ठा बढ़ाने का कार्य करें। आपका गुरु उसी दिशा में कार्य कर रहा है।

योग के बिना जीवन अधूरा है

योग को प्रमुखता दो, इसके बिना सारा जीवन अधूरा है। योग के माध्यम से अपने शरीर को चैतन्य  बना सकते हो, निरोगी रह सकते हो। योगी बनो तथा कुछ सहज आसन हैं, उन्हें नित्यप्रति करो। संकल्प लेकर चलो कि हमें नित्यप्रति एक घण्टे योग करना है और उस संकल्प के प्रति द्रण  रहो। पूरे घर-परिवार के साथ योग करो और अन्तरूकरण को जगाने के लिए प्राणायाम करो। प्राणशक्ति को चैतन्य  रखोगे, तो 90 प्रतिशत बीमारियों से लड़ सकते हो। अत:  अपनी प्राणशक्ति को जगाओ।

मेरी यात्रा ही चमत्कार है

 मैं चमत्कार नहीं दिखाता, मेरी यात्रा ही चमत्कार है, उस यात्रा को देखो। बचपन से लेकर आज तक की मेरी यात्रा का खाका समाज के पास है। मैंने विश्वअध्यात्मजगत् को बिना किसी गर्व या घमण्ड से अपने तप-बल की यह चुनौती ऐसे ही नहीं दी है। केवल ‘माँ’  के नाम पर असम्भव से असम्भव कार्य को कर सकता हूँ। किसी भी कार्य को करने के लिए विश्व के धर्मगुरु एक पलड़े पर आ जाएं और दूसरे पलड़े पर मैं आ जाऊं और वे जिस कार्य को नहीं कर सकेंगे, वह कार्य मैं करके दिखा दूँगा।

आपके सभी कार्य समाज को दिशा देने वाले हों

आप लोग अपने आहार, विचार और व्यवहार पर ध्यान दें। माता भगवती की आराधना के लिए जीवन को आहार के माध्यम से पवित्र बनाकर रखना बहुत जरूरी है। सात्विक व पवित्र आहार, विचारों और व्यवहार की पवित्रता ही आपको अध्यात्मिक उच्चता की ओर ले जा सकती है। आपमें आक्रामकता न हो, बल्कि रचनात्मक क्षमता हो और आपके सभी कार्य समाज को दिशा देने वाले हों। अपने बच्चों पर अधिकाधिक ध्यान दो, उन्हें बचपन से योग-ध्यान-साधना, मन्त्रजाप के क्रमों में ढाल दो और फिर देखो कि तुम्हारे बच्चे तुम्हारी बात मानते हैं कि नहीं। वे सही रास्ते पर चलेंगे तथा प्रतिभावान बनेंगे।

कभी भी जेहादी मानसिकता से समझौता मत करो

यह काल बुद्ध का नहीं, धर्मयुद्ध का है। पूरे विश्व की मानवता अन्यायी-अधर्मियों से, आतंकवाद से जूझ रही है। आतंक अपना साम्राज्य स्थापित करता जा रहा है। भारतवर्ष के द्वारा पाकिस्तान पर आतंकवादियों के अड्डों पर हमला किया गया, क्योंकि पाकिस्तान के आतंकवादियों के द्वारा अपने परिवार के साथ खुशियाँ मनाने जम्मू-कश्मीर के पहलगाम गए निर्दोष 26 लोगों को गोलियों से भून दिया गया। उसके बाद भारत के पास एक ही विकल्प बचा था कि कठोर कदम उठाया जाए। भारत सरकार ने वह कदम उठाया और आतंकवादियों के अड्डों को तबाह कर दिया। इस अभियान में भारत को अनेक देशों का समर्थन मिला। नेपाल देश का भी सद्भावनापूर्ण संदेश इस अभियान से जुड़ा रहा। 

