सच्चिदानंदस्वरूप ऋषिवर सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज के दर्शन पाकर धन्य हुए भक्तगण
आध्यात्मिक नवजागरण से ही वर्तमान की उस ध्वंसलीला से मुक्ति मिल सकती है, जिसकी ओर नशा, विषय-विकारों व भौतिकता से ग्रसित मनुष्य पतन की ओर बढ़ता जा रहा है। मानव की नैतिक और आध्यात्मिक प्रकृति के प्रति प्रबल आग्रह में ही वर्तमान युग के उद्धार की आशा निहित है।
जो लोग अपनी काया, वाणी और चित्त से दुराचरण करते हैं, सही मायने में उन्हें अपने आपसे, अपने ‘मैं’ से, अपनी आत्मा से प्रेम नहीं है और जो अपनी काया, वाणी और चित्त से सदाचरण के पथ पर अग्रसर रहते हैं, सही मायने में वे ही अपने आपसे, अपने ‘मैं’ से, अपनी आत्मा से प्रेम करते हैं और ऐसे लोग ही ऋषिवर सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज के चिन्तनों को आत्मसात करके कलिकाल की भयावहता से स्वयं के साथ परिवार, समाज व देश को मुक्ति दिला सकते हैं।

शक्तिपीठ के रूप में स्थापित पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम धाम पर सिद्धाश्रम स्थापना दिवस पर्व के उपलक्ष्य में दिनांक 22-23 जनवरी 2026 को सम्पन्न 133वें द्विदिवसीय शक्ति चेतना जनजागरण ‘योग साधना’ शिविर में धर्मसम्राट् युग चेतना पुरुष सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज के शिष्यों-भक्तों व सनातनप्रेमियों का ऐसा प्रवाह उमड़ा कि सम्पूर्ण प्रकृति अंगड़ाई लेने लगी, प्राकृतिक वातावरण में नवीनता दृष्टिगत होने लगी।
शिविर के दोनों दिवस जहाँ शिविरस्थल पर उपस्थित लाखों भक्तों ने सद्गुरुदेव जी महाराज के अमृतमयी वचनों का रसपान कर अध्यात्मपथ पर बढ़ने व मानवता की सेवा, धर्मरक्षा और राष्ट्ररक्षा के लिए दृढ संकल्प लिया, वहीं प्रथम दिवस के प्रथम सत्र में शक्तिस्वरूपा बहनों-पूजा जी, संध्या जी और ज्योति जी के सान्निध्य में योग-ध्यान-साधनाक्रम को पूर्ण किया। इतना ही नहीं, सभी ने दो दिव्य आरतियों का भी लाभ प्राप्त किया। शिविर के द्वितीय दिवस के प्रथम सत्र में 08 हज़ार से अधिक नए भक्तों ने परम पूज्य सद्गुरुदेव जी महाराज से दीक्षा लेकर नवीन जीवन में पदार्पण किया।
शिविर की व्यवस्था में भगवती मानव कल्याण संगठन के हज़ारों स्वयंसेवी कार्यकर्ताओं ने, जहाँ समस्त भक्तों, श्रद्धालुओं को सुबह-शाम भोजन कराया, वहीं जनसम्पर्क कार्यालय, नि:शुल्क शक्तिजल वितरण केन्द्र, नि:शुल्क प्राथमिक चिकित्सा केन्द, वस्त्र समर्पण एवं सहायता केन्द्र, मीडिया कार्यालय, खोया-पाया विभाग एवं सभी आगन्तुक भक्तों के ठहरने के लिए आवासीय पंडाल एवं प्रवचनस्थल की व्यवस्था हेतु अथक परिश्रम किया।
शिविर के दोनों दिवसों में नित्यप्रति की तरह सर्वप्रथम ब्रह्ममुहूर्त में भक्तजन मूलध्वज साधना मंदिर पर पूजनीया शक्तिमयी माता जी के करकमलों से सम्पन्न होने वाले आरतीक्रम में शामिल होने के पश्चात् श्री दुगार्चालीसा अखण्ड पाठ मंदिर में पहुंचकर माता जगदम्बे के गुणगान में सम्मिलित हुये, जहाँ परम पूज्य सद्गुरुदेव जी महाराज के द्वारा प्रात: 06 बजे स्वयं उपस्थित होकर आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा व सहायक शक्तियों की पूजा-अर्चना, आरती तथा ध्यान-साधना करने के उपरान्त, मूलध्वज साधना मन्दिर पहुंचकर मानवता के कल्याण की कामना सृष्टा माता भगवती आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बे से की। उक्त साधनात्मक क्रमों के बाद प्रात: 07:30 बजे सभी भक्तों ने शिविर पण्डाल में पहुंचकर शक्तिस्वरूपा बहनों के सान्निध्य में योग-ध्यान-साधना के क्रम को एकाग्रतापूर्वक पूर्ण किया।

ज्ञातव्य है कि भगवती मानव कल्याण संगठन एवं पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम ट्रस्ट के सदस्यों व कार्यकर्ताओं के द्वारा सिद्धाश्रम धाम के विशाल परिसर में अथक परिश्रम करके अत्यन्त ही आकर्षक व भव्य मंच तथा वृहदाकार प्रवचन पंडाल का निर्माण किया गया था, जहाँ दो दिवस तक प्रतिदिन निर्धारित समय पर अपराह्न बेला से परम पूज्य सद्गुरुदेव जी महाराज के श्रीमुख से आत्मचिंतन की वर्षा होती रही। चिन्तन के पश्चात् भक्तों ने दिव्य आरती से उत्सर्जित अलौकिक ऊर्जा का लाभ प्राप्त किया।
प्रथम दिवस का द्वितीय सत्र
शक्ति चेतना जनजागरण ‘योग साधना’ शिविर का प्रथम दिवस, विशाल प्रवचन पंडाल अपार जनसमुदाय से खचाखच भरा हुआ था और सभी अनुशासित रूप से पंक्तिबद्ध बैठे हुये थे। सभी की आँखें सद्गुरुदेव जी महाराज के आगमन की प्रतीक्षा में बिछी हुई थीं, तभी निर्धारित समय में अपराह्र 02:00 बजे आपश्री के पदार्पण के साथ ही सम्पूर्ण वातावरण जयकारों, शंखध्वनि व तालियों की गड़गड़ाहट से गुंजायमान हो उठा। गुरुवरश्री के मंचासीन होते ही सर्वप्रथम बहन पूजा जी, संध्या जी, ज्योति जी एवं सिद्धाश्रम चेतनाओं के द्वारा समस्त भक्तों की ओर से गुरुवरश्री का पदप्रक्षालन करके पुष्प समर्पित किए गए। तत्पश्चात् कुछ शिष्यों ने भक्तिरस से परिपूर्ण भावगीत प्रस्तुत किये, जिसके मुख्य अंश इस प्रकार हैं:—
सारी दुनिया में हमने देख लिया, माँ के जैसा कोई दरबार नहीं- जमुना जी, सागर। हे दु:खहारी करते दूर दु:ख, शीतलता देने जन-जन को, स्वयं चले अंगारों पर-बाबूलाल विश्वकर्मा जी, दमोह। कार्यक्रम का संचालन करते हुए भगवती मानव कल्याण संगठन के केन्द्रीय प्रचारमंत्री वीरेन्द्र दीक्षित जी के द्वारा गुरुचरणों पर प्रस्तुत भावसुमन-गुरुवर के दरश पाकर हम धन्य होगए, आशीष पाकर प्यारा हम प्रसन्न होगए।

भावगीतों की प्रस्तुति के पश्चात् शक्तिस्वरूपा बहन संध्या शुक्ला जी ने सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज की महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि ‘‘हमारे धर्मशास्त्रों में, वेदों में, पुराणों में उद्धृत है कि साधु सन्तों के, ऋषियों के दर्शन प्राप्त होजाएं, मंदिरों में स्थापित दिव्य चेतनाओं की प्रतिमाओं के दर्शन होजाएं, तो अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है और पूर्व के पाप नष्ट होजाते हैं। तो भाईयों-बहनों, हमारे सामने स्वयं सच्चिदानंदस्वरूप ऋषियों के ऋषि श्री शक्तिपुत्र जी महाराज साक्षात बैठे हैं और मैं आप लोगों को विश्वास दिलाती हूँ कि उनका दर्शन करते ही आपके द्वारा जो पूर्व में पाप हुए होंगे, सब क्षय हो चुके हैं, आपके सभी पाप नष्ट होगए हैं।
जन्मों-जन्मों में एक ऋषि की यात्रा प्राप्त होती है, किसी चेतनावान् गुरु की यात्रा प्राप्त होती है और हमारे लिए यह परम सौभाग्य की बात है कि हमें ऐसे गुरुवर प्राप्त हुए हैं, जिन्होंने अपने तप, त्याग, ध्यान, साधना और पुरुषार्थ से ऐसे शक्तिसाधक, शक्तिसाधिकाएं तैयार किए हैं, जो समाज में परिवर्तन लाने के लिए, समाज को चेतनावान् बनाने के लिए सतत प्रयासरत हैं। आओ इस आध्यात्मिक यात्रा से जुड़ जाओ। यह यात्रा अहंकार का त्याग करने और समर्पण की यात्रा है और यह यात्रा आपको संस्कारवान, धर्मवान व कर्मवान बनाएगी। यह यात्रा समाज को नशे-मांसाहार से मुक्त चरित्रवान् व चेतनावान् बनाने की यात्रा है, योग-ध्यान-साधना और आयुर्वेद के माध्यम से आपको स्वस्थ व जीवंत बनाए रखने की यात्रा है।
परम पूज्य सद्गुरुदेव जी से यही कामना करें कि हे गुरुदेव, हमें भक्ति, ज्ञान और आत्मशक्ति का आशीर्वाद प्रदान करें।’’
ऋषिवर के दिव्य चिन्तन
‘माँ’-ॐ बीजमंत्रों के उच्चारण के पश्चात् ऋषिवर सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज ने उपस्थित शिष्यों-भक्तों, श्रद्धालुओं, कार्यकर्ताओं, देशवासियों व विश्व के धर्मप्रेमी जनमानस को आशीर्वाद प्रदान किया और आपश्री की वाणी मुखरित हो उठी—
‘‘आप लोगों को यह समझना चाहिए कि जीवन का हर पल महत्त्वपूर्ण होता है, अत: प्राप्त समय को व्यर्थ न गवाएं। समय कोई अच्छा या बुरा नहीं होता, बल्कि अच्छा या बुरा इस बात पर निर्भर करता है कि आप अपने समय का सदुपयोग कर रहे हैं या दुरुपयोग। यदि आप चाहें, तो अच्छे कर्मों के द्वारा अपने समय के हर पल को सदुपयोगी बना सकते हैं। यह समय आध्यात्मिक विचारधारा पर चलने वालों के लिए अत्यन्त शुभ व कल्याणकारी है, अत: साधनापथ पर चलें, समय का सदुपयोग करें और अपने जीवन को सुन्दर व सुखद बना लें।