कभी भी जेहादी मानसिकता से समझौता मत करो। आतंकवाद हर देश के लिए खतरा है। अत:  आतंकवादी मानसिकता का पुरजोर विरोध करो। आज दुर्भाग्य से आतंकवाद और इस्लाम एकस्वरूप बन चुके हैं। आतंक के पर्याय बने लोगों के द्वारा इस्लाम के नाम पर निरीह लोगों को मौत के घाट उतारा जा रहा है और इस्लामिक देशों के द्वारा आवाज तक नहीं उठाई जाती। मैंने कई बार भविष्यवाणी की हैं कि इस्लामिक देशों को बहुत बड़ी क्षति उठानी पड़ेगी और आज मैं वही देख रहा हूँ। वर्तमान में पूरी दुनिया विश्वयुद्ध के काल से गुजर रही है।

युद्ध में वही विजयी होगा, जो

अभी युद्ध रुका हुआ है और फिर होगा, तो उसमें वही विजयी होगा, जो धर्म के साथ खड़ा होगा। अधर्मियों-अन्यायियों, आतंकवादियों को यदि नजरंदाज किया गया, तो सभ्य समाज जी नहीं पायेगा और आतंकवादी मानसिकता के लोगों का साम्राज्य स्थापित होगा, बहन-बेटियों को प्रताड़ना दी जायेगी, उन्हीं के सामने उनकी माँग का सिन्दूर उजाड़ा जायेगा और उनके साथ अत्याचार किया जायेगा। अत:  समाज और सरकार को चाहिए कि आतंकवाद से किसी भी स्थिति-परिस्थिति में समझौता न करें। आतंकवाद को यदि थोड़ा भी प्रश्रय मिला, तो वे समाज के लिए घातक सिद्ध होंगे।

मेरा चिन्तन था कि

भारत में इतनी शक्ति-सामर्थ्य है कि आतंकवादियों को मुंहतोड़ जवाब दिया जा सके और जवाब दिया भी गया है तथा आगे भी जवाब दिया जाता रहेगा। इस शिविर के आयोजन के पहले पाकिस्तान के आग्रह पर शांति समझौता हुआ और युद्ध रोका गया। मेरा चिन्तन था कि  नेपाल का  शिविर शांतिपूर्ण हो।

चिन्तन के उपरान्त शिविरस्थल पर उपस्थित जनसमुदाय ने परम पूज्य गुरुवर और माता भगवती की दिव्य आरती का लाभ प्राप्त किया और क्रमबद्ध होकर सद्गुरुदेव जी महाराज की चरणपादुकाओं को नमन करके प्रसाद प्राप्त करते हुए अन्नपूर्णा भंडारा परिसर की ओर प्रस्थित हुए।

शिविर के द्वितीय दिवस का द्वितीय सत्र

 “सात्विक व पवित्र आहार, विचार और व्यवहार ही हमारे व्यक्तित्त्व व भाग्य का निर्माण करते हैं। हम अपने आहार, विचार और व्यवहार में पवित्रता लाकर भय, चिन्ता और विभिन्न प्रकार के रोगों का निवारण करके अपने जीवन को सुखी व शान्तिमय बना सकते हैं।“

 शिविर के द्वितीय व अन्तिम दिवस का द्वितीय सत्रय दिनांक 17 मई 2025, जयकारों व शंखध्वनि के मध्य अपराह्न 01:30 बजे ऋषिवर सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज का प्रवचनस्थल पर आगमन। सर्वप्रथम शक्तिस्वरूपा बहनों व सिद्धाश्रम चेतनाओं ने पदप्रक्षालन के क्रम को पूर्ण किया, तत्पश्चात् भगवती मानव कल्याण संगठन के कुछ कार्यकर्ताओं ने ‘माँ’ -गुरुवर के श्रीचरणों में स्वरचित भावसुमन प्रस्तुत किए, जिसके प्रारंभिक अंश इस प्रकार हैं: –

जयकारा बोलो गुरुवर की,…- प्रशान्त भण्डारी जी, काठमाण्डो। हर एक घर हो खुशहाल यह प्रार्थना, हो नशामुक्त नेपाल यह प्रार्थना। माँ की ज्योति से रोशन हो जिन्दगानियाँ, हर एक घर हो खुशहाल यह प्रार्थना।।- सौरभ द्विवदी (अनूप भइया) जी, सिद्धाश्रम धाम। वीरेन्द्र दीक्षित जी और बाबूलाल विश्वकर्मा जी ने भी ‘माँ’ -गुरुवर के चरणों में भावसुमन प्रस्तुत करके वातावरण को भक्तिमय कर दिया।