जिस विचारधारा पर आप लोगों को बढ़ाया जा रहा है, निष्ठा विश्वास के साथ उस विचारधारा को कर्मरूप में परिणत करें। जीवन में यदि कुछ प्राप्त करना है, तो केवल आशीर्वाद से प्राप्त नहीं होगा, अपितु उसके लिए कर्म करना पड़ेगा, प्रयास करना पड़ेगा। यद्यपि आशीर्वाद मिलना ज़रूरी है, विश्वास का फल प्राप्त होता है, मगर विश्वास के साथ प्रयास की आवश्यकता है। आप प्रयास न करें और केवल विश्वास को लेकर बैठ जाएं कि हम तो ‘माँ’ के भक्त हैं, गुरुवर के शिष्य हैं, हमें क्या करना? बस हम गुरुवर का स्मरण करते रहें, हमारा जीवन बदल जायेगा, तो यह सम्भव नहीं है। कुछ पाने के लिए प्रयास करना ही पड़ेगा।

हमारे समाज का सतत पतन इसीलिए हुआ कि कर्म को महत्त्व नहीं दिया गया, पुरुषार्थ को महत्त्व नहीं दिया गया। अपने जीवन को बदलना होगा, धर्ममय और कर्ममय बनाना होगा। कलिकाल के प्रभाव से आप लोग इन्द्रियों के ग़ुलाम बन चुके हो और यह ग़ुलामी पतन की ओर केवल पतन की ओर ले जायेगी। आज जो संघर्ष आपके जीवन में हैं, यदि यही चलता रहा, तो आपकी संतति को और कठिन संघर्ष सहने पड़ेंगे। इस संघर्ष से निकल सकते हो, अपनी संतति को भीषण संघर्ष से बचा सकते हो और इसके लिए आपको एक विचारधारा दी गई है, जिसका पालन करने की आवश्यकता है।
योग से आपका जीवन बदल सकता है, लेकिन एक दिन योग करने से कुछ नहीं होने वाला, अपितु इसे सतत अपनाने की ज़रूरत है। हमारे शरीर में निखिल ब्रह्मांड समाहित है, फिर भी दीन-हीनों का जीवन जी रहे हो! अनीति-अन्याय-अधर्म के बीच ऐसे फंस गए हो कि अपने आपको उसमें समाहित सा महसूस करते हो। झाड़-झंखाड़ों के बीच कोई खिला हुआ पुष्प नज़र नहीं आता, मगर यदि हम वहाँ भी चाहें, तो पुष्प खिला सकते हैं, वहाँ पुष्पमय बगिया बन सकती है, केवल एक प्रयास की ज़रूरत है।
आप लोगों को जो आत्मावान बनाने की यह यात्रा चल रही है, उसमें रच-बस जाओ। यदि मैं भी चाहूं, तो धर्मशास्त्रों को लेकरके, वेद-पुराणों को लेकरके किस्से-कहानियाँ सुनाता रहूं, मगर मैंने माता भगवती आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा के चरणों के पास बैठ करके उस रास्ते का चयन किया, जिस रास्ते पर चल करके समाज का कल्याण किया जा सकता है। समाज को वर्तमान में किस्से-कहानियों की आवश्यकता नहीं है, अपितु तपस्वी बनाने की, साधक बनाने की आवश्यकता है, जिससे सामाजिक जीवन में परिवर्तन आ सके। मानवजीवन की उम्र घटती जा रही है, शारीरिक क्षमताएं घटती जा रही हैं, बौद्धिक क्षमताएं घटती जा रही हैं, अनीति-अन्याय-अधर्म का साम्राज्य चारों तरफ फैलता चला जा रहा है और यदि इस साम्राज्य को समाप्त करना है, तो सत्य की यात्रा तय करनी ही पड़ेगी।
अधिकांश कथावाचक हैं कि उन्हें इससे कोई मतलब ही नहीं है, वे तो ढोंग-पाखंड में रचे-बसे हुए हैं, उन्हें केवल पैसों की भूख है, सम्मान की भूख है! लेकिन आपके गुरु ने इसके विपरीत रास्ते का चयन किया है, अग्नि के पथ का चयन किया है, साधना के पथ का चयन किया है, आवश्यकता न होते हुए भी अपने जीवन को तपाया है, जिससे मैं समाज को बता सकूं कि मेरा साधनात्मक जीवन है। अन्यथा, आपके गुरु ने विश्वअध्यात्मजगत् को अपने साधनात्मक तप-बल की चुनौती दी है कि सभी साधु-संत-संन्यासी एक पक्ष में आकर खड़े होजाएं और ‘माँ’ का यह रजकण एक पक्ष में खड़ा होने के लिए तैयार है। वे दुनियाभर के जितने चमत्कार दिखाते हैं, उनसे सैकड़ों गुना अधिक चमत्कार मैं दिखा दूंगा। एक स्थान पर रह करके दुनिया के किसी कोने की जानकारी देने की बात हो, या किसी को डॉक्टरों ने कह दिया हो कि इसे नहीं बचाया जा सकता, तो ‘माँ’शक्ति के बल पर उसे निरोगी काया प्रदान कर सकता हूँ।
यदि आपका गुरु भी चाहता तो मान-सम्मान भोगने के रास्ते का चयन कर सकता था और वहीं साधु-संत-संन्यासी मेरे चरणों में झुके हुए होते, मगर मेरा यह रास्ता था ही नहीं। मैंने एकान्त साधनाओं को ज़्यादा महत्त्व दिया और एक के बाद एक साधनाओं को पूर्ण किया। चूँकि मैं जानता था कि समाज को दिशा देनी पड़ेगी और तभी लोगों के जीवन में परिवर्तन आ सकेगा। हमारी यात्रा लम्बी है, लेकिन मैं अपने शिष्यों को खजूर के पेड़ की तरह नहीं बढ़ाना चाहता, बल्कि उन्हें वटवृक्ष बनाना चाहता हूँ। एक ऐसा वटवृक्ष, जिसकी जड़ों को गिनने वाले गिनते रहें, मगर गिन ही न पाएं कि कहाँ से प्रारम्भ हुआ है और कहाँ पर अन्त है?