ऋषिवर के दिव्य चिन्तन

शिविरस्थल पर उपस्थित जनसमुदाय और नेपाल राष्ट्र के जनमानस को अपना पूर्ण आशीर्वाद प्रदान करते हुए ऋषिवर सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज धीर-गम्भीर वाणी में कहते हैं-

sadgurudev shree shaktiputra ji maharaj

माता आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा की पावन कृपा के ये क्षण और माता की असीम कृपा के बिना कोई भी सत्य के पथ पर नहीं बढ़ सकता और उन्हीं की असीम कृपा से नेपालवासियों को यह शिविर प्राप्त हुआ। मैं भारत और नेपाल राष्ट्र में कोई भेद नहीं मानता, दोनों देश सगे भाइयों की तरह हैं। भारत की तरह ही नेपाल राष्ट्र भी असम्भव को सम्भव करने वाले ऋषियों-मुनियों की, त्यागी-वैरागियों की धरा है। दोनों देशों की पवित्र धरती सनातन की भूमियाँ हैं, जहाँ सनातन का विराट गौरव स्थापित है। अनेक धार्मिक केन्द्रों से भरपूर ये दोनों देश हैं और यदि ये दोनों देश अपने प्राचीन गौरव को पुन:  स्थापित करने में सफल होजाएं, तो ये पूरे विश्व का मार्गदर्शन कर सकते हैं। चूँकि सनातन में ही पूरे विश्व का कल्याण छिपा हुआ है। सनातन का तात्पर्य है कि जहाँ दया, करुणा, प्रेम, वात्सल्य हो, शौर्य, पराक्रम हो, अनीति-अन्याय-अधर्म का वातावरण न हो, शांति और सुरक्षा के दायित्व का निर्वहन होता हो।

भारत और नेपाल, दोनों देश देवस्थानों से भरपूर हैं। हमें प्रयास करना है कि हम पुन:  अपनी गौरवशाली परम्परा को धारण करें। केवल कह देने मात्र से, केवल सुन लेने मात्र से उस परम्परा की रक्षा नहीं होगी, अपितु परम्परा की रक्षा तब होती है, जब उस परम्परा को हम स्वयं में धारण कर लेते हैं और तभी परिवर्तन आता है। अत:  हमें अपनी गौरवशाली परम्परा को स्वयं धारण करना है और उस पथ पर चलना है कि शक्तिसाधक बन सकें, अच्छा इंसान बन सकें, अच्छे समाजसेवक बन सकें, हममें त्याग-वैराग्य की पराकाष्ठा हो, दया, ममता, करुणा, प्रेम की पराकाष्ठा हो और हमारे अन्दर धर्म, राष्ट्र व मानवता की सेवा की भावना कूट-कूटकर भरी हो तथा नशामुक्त समाज हो। ऐसे ही समाज की स्थापना के लिए भगवती मानव कल्याण संगठन कार्य कर रहा है, समूचे विश्व के कल्याण के लिए कार्य कर रहा है। 

माता भगवती आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा, जिनके हम रजकण हैं। हमारे धर्मग्रन्थ, हमारे ऋषि-मुनि क्या कहते हैं? पूरा ब्रह्माण्ड हमारे अन्दर समाहित है, जन-जन के अन्दर समाहित है। परमसत्ता ने इतना बड़ा सौभाग्य हमें दे रखा है, फिर भी हम असहाय, निरीहता का जीवन जी रहे हों! जहाँ ज्ञान की देवी माता महासरस्वती हों, धन की देवी माता महालक्ष्मी हों, हमारी सुरक्षा करने वाली शक्ति की देवी माता महाकाली हों, फिर भी निरीहता का जीवन! उन शक्तियों का आशीर्वाद लेकरके हम चाहें, तो पुन:  अपनी गौरवशाली परम्परा को धारण कर सकते हैं। हम भूल गए ब्रह्मा, विष्णु और शिव की आराधना को और इसीलिए समाज का पतन होना प्रारम्भ होगया। जब हम मूल को भुला देते हैं, मूल की आराधना बन्द कर देंगे, तो क्या होगा? जैसे हम ऊपर की ओर पेड़-पौधों की रक्षा करते रहें, लेकिन उनकी जड़ों में पानी न दें, तो पेड़ सूखने लगेंगे।

कैसे जाग्रत् होंगी अन्तर्शक्तियाँ ?