शाश्वत सुख क्या है? ऐसा सुख, जो एकबार प्राप्त होजाए, तो उसे कोई नष्ट न कर सके और यह सुख आत्मिक सुख है। हम बाह्य जगत् में जो भी सम्बंध स्थापित करते हैं, आत्मिकशक्तियों के बल पर करते हैं और यदि आत्मिकशक्ति कम होगी, तो न भौतिक जगत् का सुख प्राप्त होगा और न ही आध्यात्मिक सुख को समझ पाओगे। इसलिए आवश्यकता है कि पहले स्वयं को अध्यात्म से जोड़ो और फिर अपने बच्चों को आध्यात्मिक संस्कार दो। आपके बच्चे संस्कारवान होंगे, तो वे किसी भी क्षेत्र में सफलता अर्जित कर सकते हैं।
मैं आप लोगों को बताना चाहता हूँ कि भगवती मानव कल्याण संगठन, पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम और भारतीय शक्ति चेतना पार्टी, त्रिवेणी के समान हैं, जिसमें समाहित है माता भगवती आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा की पूर्ण कृपा, जिसमें समाहित है एक ऋषि का पूर्ण आशीर्वाद और इस पर चल करके मेरे शक्तिसाधक व शक्तिसाधिकाएं पूर्णत्व को प्राप्त करेंगे। भटकाव से अलग हट करके उस सत्य को समझने का प्रयास करो, सत्य की पूँजी को अर्जित करने का प्रयास करो। अपने आहार के प्रति सजग रहो, आपका आहार शुद्ध-सात्विक होना चाहिए। आपका आहार जितना शुद्ध-सात्विक होगा, उसी तरह आपके विचार बनते चले जाएंगे और यदि विचार अच्छे होंगे, तो आपका व्यवहार अहंकाररहित सात्विक होगा। अत: आहार, विचार, व्यवहार के प्रति हमेशा सजग रहो।

आप लोगों को यदि भक्ति प्राप्त करना है, तो तुलसीकृत श्रीरामचरितमानस को पढ़ो, यदि ज्ञान प्राप्त करना है, तो बाल्मीकिकृत रामायण पढ़ो और यदि कर्मपथ पर बढ़ना है, तो श्रीमद्भागवत गीता पढ़ो। यदि इन ग्रन्थों को पढ़ लोगे, तो आपके अन्दर माता आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बे के प्रति भक्तिभावना प्रबल हो उठेगी, उनके प्रति अगाध भक्ति उत्पन्न हो जाएगी।
सनातनधर्म अपनी गति से आगे बढ़ रहा है और हमें समाज को जगाते रहना है। ढोंग-पाखण्ड से अपने आपको दूर रखें तथा सच्चे मन से अपनी इष्ट, अपनी आत्मा की जननी माता जगदम्बे की आराधना करें। आप लोगों को सरल से सरल जो मन्त्र बताए गए हैं, उनका नित्यप्रति जाप करो। नित्यप्रति शक्तिजल का पान करो, नशे-मांसाहार से मुक्त रहो, चरित्रवान् जीवन धारण करो। अपने जीवन में ब्रह्मचर्य की ताक़त को बढ़ाओ। ब्रह्मचर्य केवल विकारात्मक चीजों से बचे रहने भर के लिए नहीं कहा जाता, बल्कि ब्रह्मचर्य यानी प्रकृति के नियमों के अनुरूप अपने आपको ढालो, समय पर जागो, साधना-आराधना करो, आपका भोजन शुद्ध-सात्विक हो। आपके जीवन में कोई समस्या आ जाए, तो तनावग्रसित मत होजाओ, अपितु पुरुषार्थ के बल पर समस्याओं का समाधान करो।
मैं युवाओं का आवाहन करता हूँ कि यदि तुम्हारे अन्दर धर्म, राष्ट्र, मानवता की सेवा के लिए कोई भी इच्छाशक्ति है, तो ब्रह्मचर्य का जीवन जीते हुए इस दिशा में आगे बढ़ो। यह काल कुछ कर गुज़रने का है, यह शक्ति का युग है, यह कर्म का युग है। दीन-हीन बनकर जीवन जीने का यह काल नहीं है। अपने अन्दर ऐसी सच्चाई, ऐसी ईमानदारी की ताक़त पैदा करो, जो युगों-युगों तक समाज को दिशा देती चली जाए। हमारी आत्मा अजर-अमर-अविनाशी है। हम एक जन्म नहीं, अनेक जन्म लें, तो हर जन्म में उन्नति के पथ पर जाएं, ऐसी दृढ़ इच्छाशक्ति अपने अन्दर पैदा करो।’’
ऋषिवर के दिव्य चिन्तन के उपरान्त, सभी भक्तों ने ‘माँ’-गुरुवर की दिव्य आरती का लाभ प्राप्त कर श्रीगुरुचरणपादुकाओं का स्पर्श करके एवं प्रसाद लेकर माँ अन्नपूर्णा भंडारा परिसर की ओर प्रस्थित हुए।
द्वितीय दिवस का प्रथम सत्र
08 हज़ार से अधिक नये भक्तों ने ली गुरुदीक्षा

शक्ति चेतना जनजागरण शिविर के द्वितीय दिवस का प्रथम सत्र, मंचस्थल पर प्रात: 07:30 बजे से गुरुदीक्षा का कार्यक्रम प्रारम्भ हुआ। इस अवसर पर 08 हज़ार से अधिक नये भक्तों ने गुरुदीक्षा प्राप्त करके विकारों से मुक्त नवीन जीवन, धर्ममय और कर्ममय जीवन का सूत्रपात किया। दीक्षा प्रदान करने से पूर्व गुरुवरश्री ने कहा कि ‘‘जब किसी चेतनावान् गुरु से दीक्षा प्राप्त करने का समय होता है, तो वे क्षण मानवजीवन के सबसे महत्त्वपूर्ण क्षण होते हैं और आज तो ज्ञान का दिवस है, बसंत पंचमी है, माता सरस्वती का प्रकाट्य दिवस है, ऐसे पावन क्षणों में इस दिव्यधाम में आप लोग दीक्षा प्राप्त कर रहे हैं, आप लोगों का इससे बड़ा सौभाग्य और कुछ हो ही नहीं सकता। गुरु और शिष्य का रिश्ता एक ऐसा अटूट रिश्ता है, जो इस भूतल के समस्त रिश्तों से सर्वोपरि है। यही वह रिश्ता है, जो आत्मिक होता है। जबकि, भौतिक जगत् का ऐसा कोई रिश्ता नहीं, जो कि स्वार्थ से न जुड़ा हो।’’