सबसे बड़ा दुर्भाग्य यही है कि न हम ब्रह्मा की आराधना करना चाहते हैं, न विष्णु की आराधना करना चाहते हैं, न शिव की आराधना करना चाहते हैं, न माता महासरस्वती की आराधना करना चाहते हैं, न माता महालक्ष्मी की आराधना करना चाहते हैं, न माता महाकाली की आराधना करना चाहते हैं और जो इन सबकी जननी हैं माता भगवती आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा, उनको भुला बैठे हैं! अरे, ये हमारी आत्मा की मूल जननी हैं, जो अजर-अमर-अविनाशी सत्ता हैं और वे ही हमारी मूल इष्ट हैं।

जब हम अपनी मूल इष्ट को भुला देंगे, अपनी आत्मा की जननी को भुला देंगे, तो सोचिए कि हमारा जीवन कैसा होगा? हमारे अन्दर जो निखिल ब्रह्माण्ड समाहित है, अलौकिक शक्तियाँ समाहित हैं, उन्हें कैसे जाग्रत् करोगे? केवल माता भगवती आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा की आराधना के द्वारा ही जाग्रत् कर सकते हैं। उनकी आराधना से ही हमारी कोशिकाएं, हमारे कुण्डलिनी चक्र जाग्रत् होंगे। उनकी आराधना में ही हमारी सभी समस्याओं का समाधान निहित है। जब हम परमसत्ता की आराधना के पथ पर चलते हैं, तो हमारा एक-एक पल हमें शान्ति, संतोष और तृप्ति देता चला जाता है, हमारा बहुमुखी विकास होता है, हमारी अन्तर्चेतना में विशेष ऊर्जा का संचार होने लगता है।

समाज साधना पथ पर चलना ही नहीं चाहता

आज समाज किस दिशा में जा रहा है? वह साधनापथ पर चलना ही नहीं चाहता, अनीति-अन्याय-अधर्म करने में लिप्त है, विकारों में रस लेना चाहता है और जब हम ऐसा करने लग जाते हैं, तो हमारा पतन होना सुनिश्चित है। हमें रस कहाँ से प्राप्त होना चाहिए? बाह्य पदार्थों से या अपने अंदर से। अन्दर से हमें रस तभी प्राप्त होगा, जब हम साधनापथ पर चलेंगे। असली आनन्द तो हमें हमारी सुषुम्ना नाड़ी देती है। जब हम अपने आज्ञाचक्र को जाग्रत् करने में सफल होजाते हैं, तो अमृत रस का पान करने जैसी अनुभूति होती है और तब बाहर के नाच-रास-रंग, विषय-विकार, ये सभी तुच्छ नजर आते हैं।

हमें अपनी आत्मा के अनुकूल जीवन जीना है

शक्तिसाधक बनो, तपस्वी बनो। अध्यात्मिक सम्पदा हासिल कर लोगे, तो वह पूँजी आपके इस जन्म में भी काम आएगी और नवीन जन्म में भी तुम्हारे काम आयेगी, जबकि भौतिक सम्पदा यहीं की यहीं धरी रह जाती है। अत:  माता भगवती की साधना-आराधना को अपने जीवन का अंग बना लो। हम निर्मल पवित्र आत्मा हैं, हमें आत्मा के अनुकूल जीवन जीना है। हमारी बाह्य सामर्थ्य कितनी है, यह महत्त्वपूर्ण नहीं है, अपितु हमारे अन्दर की सामर्थ्य कितनी है, यह महत्त्वपूर्ण है और अन्दर की सामर्थ्य परमसत्ता की साधना-आराधना से ही बढ़ सकती है।

मैंने अपने संकल्पित 108 महाशक्तियज्ञों की शृंखला के आठ यज्ञों में असम्भव से असम्भव कार्य करके समाज को दिखाए हैं। चाहे हर यज्ञ में बरसात होने की बात हो, चाहे असाध्य से असाध्य रोगी को ठीक करने की बात हो, या एक स्थान से दूसरे स्थान पर हजारों मील दूर क्या हो रहा है, उसकी जानकारी देने की बात हो, यह सबकुछ समाज के सामने किया गया है। माता भगवती आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा की कृपा से ऐसा कोई भी कार्य नहीं है, जो मैं न कर सकूं। जिस तरह का जीवन मैं जीता हूँ, मैं चाहता हूँ कि मेरे शिष्य भी वैसा जीवन जिएं और समाज के मार्गदर्शक बनें।

धर्म, धैर्य और पुरुषार्थ का कभी त्याग करें

अपने जीवन में तीन बातों का हमेशा ध्यान रखें और उनका कभी त्याग न करें। जीवन का कोई मोड़ आ जाए, कोई परिस्थिति आ जाये, अगर उन तीन बातों का त्याग नहीं करोगे, तो निश्चित रूप से हर समस्या का समाधान प्राप्त कर लोगे और वे हैं-धर्म, धैर्य एवं पुरुषार्थ। किसी भी परिस्थिति में अपने धर्म का त्याग मत करो, उस पर जीवन की अन्तिम सांस तक अडिग रहो और यदि तुमने अपने जीवन में धैर्य को धारण कर लिया, तो हर कार्य में सफलता मिलना सुनिश्चित है। इसी प्रकार जीवन के अन्तिम समय तक जीवन में चाहे कैसी भी परिस्थिति आ जाए, अपने पुरुषार्थ के साथ उस परिस्थिति का सामना करो। पुरुषार्थी बन करके जीवन जियो, अन्तिम क्षणों तक लड़ना सीखो, अन्तिम क्षणों तक संघर्ष करो। अगर तुम्हारे अन्दर ये क्षमताएं आ गईं, तो किसी भी क्षेत्र में तुम पराजित नहीं हो सकते।

हमें स्वयं पर विजय पाना है

हमें विजेता बनना है, स्वयं पर विजय पाना है कि हम अपने विचारों पर विजय हासिल कर सकें, अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण प्राप्त कर सकें, जिससे हमारी इच्छा के विरुद्ध हमारी इन्द्रियां कार्य न कर सकें और तभी हम अपने आपको विजेता कह सकते हैं। नित्य शुद्ध सात्विक आहार करके, अपने मन में पूर्णरूपेण सात्विक विचारों को स्थान दे करके, अपने व्यवहार में मृदुलता लाकरके पूर्ण विजेता बनने का प्रयास करो। माता आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा की कृपा से कोई भी कार्य असम्भव नहीं है। पुरुषार्थी, परोपकारी जीवन जियो तथा आप लोगों को सरल से सरल जो साधना बताई गई है, उसे करो। सहजभाव से तुम्हारे जीवन में परिवर्तन आता चला जायेगा।

बच्चों के स्वास्थ्य की रक्षा के प्रति सजग रहें

राष्ट्र की रक्षा के लिए, धर्म की रक्षा के लिए नशामुक्ति का व्यापक अभियान चलाओ। मोबाइल के भंवरजाल से बाहर निकलो तथा जितना आवश्यक हो, उतना ही मोबाइल का उपयोग करें। बच्चों को मोबाइल का उपयोग करने ही न दो, उन्हें अच्छी शिक्षा दो, खेल-कूद से जोड़ो, योग-ध्यान-साधना की विधा से जोड़ो। यदि किसी राष्ट्र का समाज चेतनावान् नहीं है, तो वह राष्ट्र पतन में जायेगा ही। हर माता-पिता के अपने बच्चों के प्रति तीन ही मुख्य कर्त्तव्य हैं- स्वास्थ्य, शिक्षा और धर्माचरण।    