परम पूज्य गुरुवरश्री ने कहा कि ‘‘आज से, अभी से संकल्पबद्ध हो जाओ कि मैं नशे-मांसाहार से मुक्त चरित्रवान् जीवन जिऊंगा, धर्म, राष्ट्र व मानवता की रक्षा करूंगा। मेरा शिष्य वही कहलाएगा, जो नशे का सेवन नहीं करेगा, जो मांस का सेवन नहीं करेगा, जो चरित्रहीनता का जीवन नहीं जियेगा तथा जो धर्म, राष्ट्र और मानवता की रक्षा के प्रति समर्पित रहेगा।’’
चिन्तन के पश्चात् ऋषिवर सद्गुरुदेव परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज ने कहा कि मैं शक्तिपात के माध्यम से सभी को अपनी चेतना से आबद्ध करते हुये, जो जिस अवस्था में है, उसे स्वीकार करता हूँ। आपश्री ने सहायक शक्तियों हनुमान जी, भैरव जी एवं गणेश जी के मंत्र के साथ चेतनामंत्र ‘ॐ जगदम्बिके दुगायै नम:’ एवं गुरुमन्त्र ‘ॐ शक्तिपुत्राय गुरुभ्यो नम:’ प्रदान किया। अंत में सभी नये दीक्षाप्राप्त शिष्यों ने सद्गुरुदेव जी महाराज को नमन करते हुये नि:शुल्क शक्तिजल प्राप्त किया और फिर मूलध्वज साधना मंदिर जाकर मंदिर की परिक्रमा की, तत्पश्चात् अन्नपूर्णा भंडारा परिसर में जाकर खिचड़ी प्रसाद ग्रहण करके तृप्त हुए।
द्वितीय दिवस का द्वितीय सत्र
शक्ति चेतना जनजागरण ‘योग साधना’ शिविर आयोजनस्थल की और मंच की शोभा देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो प्रकृतिसत्ता की असीम कृपा सिद्धाश्रम धाम में बरस रही हो।
द्वितीय दिवस की अपरान्ह बेला, मंच में विराजमान सद्गुरुदेव जी महाराज के त्याग-तपस्या और भक्ति के आलोक से आलोकित आभामंडल को अपलक देखते हुये भक्तगण मुग्ध हो रहे थे कि तभी भावगीतों व काव्यपाठ का क्रम प्रारम्भ हुआ। भावगीतों के प्रारम्भिक अंश इस प्रकार हैं——

अपनी-अपनी मंजिल पा लो, करो न ज़्यादा रेस्ट। जगत् में हर प्राणी हैं व्यस्त, हर प्राणी है व्यस्त-वीरेन्द्र दीक्षित जी, दतिया। आज स्थापना दिवस है आया, मन में एक विचार है आया-बाबूलाल विश्वकर्मा जी, दमोह।
सिद्धाश्रमरत्न सौरभ द्विवेदी ‘अनूप’ जी के द्वारा परम पूज्य गुरुवरश्री के अतिसंघर्षपूर्ण अखण्ड संकल्प को लेकर प्रस्तुत काव्यपाठ को श्रोतागण शांत, मौन सुनते चले गए। सत्य पर आधारित प्रस्तुत काव्य पाठ—
दिन अपनी जगह रही और रात अपनी जगह, गुरुदेव जी बढ़ते रहे नित्य और बाकी सारी की सारी बात अपनी जगह। एक वह भी दिन था जब आपका इस स्थान पर आगमन हुआ था, वह वैसा ही था जैसा धरती पर आसमान का आगमन हुआ था। तय होगया था तभी कि यहाँ आकर सारा संसार झुकेगा और झुकता भी क्यों नहीं, यहाँ भगवान् का आगमन हुआ था। दुनियाभर में मिल रही धन-वैभव की सारी सौगात अपनी जगह और गुरुदेव जी नित्य बढ़ते रहे, दुनिया की सारी बात अपनी जगह।
खड़े होने, चलने, बैठने और सोने के अनुकूल दूर-दूर तक कोई स्थान नहीं था, पर गुरुदेव जी में उत्साह इतना प्रबल था कि मन जरा भी परेशान नहीं हुआ। गुरुदेव जी थे, उनका दृढ़ संकल्प था और कुछ चन्द शिष्यगण थे तथा दूर-दूर तक साथ निभाने को एक भी इंसान नहीं था। अखंड पुरुषार्थ प्रारम्भ हुआ और….।
ऋषिवर के दिव्य चिंतन
आशीर्वाद प्रदान करने के बाद ऋषिवर की अमृतमयी वाणी मुखर हो उठी—
‘‘ हर मनुष्य अपना लक्ष्य निर्धारित करता है। कुछ उस लक्ष्य तक पहुंच जाते हैं, कुछ बीच में रुक जाते हैं और कुछ लक्ष्य निर्धारित करके ही रह जाते हैं, आगे बढ़ ही नहीं पाते। मनुष्यजीवन को प्राप्त करने के लिए देवता भी तरसते हैं। इसलिए कि मनुष्यजीवन को प्राप्त करके ही आध्यात्मिक उच्चता की ओर, ऋषित्व की ओर बढ़ा जा सकता है। हर मनुष्य के अन्दर निखिल ब्रह्मांड समाहित है। हमारे अन्दर वह दिव्य आत्मचेतना बैठी हुई है, जिसमें सबकुछ समाहित है और उस आत्मचेतना को लेकरके भी आज का समाज दीन-हीनों का जीवन जी रहा है! इसलिए कि बाहर की ओर ही देखने का प्रयास किया गया और अपने अन्त:करण को देखने का कभी प्रयास ही नहीं किया गया। समाज ने अपने अन्दर की शक्तियों को कभी जगाने का प्रयास ही नहीं किया। हमारे अन्दर इतनी अद्भुत शक्तियाँ हैं कि उन्हें जगाकर स्वयं का कल्याण तो कर ही सकते हैं, करोड़ों-करोड़ लोगों का कल्याण कर सकते हैं। अनेक ऋषियों ने, मुनियों ने, साधक-साधिकाओं ने यह करके दिखाया है।
यह यात्रा कोई नई यात्रा नहीं है और मैंने माता भगवती आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा के चरणों के पास बैठकर इस यात्रा का चयन स्वयं किया है। यह यात्रा समाज के लिए कठिनाईयों से भरी होगी, लेकिन मेरे लिए यह यात्रा कठिनाईयों से युक्त होने के बाद भी आनन्द से भरी हुई है। दयालु, कृपालु वह मेरी ‘माँ’ हर क्षण, हर संघर्ष में मेरा साथ देती रहीं और एक क्षण के लिए भी मुझे व्यथित नहीं किया। लक्ष्य को प्राप्त किए बिना वर्तमान में भी विश्राम नहीं करना। मैंने अपने जीवन में कभी भी ठहरने का, विश्राम का निर्णय लिया ही नहीं! हमारा लक्ष्य पावन है, पवित्र है। वह लक्ष्य माता जगदम्बे ने हमें और आपको प्रदान किया है। हम सौभाग्यशाली हैं कि हमें एक ऐसा महान लक्ष्य प्राप्त हुआ है कि उससे इस कलिकाल में मानवता का कल्याण होना है, समाज को एक दिशा प्राप्त होनी है। अभी तो हम प्रारम्भिक स्थिति में चल रहे हैं, लक्ष्य तक पहुंचना अभी बहुत दूर है। अभी तो 100 महाशक्तियज्ञ पूर्ण होने हैं और एक-एक यज्ञ में 11-11 दिन लगते हैं। समाज को दिशा-निर्देशन देते हुए इन यज्ञों को पूरा करना है।
आज प्रवचनकर्ता, तथाकथित धर्माधिकारी क्या कर रहे हैं? लोगों को भ्रमित कर रहे हैं। कहते हैं कि कलियुग में बस नाम आधारा। अरे, केवल नाम के गान से कुछ कल्याण नहीं होने वाला। कर्म करना पड़ेगा, कर्मवान बनना पड़ेगा। यह कलियुग कर्म का युग है। मुझे बताओ कि यदि किसी कुएं में गिर जाओगे, तो केवल नाम लेने से कुएं से बाहर निकल आओगे? नहीं, बल्कि पुरुषार्थ करना पड़ेगा, बाहर के लोगों का सहारा लेना पड़ेगा, कुएं से निकलने के लिए प्रयास करना पड़ेगा। आज आवश्यकता है मन्त्रों का जाप करने की, उन बीजमंत्रों का जाप करने की, जिनके जाप करने से आपकी चेतनाशक्ति प्रभावक होगी, आपके अंदर दिव्यतरंगें प्रभावक होंगी, आपकी कार्यक्षमता बढ़ेगी।

कहते हैं कि पंचतत्त्वों को भगवान् मानो! यानी पंचतत्त्व भगवान् हैं और कोई नहीं! इतना तो अहसास होना चाहिए, विज्ञान भी बता रहा है, हमारे धर्मग्रंथ भी बता रहे हैं कि पंचतत्त्वों से हमारा यह शरीर निर्मित है। पंचतत्त्व में तत्त्व शब्द जुड़ा हुआ है और इससे हमारे स्थूल का निर्माण हुआ है, न कि हमारी आत्मा का निर्माण हुआ है। अरे, हमारी आत्मा पंचतत्त्वों से परे है, जो माता भगवती आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा का अंश है और उसी चेतना से हमारा यह शरीर संचालित है। समाज को मूल ज्ञान दिया ही नहीं जा रहा है। कथावाचकों का बस एक ही काम कि लोगों को नचाओ, रास रचाओ और पैसा एकत्रित करो! इसीलिए समाज भटकता चला जा रहा है। इसीलिए मेरे द्वारा कहा जाता है कि गहराई में जाओ, जड़ों में जाओ कि हमारे ऋषि-मुनि किन देवी-देवताओं की आराधना करते थे?
जगत् जननी, जो हमारी आत्मा की जननी हैं, उनको विस्मृत करते जा रहे हैं, त्रिदेवों को भूलते चले जा रहे हैं, माता महासरस्वती, माता महालक्ष्मी, माता महाकाली को भूलते चले जा रहे हैं, जिनकी साधना-आराधना हमारे ऋषि-मुनि करते थे। क्या हमारे ऋषि-मुनि अल्पज्ञ थे? अरे, वे ज्ञान की पराकाष्ठा का जीवन जीते थे और जिनके पास नए स्वर्ग के निर्माण की क्षमता थी। वे त्रिकालज्ञ थे और उनकी वाक्शक्ति इतनी प्रबल थी कि जो कहते थे, वह होता था। उनके पास किसी के जीवन को नष्ट कर देने और नष्ट हो रहे जीवन को पुनर्जीवन देने की क्षमताएं थीं।
कहते हैं कि प्रारब्ध को बदला नहीं जा सकता, प्रारब्ध को भोगना ही पड़ेगा। मैं कह रहा हूं कि प्रारब्ध को बदला जा सकता है और हर काल में बदला गया है। मूर्ख हैं वे लोग, जो कहते हैं कि प्रारब्ध को नहीं काटा जा सकता, प्रारब्ध को नहीं बदला जा सकता। हर काल में बदला गया है और बदला जा सकता है, स्वयं के पुरुषार्थ के माध्यम से, स्वयं की साधना के माध्यम से, चेतनावान् गुरु के माध्यम से। एक चेतनावान् गुरु अपनी तपस्या के माध्यम से आपके प्रारब्ध को बदल सकता है।
कुछ प्रवचनकर्ता, कुछ धर्माधिकारी सनातनधर्म की रक्षा की बात करते हैं। अरे, सनातनधर्म की रक्षा ऐसे नहीं हो सकती। यदि सनातनधर्म की रक्षा करनी है, तो हमें साधनात्मक जीवन जीना पड़ेगा, तपस्वी बनना पड़ेगा, अपने देवी-देवताओं पर पूर्ण निष्ठा, विश्वास रखना पड़ेगा। देवी-देवताओं की साधना करनी पड़ेगी, जिनकी साधना करके पूर्व के कालों में अनेकानेक लोगों द्वारा दिव्यशक्तियाँ अर्जित करके स्वयं के साथ समाज का भी कल्याण किया गया है। भगवान् श्रीराम ने भी शिव की आराधना की थी, रामेश्वरम में उनके द्वारा शिविलिंग की स्थापना की गई। क्या वे अज्ञानी थे? आज के साधु-संत-संन्यासी, कथित धर्माधिकारी और प्रवचनकर्ता नाना प्रकार के भटकाव की बातें करते रहते हैं। राजनीति के क्षेत्र में भी कुछ राजनेता अनर्गल प्रलाप करते रहते हैं, उनके द्वारा देवी-देवताओं को लेकर अपमानजनक टिप्पणियाँ की जाती हैं!