 आपके बच्चों का स्वास्थ्य अच्छा रहे, इसके लिए उनके आहार पर ध्यान दो। उनकी अच्छी शिक्षा की व्यवस्था में अपनी पूरी क्षमता लगा दो और उन्हें बचपन से धर्माचरण सिखाओ, संस्कारवान बनाओ। यदि आपने अपने बच्चों को ये तीन चीजें उपलब्ध करा दीं, तो फिर उनके लिए धन-दौलत एकत्रित करने की जरूरत नहीं। वे आपसे ज्यादा धन कमाने की सामर्थ्य प्राप्त कर लेंगे और यदि ये तीन चीजें उन्हें नहीं दे सके, तो करोड़ों-अरबों की भी सम्पत्ति दे दोगे, तो वे गलत रास्ते पर जाकर आपकी पूरी सम्पदा नष्ट कर डालेंगे।

नशामुक्त समाज का निर्माण करना हमारा प्रथम दायित्व है

आज जितने अपराध हो रहे हैं, नशे के कारण हो रहे हैं, अत: नशामुक्त समाज का निर्माण करना हमारा प्रथम दायित्व है। जितनी दुर्घटनाएं हो रही हैं, जितनी बीमारियाँ हो रही हैं, जितना अपराध बढ़ रहा है, आएदिन बलात्कार की घटनाएं हो रही हैं, इन सबके पीछे 90 प्रतिशत नशा है। अत:  मेरा आप सभी से, सरकारों से आवाहन है कि यदि अपने समाज को, अपने राष्ट्र को उन्नति के पथ पर ले जाना है, तो राष्ट्र को नशामुक्त बनाओ, फिर देखो कि समाज में कितना बड़ा परिवर्तन आता है।“

सद्गुरुदेव जी महाराज ने उपस्थित शिष्यों-भक्तों को जीवनोपयोगी अतिमहत्त्वपूर्ण 11 संकल्प दिलाए, जिन्हें सभी ने दोनों हाथ उठाकर मन-वचन-कर्म से धारण किया।

परम पूज्य गुरुवरश्री के शिष्यों-भक्तों ने लिये 11 संकल्प

‘मैं संकल्प करता हूँ कि मैं नशे-मांसाहार से मुक्त चरित्रवान्, चेतनावान्, परोपकारी एवं पुरुषार्थी जीवन जियूंगा।

‘मैं मानवता की सेवा, धर्मरक्षा एवं राष्ट्ररक्षा के लिए अपने जीवन को समर्पित करूंगा।

‘मैं गौसेवा और गौसंरक्षण के लिए अपने जीवन को समर्पित करूंगा।

‘मैं पर्यावरण की रक्षा के लिए वृक्षारोपण को बढ़ावा देते हुए स्वयं वृक्षारोपण करूंगा एवं उन्हें संरक्षित करूंगा।

‘मैं जातिभेद, छुआछूत को दूर करके समाज में सद्भावनापूर्ण वातावरण बनाऊंगा।

‘मैं धर्मद्रोहियों, राष्ट्रद्रोहियों व राष्ट्र की सम्पत्ति को किसी प्रकार से नु$कसान पहुँचाने वालों का कभी भी सम्मान नहीं करूंगा और उनके विरुद्ध खुलकर आवाज उठाऊंगा। 

‘मैं भगवती मानव कल्याण संगठन के सभी जनजागरण कार्यक्रमों में पूर्ण मर्यादा, अनुशासन एवं नियमों-निर्देशों का पालन करूंगा।

‘मैं किसी भी खाद्यपदार्थ में कभी भी मिलावट नहीं करूंगा और मिलावट करने वाले लोगों को $कानून के दायरे में लाकर सजा दिलाऊंगा।

‘मैं नारी की रक्षा के लिए, नारी के सम्मान के लिए अपने जीवन को समर्पित करूंगा।

‘मैं माता-पिता एवं वृद्धजनों का सदैव सम्मान करूंगा और माता-पिता को कभी भी अनाथालय में या निराश्रित नहीं छोड़ूंगा।

‘मैं कभी भी, किसी भी परिस्थिति में आत्महत्या नहीं करूंगा और न किसी की हत्या करूंगा।

इन संकल्पों को सदैव जीवन में धारण करके रखो। ये सनातन की हमारी दिशाधारा है। संकल्पों से जब हम अपने आपको आबद्ध करके रखेंगे, तो परमसत्ता की कृपा सदैव बरसती रहेगी।

पशुपतिनाथ मंदिर में दर्शन करके भक्तो को आशीर्वाद प्रदान करते हुए सदगुरुदेव जी महाराज