सत्य से कोई दूर जाएगा, तो उसका विनाश सुनिश्चित है। आज समाज में जो राजनीतिक पार्टियाँ देवी-देवताओं को लेकर अपमानजनक टिप्पणियाँ कर रही हैं, समाज में जो जातपात के नाम पर विष घोल रही हैं, उन्हें एक-न-एक दिन गिरकर धूल चाटनी पड़ेगी। सत्य करवट ले रहा है, परिवर्तन का चक्र चल चुका है। अनेक स्थानों पर, अनेक परिवारों में शक्ति चेतनाएं जन्म ले रहीं हैं। 30-35 वर्ष पूर्व मेरे द्वारा कहा गया था कि अपने आपको, अपने परिवार को दिव्य बनाओ, साधना के क्षेत्र में बढ़ो, फिर देखोगे कि तुम्हारे परिवारों में दिव्य चेतनाएं जन्म लेंगी। उस दिशा में आप सभी को बढ़ने की ज़रूरत है।
मन की एकाग्रता में बहुत बड़ी ताक़त है, विपश्यना साधना करो। जब प्रात: उठो, तो विचार करो कि परमसत्ता ने मुझे नया जीवन दिया है, इसे मुझे अच्छे से व्यतीत करना है। रात्रि में सोने से पहले दिनभर के अपने कार्यों का आकलन करो कि कहीं मुझसे कुछ ग़लत तो नहीं हुआ है? यदि भूल से भी कुछ ग़लत होगया हो, तो अगले दिन उस ग़लती को सुधारने का प्रण लो और परमसत्ता को अपनी स्मृति में बसाकर, परमसत्ता के चरणों में अपने आपको समर्पित करके सो जाओ। यदि विपश्यना साधना करते हुए नींद में जाओगे, तो अच्छी नींद आएगी और अच्छे व सकारात्मक स्वप्न आएंगे तथा जब प्रात: उठोगे, तो आपका शरीर, आपका मन प्रफुल्लित रहेगा। अन्यथा, आप तो विकारात्मक और भयानक स्वप्न तो देखते ही रहते हो और जब सुबह नींद खुलती है, तो आपका पूरा शरीर शिथिल और मस्तिष्क में भारीपन रहता है, उठने का मन ही नहीं करता।

हर समय अपने विचारों पर दृष्टि जमाए रखो कि कहीं मन में नकारात्मक विचार तो नहीं आ रहे हैं और यदि आ रहे हों, तो तत्काल अपने मन को सात्विक विचारों की ओर मोड़ दो। हर समय सात्विक विचारों को प्रवाह दो। नित्यप्रति प्राणायाम करो, बीजमंत्रों ‘माँ’-ॐ का जाप करो, कुछ समय आज्ञाचक्र पर ध्यान लगाओ। इससे तृप्ति मिलेगी, आपकी चेतनाशक्ति प्रभावक होगी तथा निर्णय लेने की क्षमता बढ़ेगी।
सत्य के पथ पर चलो, धार्मिक ग्रन्थों का अध्ययन करो और उनमें निर्दिष्ट बातों पर अमल करो। अपने मोबाइलों पर अच्छी चीजें देखो, विकारात्मक दृश्यों से पूरी तरह परहेज करो। अच्छा सोचो तथा पुरुषार्थ और परोपकार की दिशा में आगे बढ़ो। हर घर में ‘माँ’ की ऊर्जा पहुंचाने का प्रयास करो, लोगों को नशे-मांसाहार से मुक्त चरित्रवान् जीवन जीने की प्रेरणा दो और जहाँ भी कुछ ग़लत हो रहा हो, उसका विरोध करो।
कर्म के साथ ही मानसिक विचारों का भी फल मिलता है। कहीं पर करोड़ों की सम्पदा पड़ी हो, तो जब तक आपके मन में लोभ उत्पन्न नहीं होगा, तब तक आप उसे छू भी नहीं सकते और जैसे ही मन में लोभरूपी विचार आया नहीं कि झट से आप उसे उठा लोगे। इसी तरह जब तक क्रोध की भावना उत्पन्न नहीं होगी, आप किसी को एक तमाचा भी नहीं मार पाओगे। जब तक विकारात्मक भाव अपने अन्दर नहीं लोगे, तब तक विकारों की ओर आपका एक क़दम भी आगे नहीं बढ़ेगा। सतोगुणी विचार रखो, इससे मानसिक प्रसन्नता होगी और जब मन प्रसन्न होगा, तो आपकी कार्यक्षमता दसियों गुना बढ़ जायेगी और आपको लक्ष्य तक पहुंचने से कोई रोक नहीं सकता।

सत्य को समझने का प्रयास करोगे, सत्यपथ पर चलोगे, तो तुम्हारा अन्त:करण निर्मल और पवित्र रहेगा। गुरु के आदेश-निर्देशों का पालन करते रहोगे, तो तुम्हारा हर कार्य सफल होगा। अपने गुरु के आशीर्वाद का फल देखना है, तो अपने अन्त:करण में देखो कि तुम्हारे जीवन में कितना परिवर्तन आ रहा है कि तुम्हारे बच्चे नशा नहीं कर रहे हैं, चेतनावान् बन रहे हैं, धर्मवान और कर्मवान बन रहे हैं तथा विकारात्मक चीजों को छोड़कर ‘जय माता की-जय गुरुवर की’ जयकारे लगाते हैं। आपको हज़ारों जन्म मिले होंगे, लेकिन मेरा सान्निध्य इस एक जीवन में प्राप्त हुआ है, इसे सार्थक बना लो। मेरे मार्गदर्शन में अपने जीवन को सार्थक बना सकते हो, अपने जीवन को संवार सकते हो।