परम पूज्य सद्गुरुदेव परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज के चिन्तन के उपरान्त शक्तिस्वरूपा बहनों व सिद्धाश्रम चेतनाओं ने दिव्यआरती का क्रम पूर्ण किया। इसके पश्चात् शिविरस्थल पर ‘माँ’ -गुरुवर के भावगीतों एवं जयकारों के मध्य उपस्थित सभी शिष्यों-भक्तों ने गुरुचरणपादुकाओं को स्पर्श करके प्रसाद प्राप्त किया और अन्नपूर्णा भण्डारे की ओर प्रस्थित हुए।

शिविर के प्रथम दिवस, दिनांक 16 मई के प्रथम सत्र में प्रात:  07:30 बजे से 09:00 बजे तक भक्तों ने शक्तिस्वरूपा बहन पूजा शुक्ला जी, संध्या शुक्ला जी और ज्योति शुक्ला जी के सान्निध्य में योग-ध्यान-साधना के क्रमों को सम्पन्न किया।

इस अवसर पर ‘माँ’  के चेतनामंत्र और योग के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए शक्तिस्वरूपा बहन संध्या शुक्ला जी ने कहा कि “ नित्यप्रति मंत्र का जाप करने से मन एकाग्र होता है और हर प्रकार के विकारों से मुक्ति मिलती है। इसी तरह योगासन करने से शरीर व मन-मस्तिष्क स्वस्थ रहते हैं और स्वस्थ मनुष्य ही अपने कर्त्तव्यों का निर्वहन अच्छी तरह कर सकता है। योगपथ पर चलने के लिए योग के प्रति पूर्ण निष्ठा, विश्वास और समर्पण की आवश्यकता होती है। यदि शरीर में चौतन्यता नहीं है, तो कार्यक्षमता प्रभावित होती है और छोटी-छोटी बातों में तनाव आ जाता है। इससे बचने व कर्मपथ पर आगे बढ़ने के लिए योग विधाओं को अपनाना अतिआवश्यक है।“ बहन संध्या शुक्ला जी ने सरल शब्दों में योग के विभिन्न आसनों व ध्यान-साधना के बारे में भी बतलाया।

शक्तिस्वरूपा बहन पूजा जी, संध्या जी, ज्योति जी व सिद्धाश्रम चेतना आरुणी जी, अद्वैत जी और आत्रेय जी के द्वारा उपस्थित समस्त भक्तों की ओर से सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र महाराज जी एवं माता भगवती श्री दुर्गा जी की दिव्यआरती सम्पन्न की गई। उस समय का वातावरण अत्यंत ही भक्तिमय था। शिविर के दोनों दिवस इस दिव्यआरती का लाभ उपस्थित अपार जनसमुदाय ने प्राप्त किया।

शिविर के द्वितीय दिवस का प्रथम सत्र लगभग एक हजार नए भक्तों ने ली गुरुदीक्षा

शिविर के द्वितीय व अन्तिम दिवस का प्रथम सत्र। लगभग एक हजार नए भक्तों ने ऋषिवर सद्गुरुदेव परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज से दीक्षा लेकर नशे-मांसाहार से मुक्त चरित्रवान् जीवन जीने व सत्यधर्म की राह पर चलने तथा धर्मरक्षा, राष्ट्र की रक्षा और मानवता की सेवा करने का संकल्प लिया।

 दिव्य मंच स्थल पर प्रात:  08:00 बजे से गुरुदीक्षा का कार्यक्रम प्रारम्भ हुआ। इस अवसर पर नये भक्तों ने गुरुदीक्षा प्राप्त करके अपने जीवन में परिवर्तन का नया आयाम जोड़ा। दीक्षा प्रदान करने से पूर्व नए भक्तों को शिष्य रूप में हृदय में धारण करके उन्हें अध्यात्मिक ज्ञानामृत का पान कराते हुये सद्गुरुदेव जी महाराज ने चिन्तन दिया कि “मानवजीवन में दो क्षण महत्त्वपूर्ण होते हैं। एक तब, जब वह जन्म लेता है और दूसरा जब किसी चेतनावान् गुरु से दीक्षा लेता है और यहीं से उसकी अध्यात्मिक उन्नति प्रारम्भ होती है। एक चेतनावान् गुरु अपने शिष्यों का केवल आत्मकल्याण चाहता है। जरूरत है तो केवल गुरु के द्वारा बताए गए मार्ग पर शिष्य का चलते रहना। गुरु आपका है और आप गुरु के हैं। यदि यह रिश्ता बनाए रखेंगे, तो सदैव कल्याण होगा और मेरी नित्यप्रति की साधना आपको चेतनावान् बनाती रहेगी।“