सनातन के रक्षक बनो, आपका गुरु आपके साथ है, आपको ऊर्जा देने के लिए तत्पर है। निर्भयता, निडरता का जीवन जियो, मौत का भय त्याग दो और जिस दिन मौत का भय त्याग दोगे, तुम्हारी चेतना ऊर्ध्वगामी होती चली जाएगी। आत्महत्या करने की बात अपने मन में लाओ भी नहीं। हत्या से भी बड़ा जघन्य पाप आत्महत्या करना है।’’
परम पूज्य गुरुवरश्री ने जैसे ही अपने चिन्तन को विराम् दिया, आरती का क्रम शक्तिस्वरूपा बहनों व सिद्धाश्रम चेतनाओं ने प्रारम्भ किया। आरतीक्रम सम्पन्न होने के पश्चात् शिविरस्थल पर उपस्थित सभी भक्तों, श्रद्धालुओं ने क्रमबद्ध होकर गुरुचरणपादुकाओं का स्पर्श करते हुए प्रसाद प्राप्त किया।
सिद्धाश्रम स्थापना दिवस पर्व पर आयोजित शक्ति चेतना जनजागरण ‘योग साधना’ शिविर ने पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम की छटा को अलौकिक बना दिया था। उस समय अत्यन्त ही मनभावन दृश्य देखने को मिला, जब श्री दुर्गाचालीसा अखण्ड पाठ मंदिर से प्रात:कालीन आरतीक्रम सम्पन्न करके मूलध्वज साधना मंदिर में नवीन शक्तिध्वज के रोहण के पश्चात् परम पूज्य सद्गुरुदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज और पूजनीया शक्तिमयी माता जी रथ वाहन से सिद्धाश्रम के विशाल परिसर में हाथ जोड़कर खड़े अपार जनसमुदाय को आशीर्वाद प्रदान करते हुए धीरे-धीरे बढ़ रहे थे।
दर्शन एवं आशीर्वाद के अभिलाषी भक्तगण परम पूज्य गुरुवरश्री और शक्तिमयी माता जी से शुभाशीर्वाद प्राप्त करके भावविभोर हो उठे, सभी के चेहरों पर ऐसी प्रसन्नता झलक उठी, जैसे कि उन्हें कोई खजाना मिल गया हो।
दिव्य आरती की अलौकिक अनुभूति

शक्तिस्वरूपा बहनों पूजा जी, संध्या जी, ज्योति जी और सिद्धाश्रम चेतनाओं आरूणी जी, अद्वैत जी व आत्रेय जी के द्वारा उपस्थित समस्त भक्तों की ओर से दोनों दिवस ‘माँ’-गुरुवर की दिव्य आरती सम्पन्न की गयी। उस समय का वातावरण अत्यंत ही स्निग्ध, भक्तिमय और प्रवाहित चेतना तरंगों की अनुभूति की अलौकिकता उपस्थित सभी भक्तों के रोम-रोम को पुलकित कर रही थी। दिव्य आरती की अलौकिक अनुभूति प्राप्त करके सभी शिविरार्थी धन्य हुए।
सभी भक्तों ने किया अन्नपूर्णा भंडारे में तृप्तिपूर्ण भोजन
दिनांक 22-23 जनवरी को आयोजित शक्ति चेतना जनजागरण ‘योग साधना’ शिविर में पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम पहुंचने वाले भक्तों के लिये सुबह-शाम नि:शुल्क भोजन प्रसाद की व्यवस्था अन्नपूर्णा भोजनालय में रही। गुरुवरश्री के आशीर्वाद से विशाल परिसर में भण्डारे की व्यवस्था की गई थी। सभी भक्तों ने दोनों समय भोजनालय परिसर में पंक्तिबद्ध रूप से बैठकर तृप्तिपूर्ण भोजन प्रसाद ग्रहण किया। इस वृहद व अतिमहत्त्वपूर्ण व्यवस्था की ज़िम्मेदारी का निर्वहन हज़ारों परिश्रमी समर्पित कार्यकतार्ओं के द्वारा दिन-रात अथक परिश्रम से पूर्ण किया गया।
पूज्य दण्डी संन्यासी समाधि दर्शन
विभिन्न प्रकार के पुष्पों और हरे-भरे वृक्षों से आच्छादित पूज्य दण्डी संन्यासी स्वामी श्री रामप्रसाद आश्रम जी महाराज की समाधिस्थल की मनोरमता तो अद्वितीय है। यहीं पर दिव्यजल का स्रोत भी है, जहाँ पर ऋषिवर श्री शक्तिपुत्र जी महाराज के आशीर्वाद से भक्तों की सुविधा हेतु हैण्डपम्प व विद्युत मोटर पम्प लगाकर व्यवस्थित रूप से अनेक नल लगाए गए हैं, जिनसे वहाँ पहुंचने वाले भक्तगण दिव्यजल प्राप्त करते हैं। सबसे बड़ी बात यह कि इस स्थल पर कुछ समय बैठने मात्र से अपूर्व शान्ति की अनुभूति होती है।
स्थापना दिवस पर्व पर सिद्धाश्रम पहुंचे श्रद्धालु, भक्त इस मनोरम स्थल में भी क्रमबद्ध रूप से पहुंचे और समाधि की परिक्रमा करके अपने जीवन में संस्कारों का एक क्रम और जोड़ा।
दानवीर बाबा की गुफास्थली
समाधि की परिक्रमा करके दिव्यजल लेने के पश्चात् श्रद्धालु भक्तजन वहीं समीप ही स्थित दानवीर बाबा के गुफास्थल पर गए और नमन किया। इस स्थल को भी पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम ट्रस्ट के द्वारा सुव्यवस्थित रूप प्रदान किया गया है। इस स्थान पर भी बैठकर भक्तगण शान्ति की अनुभूति प्राप्त करते हैं।