माँ अन्नपूर्णा भंडारे में प्रसाद प्राप्त करते हुए माँ भक्त

चिन्तन के पश्चात, परम पूज्य गुरुवरश्री ने कहा कि “मैं शक्तिपात के माध्यम से सभी को अपनी चेतना से आबद्ध करते हुय स्वीकार करता हूँ।“ आपश्री ने सहायक शक्तियों हनुमान जी, भैरव जी एवं गणेश जी के मंत्र के साथ चेतनामंत्र ‘ॐ’ जगदम्बिके दुर्गायै नम: एवं गुरुमन्त्र ‘ॐ’ शक्तिपुत्राय गुरुभ्यो नम: प्रदान किया। अन्त में सभी ने गुरुचरणपादुकाओं को प्रणाम करके विघ्नविनाशक शक्तिजल प्राप्त किया।

अन्नपूर्णा भण्डारे में शिविरार्थियों ने ग्रहण किया खिचड़ी प्रसाद

नेपाल शिविर में पहुंचने वाले माता जगदम्बे के भक्तों के लिए सुबह-शाम भोजन प्रसाद की विशेष व्यवस्था अन्नपूर्णा भोजनालय में रही। सभी भक्तों ने दोनों समय भोजनालय परिसर में पंक्तिबद्ध रूप से बैठकर तृप्तिपूर्वक खिचड़ी प्रसाद को ग्रहण किया।

शिविर व्यवस्था में नेपाल के कार्यकर्ताओं ने किया अथक परिश्रम

  शिविर के विशाल आयोजन को सम्पन्न कराने में भगवती मानव कल्याण संगठन की शाखा-नेपाल के कार्यकर्त्ताओं का अभूतपूर्व योगदान रहा। एक माह पूर्व से ही व्यवस्था को सुचारुता प्रदान करने के लिए वे दिन-रात जुटे रहे। यह उनकी सक्रियता और सतर्कता का ही परिणाम था कि शिविर सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। कार्यकर्त्ताओं ने श्रद्धालुओं को ठहरने हेतु जहां आवासीय व प्रवचन पंडाल की व्यवस्था प्रदान की, वहीं शिविर के दोनों दिवस सुबह-शाम लाखों भक्तों को निरूशुल्क भोजन कराया। नेपाल शाखा के कार्यकर्त्ताओं की जितनी भी प्रशंसा की जाये, कम ही होगी। 

गणमान्य नागरिकों, जनप्रतिनिधियों, राजनेताओं और पत्रकारों से मिलने का क्रम

द्विदिवसीय शिविर सम्पन्न होने के बाद सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज ने दिनांक 18 मई को प्रात:  09 बजे भगवान् पशुपतिनाथ जी के मंदिर पर पहुंचकर दर्शन प्राप्त किए। परम पूज्य गुरुवरश्री के साथ पूजनीया शक्तिमयी माता जी, शक्तिस्वरूपा बहनों, सिद्धाश्रम चेतनाओं और शिष्यों की उपस्थिति उल्लेखनीय रही। इसके बाद परम पूज्य गुरुवरश्री ने सुबह 11 बजे से दोपहर 12:30 बजे तक नेपाल के गणमान्य नागरिकों, जनप्रतिनिधियों, राजनेताओं आदि से मिल करके उन्हें आशीर्वाद प्रदान किया। साथ ही नेपाल के पत्रकारों की जिज्ञासाओं का समाधान करते हुए उन्हें भी आशीर्वाद देकर कृतार्थ किया। तत्पश्चात् नेपाल के कार्यकर्ताओं को भी दिशा-निर्देशन प्राप्त करने का अवसर मिला।

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